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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति की शक्तियों पर खींची ‘संवैधानिक लक्ष्मण रेखा’, उपराष्ट्रपति ने जताई नाराज़गी

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Supreme Court vs President Powers

Desh Harpal | 17 अप्रैल 2025
By Digital Desk

Supreme Court Judgement on Governor and President Powers के तहत सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा विधेयकों (Bills) को मंजूरी देने की समयसीमा (Time Limit) तय की गई। अदालत ने साफ किया कि राज्य विधानसभा से पास होकर आए बिल को यदि राज्यपाल राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को Article 201 के तहत 3 महीने के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य होगा।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

Judicial Review, No Pocket Veto, Mandatory Timeline और No Repeated Returns – इन चार बिंदुओं में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति की शक्तियों की स्पष्ट व्याख्या की:

  1. फैसला लेना अनिवार्य: राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के पास भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को स्पष्ट निर्णय लेना होगा—या तो मंजूरी दें या अस्वीकृति का कारण बताएं।
  2. ज्यूडिशियल रिव्यू संभव: अगर बिल केंद्र सरकार के प्रभाव में रुकता है, तो न्यायालय इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कर सकता है।
  3. समय सीमा: राष्ट्रपति को तीन महीने में निर्णय देना होगा, वरना देरी का कारण बताना पड़ेगा।
  4. बार-बार बिल लौटाने की मनाही: यदि राष्ट्रपति ने बिल वापस भेजा और विधानसभा ने उसे दोबारा पास किया, तो राष्ट्रपति को फाइनल डिसीजन लेना ही होगा।

राज्यपालों के लिए भी बनी समय सीमा

तमिलनाडु मामले में Supreme Court vs Governor Power की बहस में सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को स्पष्ट कर दिया था कि राज्यपाल के पास भी कोई Absolute Veto Power नहीं है। उन्हें विधानसभा के पास किए गए किसी भी बिल पर अधिकतम एक महीने के भीतर निर्णय देना होगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा, “राज्यपाल सिर्फ प्रतीकात्मक पद नहीं हैं, लेकिन वे राज्य सरकार की सलाह से ही निर्णय ले सकते हैं।”

उपराष्ट्रपति की नाराज़गी

इस फैसले के बाद Vice President Jagdeep Dhankhar ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा:

“हम ऐसा सिस्टम नहीं बना सकते जहां अदालतें राष्ट्रपति को निर्देश दें। Article 142 के तहत मिला विशेष अधिकार न्यायपालिका के पास 24×7 available nuclear missile जैसा बन गया है।”

उपराष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि अगर संस्थाएं अपनी सीमाएं लांघने लगें तो संविधान के संतुलन को खतरा हो सकता है। “कोई भी संस्था संविधान से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार सर्वोच्च होती है,” उन्होंने कहा।

क्या है Article 201 और Article 142?

  • Article 201: राज्यपाल विधानसभा से पास बिल को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं, लेकिन राष्ट्रपति को उस पर निर्णय लेना अनिवार्य होता है।
  • Article 142: सुप्रीम कोर्ट को न्याय प्रदान करने के लिए विशेष शक्तियां देता है, लेकिन यही शक्ति अब विवाद का कारण बन रही है।

कपिल सिब्बल ने की तारीफ

पूर्व कानून मंत्री Kapil Sibal ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा कि अब केंद्र सरकार जानबूझकर राज्य सरकारों के महत्वपूर्ण बिलों को रोके नहीं रख सकेगी। सुप्रीम कोर्ट का ये रुख federal structure और cooperative federalism को मजबूत करता है।

तमिलनाडु केस का बैकग्राउंड

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में तमिलनाडु सरकार ने आरोप लगाया कि राज्यपाल R.N. Ravi ने 10 जरूरी बिलों को रोक रखा है। इनमें से कई बिल विधानसभा ने दोबारा पास किए थे, लेकिन राज्यपाल ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। R.N. Ravi पूर्व IPS अधिकारी रहे हैं और 2021 से तमिलनाडु के राज्यपाल हैं।

निष्कर्ष: Supreme Court ने राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों पर ऐतिहासिक टिप्पणी की है, जो संविधान की व्याख्या और लोकतंत्र के संतुलन की दिशा में एक निर्णायक कदम है। हालांकि यह फैसला केंद्र-राज्य संबंधों को नई बहस में डाल सकता है, परंतु इससे transparency, accountability और timely governance को बल मिलेगा।

Nikhil

catalystbpl@gmail.com https://deshharpal.com/

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