भारत में हर साल करीब 1.22 लाख करोड़ रुपए का खाद्य उत्पादन लोगों की थाली तक पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे दो प्रमुख वजहें हैं। पहली, फल-सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की कमी और दूसरी, मौसम में बदलाव के साथ बढ़ती गर्मी। रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल ताजे कृषि उत्पादन में से केवल 4% को ही कोल्ड स्टोरेज में रखने की सुविधा मिल पाती है। खाद्य पदार्थों की इस बर्बादी से बाजार में आपूर्ति प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब और खाद्य महंगाई पर पड़ रहा है। देश में 30 से 40% फल और सब्जियां बाजार या ग्राहकों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं। वहीं, उचित रखरखाव और परिवहन की कमी के कारण 5 से 6% अनाज भी रास्ते में बर्बाद हो जाता है। खाद्य महंगाई बढ़कर 8.20% होने का अनुमान रिपोर्ट में खाद्य पदार्थों की बर्बादी को महंगाई बढ़ने की एक अहम वजह बताया गया है। दिए गए अनुमानों के मुताबिक, अक्टूबर में खुदरा महंगाई दर सितंबर के 5.54% से बढ़कर 5.93% तक पहुंच सकती है। वहीं, खाद्य महंगाई सितंबर के 7.74% से बढ़कर अक्टूबर में 8.20% होने का अनुमान है। इसका सबसे ज्यादा असर आम परिवारों के रसोई बजट पर पड़ रहा है। कम बारिश के कारण सब्जियों और फसलों की आवक प्रभावित हुई है। वहीं, विदेशी बाजारों से आने वाला खाद्य तेल भी महंगा हुआ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2026 की शुरुआत से प्याज के दाम करीब 108% तक बढ़ चुके हैं। दूध, मीट और अंडे की कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई है। फसल सड़ने से बिगड़ रहा घर का बजट गर्मी और खराब मौसम के कारण फल-सब्जियां जल्दी खराब हो जाती हैं। रिपोर्ट में दिल्ली की आजादपुर मंडी के एक फल व्यापारी का उदाहरण दिया गया है। वर्ष 2024 में गर्मी के कारण आम सड़ने से उसे एक ही दिन में एक लाख रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, देश की दो करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा खेती की जमीन यानी करीब 14% कृषि क्षेत्र खराब मौसम से प्रभावित है, जबकि 45% हिस्से पर बाढ़ का खतरा बना रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम की मार का असर अब केवल खेतों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव बाजार में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, बढ़ती कीमतों और आम आदमी के रसोई बजट पर भी पड़ रहा है। RBI बढ़ा सकता है ब्याज दरें खाने-पीने की चीजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से भारतीय रिजर्व बैंक की चिंता भी बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2% कर दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई पर नियंत्रण के लिए रिजर्व बैंक दिसंबर में होने वाली मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट 0.25% यानी 25 बेसिस पॉइंट बढ़ा सकता है। ऐसा होने पर होम लोन और कार लोन की EMI महंगी होने की आशंका है। फसल की बर्बादी किसान का नहीं, पूरे सिस्टम का नुकसान क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च प्रमुख डॉ. पलक बालियान के मुताबिक, भारत में अनाज और फल-सब्जियों का खराब होना केवल खेती से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन की कमजोरियों को भी दिखाता है। उनका कहना है कि करीब एक-तिहाई फल और सब्जियां ग्राहकों तक पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाती हैं। गर्मी और बेमौसम बारिश जैसी परिस्थितियां इस नुकसान को और बढ़ा देती हैं। डेयरी किसानों को हर साल हजारों करोड़ का नुकसान बढ़ते तापमान का असर दूध उत्पादन पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी के कारण गायों और भैंसों की उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। इससे भारत में हर साल करीब 18 लाख टन दूध का उत्पादन कम हो जाता है और देश को लगभग 2,661 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश के करीब 40% मवेशी खराब मौसम से सीधे प्रभावित हैं। इसका असर डेयरी किसानों की कमाई के साथ बाजार में दूध की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिए कोल्ड स्टोरेज जरूरी क्लाइमेट ट्रेंड्स ने सरकार को कोल्ड स्टोरेज और कोल्ड चेन नेटवर्क बढ़ाने का सुझाव दिया है, ताकि फल-सब्जियों को खराब होने से बचाया जा सके। इसके साथ ही मौसम की सटीक जानकारी देने वाले चेतावनी तंत्र विकसित करने, किसानों को सीधे बाजार से जोड़ने और मौसम की मार झेलने में सक्षम खेती को बढ़ावा देने की जरूरत बताई गई है। रिसर्च प्रमुख डॉ. पलक बालियान के अनुसार, केवल मौसम की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। अनाज और सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिए स्टोरेज सुविधाओं, आधुनिक तकनीकों और बाजार तक सीधी पहुंच में निवेश करना जरूरी है। इससे मौसम के कारण होने वाले नुकसान का पूरा बोझ अकेले किसानों पर नहीं पड़ेगा।