Intelligence Failure in Pahalgam? Sleeper Cells, Local Informants & TRF Network Exposed
Pahalgam terror attack- Intelligence Failure एक बार फिर Jammu-Kashmir की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकवादी हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकियों के पास सुरक्षा ढांचे, पुलिस मूवमेंट और इलाके की बारीक जानकारियां पहले से मौजूद थीं। मंगलवार दोपहर हुए इस हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई, जबकि 17 लोग घायल हुए। हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की फ्रंट विंग The Resistance Front (TRF) ने ली है।
सूत्रों का मानना है कि इस हमले की योजना बड़ी बारीकी से बनाई गई थी। आतंकियों को न सिर्फ गश्त की टाइमिंग की जानकारी थी, बल्कि वे जानते थे कि किस समय सुरक्षा बल मौके पर नहीं होंगे। Sleeper Cells ने आतंकियों को लोकल मूवमेंट, पुलिस चौकी की दूरी और पर्यटकों की मौजूदगी के बारे में पूरी सूचना दी थी।
जिन चाय वालों, ढाबा संचालकों, पंक्चर मेकेनिकों और Mule-Pony Operators को आमतौर पर शक के दायरे से बाहर रखा जाता है, वहीं अब सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का कारण बनते जा रहे हैं। इन स्थानीय लोगों को पहचानना मुश्किल होता है, क्योंकि वे क्षेत्रीय भाषा जानते हैं, इलाके के भूगोल से वाकिफ हैं और पर्यटकों के साथ सहजता से घुलमिल जाते हैं।
Retired Defence Expert Capt. Anil Gaur का कहना है कि ऐसे Sleeper Cells लंबे समय से घाटी में सक्रिय हैं। साल 2020 में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने ISI और जैश-ए-मोहम्मद के एक ऑडियो इंटरसेप्ट से यह खुलासा किया था कि कैसे पंक्चर की दुकानें, ढाबे और चाय स्टॉल आतंकियों के मददगार के रूप में काम कर रहे हैं। सड़क किनारे प्लास्टिक में हथियार छिपाने, संचार यंत्र रखने और क्रॉस फायरिंग के लिए चुनी गई जगहों की प्लानिंग बाकायदा पाकिस्तान की एजेंसियों द्वारा की जाती है।
Why this matters now? क्योंकि पहलगाम जैसे संवेदनशील इलाके में इतनी बड़ी संख्या में पर्यटकों की मौजूदगी के बावजूद सुरक्षा बलों की गैरमौजूदगी और आतंकियों की सटीक रणनीति दर्शाती है कि ground intelligence बुरी तरह फेल हुई है।
सुरक्षा बलों के विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि हमले के वक्त कोई क्रॉस फायरिंग नहीं हुई, क्योंकि आस-पास कोई सुरक्षा बल मौजूद ही नहीं था। ये भी देखा गया कि आतंकी घोड़ों, खच्चरों और ढाबों के बीच से निकले, लेकिन इन पर किसी को शक नहीं हुआ। यही नहीं, हमला होने के काफी देर बाद सुरक्षा बल मौके पर पहुंचे – तब तक आतंकी जंगलों की ओर भाग चुके थे।
घटना की एक और चिंताजनक बात यह है कि आतंकी ढाबा संचालकों और उनके कर्मचारियों को टारगेट नहीं कर रहे थे – इसका मतलब साफ है कि वे ‘अपने लोग’ थे या उन्हें पहले से सावधान किया गया था। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसी घटनाएं आतंकियों की गहरी local network intelligence की ओर इशारा करती हैं।
Conclusion:
अब वक्त आ गया है कि Jammu-Kashmir में चाय बेचने वालों, ढाबा संचालकों और घोड़ा-खच्चर वालों पर भी सतर्क नजर रखी जाए। हर ‘Local’ को ‘Friendly’ मान लेना अब महंगा साबित हो सकता है। सुरक्षा एजेंसियों को पुराने खांचे से बाहर आकर Hybrid Militants और Sleeper Informants की पहचान करनी होगी, नहीं तो अगला हमला और भी ज्यादा विनाशकारी हो सकता है।
