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RSS Controversy: अमेरिका में संघ पर प्रतिबंध की मांग, 29 अगस्त को New York जाएंगे Bhagwat

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अमेरिका में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। US Commission on International Religious Freedom (USCIRF) ने RSS से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। आयोग ने अमेरिकी प्रशासन से यह भी कहा है कि संघ के नेताओं को उच्चस्तरीय मुलाकातों और सम्मान से दूर रखा जाए।

यह मामला ऐसे वक्त सामने आया है, जब RSS प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे की चर्चा तेज है। रिपोर्टों के अनुसार भागवत 29 अगस्त को New York में एक कार्यक्रम में शामिल होने वाले हैं। ऐसे में USCIRF के बयान ने उनकी यात्रा को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज कर दी है।

USCIRF ने RSS को लेकर क्या कहा?

USCIRF का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े उसके आकलन के आधार पर RSS से जुड़े कुछ लोगों के खिलाफ अमेरिकी सरकार को कदम उठाने चाहिए। आयोग ने ऐसे लोगों पर लक्षित प्रतिबंध लगाने और अमेरिकी अधिकारियों की ओर से उन्हें विशेष सम्मान दिए जाने से बचने की सिफारिश की है।

हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि USCIRF की सिफारिश का मतलब RSS पर अमेरिका में प्रतिबंध लगना नहीं है। आयोग अमेरिकी सरकार को धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर सलाह और सिफारिशें देता है। अंतिम फैसला अमेरिकी प्रशासन को लेना होता है।

29 अगस्त को New York पहुंचेंगे मोहन भागवत

मोहन भागवत के प्रस्तावित अमेरिकी दौरे को लेकर भारतीय समुदाय के बीच भी उत्सुकता है। New York में उनके कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से संवाद की उम्मीद है।

ऐसे में USCIRF का बयान सामने आने के बाद भागवत की यात्रा पर सबकी नजरें टिक गई हैं। यह देखना अहम होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस मामले में कोई आधिकारिक कदम उठाता है या नहीं।

भारत पहले भी USCIRF की रिपोर्ट पर जता चुका है आपत्ति

USCIRF की भारत से जुड़ी रिपोर्टों को लेकर नई दिल्ली का रुख पहले भी स्पष्ट रहा है। भारत सरकार आयोग की रिपोर्टों को कई बार पक्षपातपूर्ण और चयनात्मक बताते हुए खारिज कर चुकी है।

भारत का कहना रहा है कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर तस्वीर पेश करते समय आयोग कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज करता है। इसी वजह से USCIRF और भारत सरकार के बीच लंबे समय से मतभेद देखने को मिलते रहे हैं।

RSS पर आरोपों को लेकर क्या है विवाद?

RSS पर धार्मिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं। संगठन इन आरोपों को खारिज करता रहा है और खुद को सामाजिक सेवा, राष्ट्र निर्माण तथा सामाजिक समरसता के लिए काम करने वाला संगठन बताता है।

USCIRF का ताजा बयान इसी पुराने विवाद को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले आया है। खासकर भागवत के अमेरिका दौरे से ठीक पहले यह मुद्दा ज्यादा चर्चा में है।

India-US Relations के बीच बढ़ी राजनीतिक हलचल

भारत और अमेरिका के संबंध कई क्षेत्रों में लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे में किसी अमेरिकी सरकारी आयोग की ओर से भारत के प्रमुख सामाजिक संगठनों में से एक RSS को लेकर इस तरह की सिफारिश राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि, अभी इसे India-US Relations में किसी बड़े संकट के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। USCIRF की सिफारिश और अमेरिकी सरकार के अंतिम निर्णय के बीच स्पष्ट अंतर है।

अभी सबसे बड़ी बात क्या है?

फिलहाल RSS पर अमेरिका में कोई नया प्रतिबंध लागू नहीं हुआ है। USCIRF ने कार्रवाई की सिफारिश की है। अब निगाहें अमेरिकी प्रशासन के रुख और मोहन भागवत के 29 अगस्त के New York कार्यक्रम पर रहेंगी।

भागवत की यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं, यह आने वाले दिनों में इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकता है।

Yukta

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Sajjan Kumar

Sajjan Kumar Death: 1984 सिख दंगा केस के दोषी सज्जन कुमार का निधन, तिहाड़ में काट रहे थे उम्रकैद

1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए गए पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार (Sajjan Kumar) का निधन हो गया है। 80 वर्षीय सज्जन कुमार दिल्ली की तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। सज्जन कुमार का नाम 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों में लंबे समय से चर्चा में रहा। दंगों के करीब चार दशक बाद अदालतों में चले मुकदमों के दौरान उनके खिलाफ गंभीर आरोप साबित हुए और उन्हें अलग-अलग मामलों में सजा सुनाई गई। तिहाड़ जेल में बंद थे सज्जन कुमार सज्जन कुमार को दिल्ली में 1984 की हिंसा से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिसंबर 2018 में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामला हिंसा के दौरान पांच लोगों की हत्या से जुड़ा था। इसके बाद भी उनके खिलाफ अन्य मामलों में कानूनी कार्रवाई जारी रही। 2025 में एक अन्य 1984 दंगा मामले में भी अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। इन मामलों के चलते वह तिहाड़ जेल में बंद थे। 1984 के दंगों से कैसे जुड़ा था मामला? 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी हिंसा भड़क गई थी। राजधानी दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और कई परिवारों को हिंसा का सामना करना पड़ा। सज्जन कुमार पर इसी हिंसा के दौरान लोगों को भड़काने और हत्या से जुड़े मामलों में आरोप लगे थे। हालांकि, उनके खिलाफ दर्ज मामलों में अदालतों के फैसले अलग-अलग रहे। कुछ मामलों में मिली थी राहत सज्जन कुमार को सभी मामलों में दोषी नहीं ठहराया गया। जनवरी 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने जनकपुरी और विकासपुरी इलाके में 1984 की हिंसा से जुड़े एक मामले में उन्हें बरी कर दिया था। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इससे साफ है कि उनके खिलाफ चले अलग-अलग मामलों में न्यायिक फैसले एक जैसे नहीं रहे। राजनीति से जेल तक का सफर सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में रहे और लोकसभा सांसद भी बने। लेकिन 1984 के दंगा मामलों ने उनके राजनीतिक जीवन पर लंबे समय तक असर डाला। कई वर्षों तक चली जांच और अदालती सुनवाई के बाद उन्हें कुछ मामलों में दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा मिली। अब उनके निधन के साथ 1984 दंगा मामलों से जुड़ा उनका लंबा कानूनी और राजनीतिक अध्याय समाप्त हो गया है। हालांकि, 1984 की हिंसा आज भी हजारों प्रभावित परिवारों के लिए एक बेहद संवेदनशील अध्याय है। Sajjan Kumar Death पर क्यों है चर्चा? सज्जन कुमार की मौत की खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों में न्याय की प्रक्रिया कई दशकों तक चली। उनके खिलाफ कुछ मामलों में दोषसिद्धि हुई, जबकि कुछ में उन्हें अदालत से राहत भी मिली। यही वजह है कि उनके निधन के बाद एक बार फिर 1984 के दंगा मामलों और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Chamoli

Dog Attack in Chamoli: कुत्तों के आतंक से सहमे लोग, 10 स्कूल बंद; बच्चों की पढ़ाई Online

उत्तराखंड के चमोली (Chamoli) जिले के नारायणबगड़ इलाके में इन दिनों आवारा कुत्तों का आतंक लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। लगातार सामने आ रही हमले की घटनाओं के बाद बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने इलाके के 10 स्कूलों को चार दिन के लिए बंद रखने का फैसला किया है। स्कूल बंद होने के बावजूद बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए Online Classes चलाने के निर्देश दिए गए हैं। बच्चों को स्कूल भेजने से डर रहे अभिभावक नारायणबगड़ और आसपास के इलाकों में कुत्तों के आक्रामक व्यवहार से स्थानीय लोगों में डर बढ़ गया है। खासकर सुबह स्कूल जाने और छुट्टी के समय बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावक चिंतित हैं। हालात ऐसे बने कि कई लोग जरूरी काम से बाहर निकलते समय भी हाथ में डंडा लेकर चलने को मजबूर हैं। स्थानीय स्तर पर कुत्तों के हमले की कई घटनाएं सामने आने के बाद प्रशासन ने स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद रखने का निर्णय लिया। अधिकारियों का मानना है कि स्थिति सामान्य होने तक बच्चों को स्कूल बुलाना जोखिम भरा हो सकता है। 20 से 23 अगस्त तक बंद रहेंगे 10 स्कूल प्रशासन के निर्देश के अनुसार नारायणबगड़ क्षेत्र के 10 विद्यालय 20, 21, 22 और 23 अगस्त को बंद रहेंगे। इस दौरान बच्चों को स्कूल नहीं बुलाया जाएगा। हालांकि, शिक्षकों को Online माध्यम से पढ़ाई जारी रखने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि चार दिन के अवकाश का असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर न पड़े। यह फैसला स्थानीय लोगों और अभिभावकों की चिंता को देखते हुए लिया गया है। स्कूलों को बंद करने का उद्देश्य बच्चों को आवारा कुत्तों के संभावित हमलों से सुरक्षित रखना है। कुत्तों को पकड़ने का अभियान तेज मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने आवारा कुत्तों को पकड़ने की कार्रवाई भी शुरू कर दी है। वन विभाग की Quick Response Team यानी QRT को अभियान में लगाया गया है। वहीं पशुपालन विभाग की टीम कुत्तों को Anti-Rabies Vaccine देने का काम कर रही है। प्रशासन की कोशिश है कि जिन इलाकों में कुत्तों का आतंक ज्यादा है, वहां उनकी संख्या और गतिविधियों को नियंत्रित किया जाए। साथ ही लोगों को भी सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। 600+ बच्चों की Online पढ़ाई? इस मामले को लेकर कुछ रिपोर्टों में 600 से ज्यादा बच्चों के Online Classes से जुड़ने की बात कही जा रही है। हालांकि, उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी में विद्यार्थियों की कुल संख्या का स्पष्ट आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है। इसलिए 600+ का आंकड़ा प्रकाशित करते समय आधिकारिक पुष्टि को प्राथमिकता देना जरूरी है। कब खुलेगा स्कूल, अभी स्थिति पर नजर फिलहाल चार दिनों के लिए स्कूल बंद रखने का फैसला लिया गया है। इसके बाद इलाके की स्थिति की समीक्षा की जाएगी। अगर कुत्तों का खतरा कम होता है तो स्कूल दोबारा खोले जा सकते हैं। नारायणबगड़ में इस समय सबसे बड़ी चिंता बच्चों की सुरक्षा को लेकर है। प्रशासन की कार्रवाई से लोगों को राहत की उम्मीद है, लेकिन स्थानीय लोगों की नजर अब इस बात पर है कि आवारा कुत्तों की समस्या का स्थायी समाधान कब तक निकलता है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Economic D-Day

Trump का Iran पर Economic D-Day: तेल तस्करी से जुड़े नेटवर्क होंगे निशाने पर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ आर्थिक मोर्चे पर अब तक का सबसे बड़ा दबाव बनाने का ऐलान किया है। Trump ने इसे “Economic D-Day” बताते हुए कहा कि अमेरिका ईरान की आर्थिक ताकत और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को कमजोर करने के लिए व्यापक कार्रवाई करेगा। साथ ही उन्होंने उन देशों, कंपनियों और संस्थानों को भी चेतावनी दी है, जो ईरान को किसी तरह की आर्थिक मदद या कारोबारी रास्ता उपलब्ध करा रहे हैं। ईरान के खिलाफ अब Economic Warfare ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका का नया अभियान सिर्फ सामान्य प्रतिबंधों तक सीमित नहीं रहेगा। उनका लक्ष्य ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करना है। ट्रम्प के मुताबिक, ईरान को समझौते का मौका दिया गया, लेकिन बातचीत में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। इसके बाद वॉशिंगटन ने आर्थिक दबाव को और बढ़ाने का फैसला किया है। ट्रम्प ने इसे किसी देश के खिलाफ की जाने वाली सबसे कड़ी आर्थिक कार्रवाई बताया है। हालांकि, घोषणा के समय सभी नए प्रतिबंधों का विस्तृत खाका सार्वजनिक नहीं किया गया है। Oil Smuggling Network पर अमेरिका की नजर नई कार्रवाई का सबसे अहम हिस्सा ईरान के Oil Smuggling Network को निशाना बनाना है। अमेरिका उन रास्तों को बंद करना चाहता है जिनके जरिए ईरान प्रतिबंधों के बावजूद तेल बेचकर विदेशी मुद्रा हासिल करता है। ट्रम्प ने तेल की कथित तस्करी के अलावा Cash Transfers, Currency Exchange, Financial Swap Lines, Ship Registries और Front Companies जैसे नेटवर्क का भी जिक्र किया है। इन माध्यमों पर कार्रवाई से ईरान की विदेशों तक पहुंच और कारोबार प्रभावित हो सकता है। मदद करने वाले देशों को भी सीधी चेतावनी ट्रम्प का संदेश सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा है कि जो देश, बैंक, कारोबारी संस्थान, एयरपोर्ट या सरकारी एजेंसियां ईरान को आर्थिक “lifeline” उपलब्ध कराती हैं, उन्हें भी गंभीर आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इससे अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा दूसरे देशों तक पहुंचने की आशंका बढ़ गई है। यानी आने वाले दिनों में ईरान के साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर भी अमेरिकी दबाव बढ़ सकता है। UAE ने भी ईरान के साथ कारोबार रोका इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ईरान के साथ व्यापार और वित्तीय लेनदेन निलंबित करने का फैसला किया है। ईरान के साथ कारोबार के लिए UAE लंबे समय से एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय केंद्र रहा है। ऐसे में यह फैसला तेहरान के लिए आर्थिक तौर पर अहम झटका माना जा रहा है। UAE का यह कदम ऐसे समय आया है जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव पहले से काफी बढ़ा हुआ है। इससे ईरान के व्यापारिक और वित्तीय नेटवर्क पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। China की भूमिका पर भी नजर ईरान के तेल कारोबार में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए अगर अमेरिका प्रतिबंधों का दायरा ईरान के साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों तक बढ़ाता है, तो इसका असर अमेरिका-चीन संबंधों पर भी पड़ सकता है। Reuters के अनुसार, चीन ईरानी तेल का प्रमुख खरीदार है। यही वजह है कि आने वाले समय में Washington के अगले कदम पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। Strait of Hormuz से बढ़ी Global चिंता ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव के बीच Strait of Hormuz भी अंतरराष्ट्रीय चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है। यह दुनिया के महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां शिपिंग में किसी भी बड़े व्यवधान का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। गुरुवार को भी Middle East तनाव के बीच तेल की कीमतों में तेजी देखी गई। Reuters के मुताबिक, Brent crude करीब चार सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंच गया। आगे क्या होगा? ट्रम्प के इस ऐलान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच आर्थिक टकराव और बढ़ने की संभावना है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका आगे किन देशों, कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर कार्रवाई करता है। फिलहाल तस्वीर साफ है—Washington अब Tehran पर सिर्फ प्रतिबंधों का दबाव नहीं बढ़ा रहा, बल्कि उसके तेल, वित्त और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। अगर यह अभियान बड़े पैमाने पर लागू होता है, तो इसका असर ईरान के साथ-साथ वैश्विक तेल बाजार और दूसरे देशों के कारोबार पर भी पड़ सकता है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Gold-Silver

Gold-Silver Rate: सोना-चांदी ने फिर पकड़ी रफ्तार, जानिए आज का ताजा भाव

सोना-चांदी (Gold-Silver) खरीदने वालों के लिए आज का दिन खास रहा। सराफा बाजार में दोनों कीमती धातुओं के दाम में जोरदार तेजी देखने को मिली। चांदी की कीमत एक ही कारोबारी सत्र में ₹9,260 बढ़कर करीब ₹2.38 लाख प्रति किलो पहुंच गई। वहीं, 10 ग्राम सोने का भाव भी ₹3,519 चढ़कर करीब ₹1.57 लाख तक पहुंच गया। कीमती धातुओं की कीमतों में इस तेजी ने निवेशकों के साथ-साथ उन लोगों का भी ध्यान खींचा है, जो आने वाले समय में शादी या किसी खास मौके के लिए सोना-चांदी खरीदने की तैयारी कर रहे हैं। Silver Price में बड़ा उछाल चांदी की कीमत में हुई तेजी इस बार सबसे ज्यादा चर्चा में है। करीब ₹9 हजार से ज्यादा की बढ़त के बाद चांदी का भाव ₹2.38 लाख प्रति किलो के आसपास पहुंच गया है। चांदी की कीमत में तेजी के पीछे घरेलू मांग के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार की चाल और औद्योगिक मांग को भी अहम माना जाता है। चांदी का इस्तेमाल सिर्फ गहनों और निवेश के लिए ही नहीं होता, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और कई औद्योगिक क्षेत्रों में भी किया जाता है। इसलिए इसकी कीमत पर वैश्विक आर्थिक गतिविधियों का असर तेजी से दिखाई देता है। Gold Price भी हुआ महंगा चांदी के साथ सोने ने भी तेजी दिखाई। 10 ग्राम सोने की कीमत में ₹3,519 का इजाफा हुआ और भाव करीब ₹1.57 लाख तक पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की मजबूती और निवेशकों की सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ती दिलचस्पी ने घरेलू बाजार को भी सहारा दिया। हाल के कारोबार में कमजोर डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी जैसे संकेतों ने भी सोने की कीमत को सपोर्ट किया है। ऐसे माहौल में निवेशक अक्सर Gold को सुरक्षित विकल्प के तौर पर देखते हैं। क्या ₹1.70 लाख तक पहुंच सकता है Gold? अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सोने का भाव इस साल ₹1.70 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुंच सकता है? बाजार में ऐसी संभावनाओं को लेकर चर्चा जरूर है, लेकिन कीमत का अगला स्तर कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। अमेरिकी फेड की ब्याज दर नीति, डॉलर की चाल, महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी सोने की दिशा तय करने वाले प्रमुख फैक्टर हैं। अगर इन परिस्थितियों से सोने को लगातार समर्थन मिलता रहा, तो आने वाले महीनों में नए रिकॉर्ड देखने को मिल सकते हैं। खरीदारों के लिए क्या है मतलब? सोने-चांदी की लगातार बढ़ती कीमतों से आम खरीदारों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। खासकर शादी-ब्याह के सीजन में बड़ी मात्रा में खरीदारी करने वालों के लिए कुछ हजार रुपये का अंतर भी बजट पर असर डाल सकता है। हालांकि, सिर्फ तेजी देखकर जल्दबाजी में खरीदारी करना सही रणनीति नहीं मानी जाती। अगर खरीदारी जरूरी है तो स्थानीय सराफा बाजार का ताजा भाव, GST और making charges की जानकारी लेने के बाद ही फैसला करना बेहतर रहेगा। Gold-Silver Rate में आगे भी उतार-चढ़ाव संभव सोना और चांदी इस समय ऊंचे स्तरों पर कारोबार कर रहे हैं। ऐसे में आगे भी तेजी और मुनाफावसूली दोनों देखने को मिल सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला छोटा बदलाव भी घरेलू कीमतों पर असर डाल सकता है। फिलहाल चांदी में ₹9,260 की छलांग और सोने में ₹3,519 की बढ़त ने बाजार की तस्वीर जरूर बदल दी है। अगर वैश्विक परिस्थितियां कीमती धातुओं के पक्ष में बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में सोना-चांदी नए स्तरों की ओर बढ़ते नजर आ सकते हैं। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Vande Mataram

Vande Mataram Controversy: 1937 के फैसले पर BJP-Congress आमने-सामने, शाह ने साधा निशाना

‘वंदे मातरम्’ को लेकर BJP और Congress के बीच सियासी तकरार एक बार फिर तेज हो गई है। कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) ने 19 अगस्त को साफ किया कि पार्टी अपने कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो पद ही गाएगी और 1937 के फैसले को ही जारी रखेगी। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला और इस फैसले को तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ दिया। अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना अमित शाह ने कांग्रेस के मौजूदा रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि 1937 में कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ के पूरे स्वरूप के बजाय कुछ हिस्सों को अपनाने का फैसला किया था। शाह ने आरोप लगाया कि यह फैसला तुष्टीकरण की राजनीति से प्रभावित था। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘वंदे मातरम्’ के मूल स्वरूप और उसके ऐतिहासिक महत्व को फिर से सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। शाह ने कांग्रेस से अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग भी की है। Congress का 1937 वाला रुख बरकरार कांग्रेस ने इस विवाद में अपना पक्ष बदलने से इनकार कर दिया है। CWC ने दोहराया कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। कांग्रेस इसे 1937 में लिए गए ऐतिहासिक फैसले की निरंतरता बता रही है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि उस समय गीत के बाद के हिस्सों में धार्मिक संदर्भों को लेकर अलग-अलग समुदायों की भावनाओं पर चर्चा हुई थी। इसी पृष्ठभूमि में सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए शुरुआती दो पदों को अपनाने का फैसला किया गया था। विवाद की एक और कड़ी: Independence Day कार्यक्रम ‘वंदे मातरम्’ विवाद सिर्फ 1937 के फैसले तक सीमित नहीं है। स्वतंत्रता दिवस के दौरान कांग्रेस मुख्यालय में गीत के दौरान कथित तौर पर हुई घटना को लेकर भी BJP ने कांग्रेस पर निशाना साधा था। अमित शाह ने कांग्रेस और सोनिया गांधी पर गीत के अपमान का आरोप लगाते हुए माफी की मांग की। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि गीत को रोकने की कोई मंशा नहीं थी। BJP और Congress के बीच बढ़ी बयानबाजी विवाद बढ़ने के साथ दोनों पार्टियों के नेताओं के बयान भी तीखे होते जा रहे हैं। BJP की ओर से कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। BJP अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस के 1937 वाले रुख की आलोचना की। दूसरी ओर, कांग्रेस नेताओं ने BJP पर इस मुद्दे को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और अन्य नेताओं ने BJP तथा RSS की भूमिका को लेकर सवाल उठाए। 1937 का फैसला फिर चर्चा में क्यों? ‘वंदे मातरम्’ का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा संबंध रहा है। 1937 में कांग्रेस के भीतर इसके सार्वजनिक गायन के स्वरूप को लेकर चर्चा हुई थी। बाद में शुरुआती दो पदों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल करने की परंपरा बनी। यही पुराना फैसला आज की राजनीति में फिर चर्चा का केंद्र बन गया है। कांग्रेस इसे ऐतिहासिक और सर्वसम्मति से जुड़ा निर्णय बता रही है, जबकि BJP इसे तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण मान रही है। Modi सरकार के कदम से बढ़ी बहस विवाद के बीच केंद्र सरकार की ओर से ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण स्वरूप को आधिकारिक कार्यक्रमों में महत्व देने की पहल भी चर्चा में है। सरकार इसे गीत की ऐतिहासिक भूमिका और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े राष्ट्रीय भाव से जोड़ रही है। ऐसे में एक तरफ BJP इसे देश की राष्ट्रीय भावना से जुड़ा विषय बता रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस अपने 1937 के फैसले को सही ठहरा रही है। अब मुद्दा सिर्फ गीत का नहीं, सियासत का भी ‘वंदे मातरम्’ पर छिड़ी ताजा बहस ने इतिहास और राजनीति को एक ही मंच पर ला दिया है। अमित शाह के बयान के बाद कांग्रेस और BJP के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने के संकेत हैं। फिलहाल कांग्रेस अपने 1937 के रुख पर कायम है और BJP इसे बदलने की मांग कर रही है। ऐसे में ‘वंदे मातरम्’ आने वाले दिनों में भी देश की राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बना रह सकता है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!

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