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Hormuz पर Iran का नया Plan: Ships से वसूलेगा Fee, बदले में देगा Security और Insurance

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ईरान ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में शामिल Strait of Hormuz को लेकर एक बड़ा फैसला आगे बढ़ाया है। ईरानी संसद की National Security and Foreign Policy Commission ने ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके तहत होर्मुज से गुजरने वाले अधिकृत जहाजों से अलग-अलग Maritime Services के बदले शुल्क लिया जा सकेगा। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब क्षेत्र में तनाव और Shipping को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

Navigation से लेकर Insurance तक लगेगी Fee

प्रस्ताव के Article 3 के तहत जहाजों से Navigation, Environmental Services, विशेष परिस्थितियों में Fuel Supply, Insurance और Security जैसी सेवाओं के लिए शुल्क लिया जा सकता है। ईरानी समिति के प्रवक्ता हसन काशकवी के मुताबिक, Payment ईरानी रियाल में या तेहरान की ओर से तय की गई किसी दूसरी Currency में किया जा सकता है।

यानी मामला सिर्फ रास्ते से गुजरने की फीस तक सीमित नहीं है। ईरान इसे होर्मुज में उपलब्ध कराई जाने वाली Maritime और Security Services के बदले Payment व्यवस्था के तौर पर पेश कर रहा है।

अभी लागू नहीं हुआ है नया Toll System

इस खबर का सबसे अहम पहलू यह है कि संसदीय समिति की मंजूरी के बाद भी यह व्यवस्था अभी कानून नहीं बनी है। प्रस्ताव को पहले पूरी संसद से मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद Guardian Council इसकी समीक्षा करेगा और अंतिम संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर इसे लागू किया जा सकता है।

इसलिए फिलहाल इसे ईरान का proposed Hormuz fee system कहना ज्यादा सही होगा।

क्यों अहम है होर्मुज का यह कदम?

Strait of Hormuz दुनिया के Energy Trade के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां से तेल और गैस की आवाजाही में किसी भी तरह की बड़ी रुकावट का असर सिर्फ Middle East तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार, Shipping Cost और Fuel Prices पर भी पड़ सकता है। मौजूदा तनाव के बीच इस जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही पहले ही काफी प्रभावित हुई है।

ऐसे में अगर ईरान की नई Fee व्यवस्था आगे बढ़ती है, तो Shipping कंपनियों के लिए लागत और जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं।

Payment को लेकर भी ईरान का अलग रुख

प्रस्ताव में Payment के लिए Iranian Rial का विकल्प खास तौर पर महत्वपूर्ण है। इससे तेहरान को अपनी राष्ट्रीय मुद्रा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का मौका मिल सकता है। हालांकि अंतिम नियमों में किस Currency में और किस तरीके से Payment लिया जाएगा, यह आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्पष्ट होगा।

सुरक्षा के नाम पर Fee, लेकिन बढ़ सकती है चिंता

ईरान का तर्क है कि वह अपने Coastal State Rights और समुद्री सुरक्षा से जुड़े अधिकारों के तहत यह व्यवस्था बना रहा है। प्रस्ताव में Navigation और Security जैसी सेवाओं के लिए शुल्क लेने की बात कही गई है। दूसरी तरफ, Shipping Industry के लिए सवाल यह है कि Iran को किया गया Payment अंतरराष्ट्रीय Sanctions और Insurance Rules के लिहाज से किस तरह देखा जाएगा।

होर्मुज पर बढ़ता दबाव

इस बीच ईरानी अधिकारियों की ओर से होर्मुज को लेकर बयान भी सख्त रहे हैं। ईरान ने अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ने की स्थिति में Persian Gulf से Oil Exports को प्रभावित करने की चेतावनी दी है। इससे यह जलमार्ग एक बार फिर Global Energy Market के केंद्र में आ गया है।

आगे क्या होगा?

अब निगाहें ईरानी संसद की अगली प्रक्रिया पर हैं। अगर प्रस्ताव को संसद और Guardian Council से मंजूरी मिलती है, तो होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए नई Fee व्यवस्था का रास्ता साफ हो सकता है।

फिलहाल इतना तय है कि Iran-Hormuz विवाद अब सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि इसके आर्थिक और Shipping से जुड़े असर भी सामने आने लगे हैं। आने वाले दिनों में इस प्रस्ताव की अंतिम शर्तें और Fee Structure स्पष्ट होने के बाद तस्वीर और साफ होगी।

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Yukta

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Balen Shah

Balen Shah से मोहभंग? Nepal के Gen-Z PM के 150 दिन, उपलब्धियों से ज्यादा विवाद

नेपाल की राजनीति में बालेन शाह (Balen Shah) का नाम कभी बदलाव, युवा सोच और पुरानी व्यवस्था को चुनौती देने वाले नेता के तौर पर लिया जाता था। Gen-Z के बीच उनकी लोकप्रियता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई और सत्ता तक पहुंचाया। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के करीब 150 दिन बाद सवाल उठने लगा है—क्या जनता का अपने इस नए नेता से मोहभंग होने लगा है? बालेन शाह के सामने अब वह चुनौती है, जो किसी भी नए नेता के लिए सबसे मुश्किल होती है। चुनावी वादों और उम्मीदों को जमीन पर उतारना। शुरुआती महीनों में सरकार ने कई फैसलों को अपनी उपलब्धि बताया है, लेकिन संसद से दूरी, राजनीतिक संवाद और जनता से जुड़े विवादों ने उनकी सरकार की छवि को झटका दिया है। Balen Shah के 150 दिन: उम्मीद बड़ी, सवाल भी बड़े बालेन शाह ने 27 मार्च 2026 को नेपाल के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। इससे पहले काठमांडू के मेयर के तौर पर उन्होंने अपनी सख्त और सीधे फैसले लेने वाली कार्यशैली से खूब सुर्खियां बटोरी थीं। यही वजह थी कि जब उनकी पार्टी RSP को चुनाव में बड़ी सफलता मिली तो युवाओं को लगा कि नेपाल की राजनीति में अब कुछ अलग होने वाला है। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें सिर्फ लोकप्रिय नेता नहीं, बल्कि एक पूरी सरकार चलाने वाले मुखिया के तौर पर खुद को साबित करना पड़ा। सरकार का दावा है कि उसके शुरुआती एजेंडे पर अच्छी प्रगति हुई है। हालांकि, विपक्ष और आलोचकों की नजर में तस्वीर इतनी आसान नहीं है। Parliament से दूरी बनी बड़ा मुद्दा बालेन शाह की कार्यशैली पर सबसे ज्यादा सवाल उनकी Parliament Attendance को लेकर उठ रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती 39 संसदीय बैठकों में प्रधानमंत्री केवल 5 बैठकों में मौजूद रहे। विपक्षी सांसदों ने इसे गंभीर मुद्दा बनाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को संसद में उपस्थित होकर सरकार के कामकाज और नीतियों पर जवाब देना चाहिए। अब संसद के स्पीकर ने बालेन शाह को 26 अगस्त को सदन में मौजूद होकर सांसदों के सवालों का जवाब देने को कहा है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस नेता से युवाओं ने पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद की थी, उसी की संसद में कम मौजूदगी अब राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। जनता के मुद्दों पर सरकार घिरी काठमांडू में अनौपचारिक बस्तियों और जमीन पर रहने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी। प्रभावित लोगों ने पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। जुलाई में एक राइड-शेयर ड्राइवर की मौत के बाद भी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठे। इस घटना ने अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों और प्रशासन के बीच तनाव को सामने ला दिया। इन घटनाओं ने सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—सख्त प्रशासन और संवेदनशील शासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? Foreign Policy पर भी बढ़ी नजर प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह की विदेश नीति भी चर्चा में रही। भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ संबंध नेपाल के लिए हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहे हैं। बालेन शाह के कुछ बयानों और राजनयिक गतिविधियों को लेकर राजनीतिक बहस हुई। हालांकि बाद में उन्होंने भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात भी की। RSP प्रमुख रबी लामिछाने की भारत यात्रा और वहां हुई मुलाकातों ने भी नेपाल की राजनीति में अलग चर्चा पैदा की। इससे यह सवाल उठा कि पार्टी और सरकार के बीच विदेश नीति को लेकर तालमेल कितना मजबूत है। RSP के अंदर भी सबकुछ ठीक है? बालेन शाह के लिए एक और चुनौती अपनी ही पार्टी के भीतर बेहतर तालमेल बनाए रखना है। रिपोर्टों के मुताबिक, 21 अगस्त को RSP की केंद्रीय समिति की अहम बैठक में बालेन शाह शामिल नहीं हुए। बैठक में स्थानीय चुनावों की तैयारियों समेत कई राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होनी थी। प्रधानमंत्री का बैठक में शामिल नहीं होना पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और नेतृत्व को लेकर अटकलों का कारण बना। हालांकि, इसे सीधे तौर पर किसी बड़े राजनीतिक टकराव का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। Gen-Z का भरोसा अब सबसे बड़ी परीक्षा बालेन शाह की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत Gen-Z और युवा मतदाताओं का समर्थन रही है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पुराने राजनीतिक दलों से नाराज युवाओं ने उन्हें बदलाव के चेहरे के रूप में देखा। लेकिन सरकार बनने के बाद तस्वीर बदलती है। अब सिर्फ भाषण या लोकप्रिय छवि काफी नहीं है। रोजगार, महंगाई, प्रशासन, भ्रष्टाचार और रोजमर्रा की समस्याओं पर जनता ठोस नतीजे चाहती है। यही वजह है कि बालेन शाह के लिए आने वाले महीने बेहद अहम हैं। Balen Shah का Report Card: पास या फेल? 150 दिनों के आधार पर बालेन शाह सरकार को सीधे तौर पर Fail कहना सही नहीं होगा। सरकार ने कुछ फैसलों और प्रशासनिक सुधारों को अपनी उपलब्धि बताया है। लेकिन दूसरी तरफ संसद से दूरी, जनता से जुड़े विवाद और राजनीतिक संवाद की कमी ने कई सवाल खड़े किए हैं। असल परीक्षा अब शुरू होती है। बालेन शाह को यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ Gen-Z के लोकप्रिय नेता नहीं, बल्कि नेपाल को लंबे समय तक प्रभावी तरीके से चलाने वाले प्रधानमंत्री भी हैं। जनता ने उन्हें बदलाव के नाम पर मौका दिया है। अब जनता को नारे नहीं, Result चाहिए। यही आने वाले समय में बालेन शाह के राजनीतिक भविष्य का सबसे बड़ा पैमाना बनेगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
5-Day Banking

5-Day Banking का इंतजार खत्म होगा? Bank Unions ने दी Strike की चेतावनी, ग्राहकों पर भी असर

बैंक में काम कराने वाले ग्राहकों के लिए आने वाले दिन थोड़े मुश्किल हो सकते हैं। 5-Day Banking की मांग को लेकर बैंक कर्मचारी संगठनों ने एक बार फिर आंदोलन तेज करने का फैसला किया है। कर्मचारियों की मांग है कि दूसरे और चौथे शनिवार की मौजूदा छुट्टी व्यवस्था को बदलकर हर शनिवार और रविवार को बैंक बंद रखा जाए। बैंक यूनियनों का कहना है कि पांच दिन का बैंकिंग सप्ताह लागू करने का प्रस्ताव लंबे समय से लंबित है। अब इस मुद्दे पर सरकार और बैंक प्रबंधन पर दबाव बनाने के लिए देशभर में प्रदर्शन और हड़ताल की तैयारी की जा रही है। दो साल से फैसले का इंतजार बैंक कर्मचारियों के मुताबिक, मार्च 2024 में हुए 12वें Bipartite Settlement में पांच दिन की बैंकिंग व्यवस्था को लेकर सहमति बनी थी। प्रस्ताव में शनिवार की छुट्टी के बदले सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना काम के समय में करीब 40 मिनट बढ़ाने का सुझाव दिया गया था। यानी कर्मचारियों के काम के कुल घंटों में बड़ी कटौती किए बिना शनिवार की छुट्टी देने की योजना है। इसके बावजूद प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है। यही वजह है कि बैंक यूनियनों का गुस्सा अब बढ़ता जा रहा है। अभी क्या है Bank Holiday का नियम? फिलहाल बैंकों में हर महीने दूसरे और चौथे शनिवार को छुट्टी रहती है। बाकी शनिवार को बैंक शाखाएं खुलती हैं। रविवार को सामान्य तौर पर बैंक बंद रहते हैं। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि जब अधिकांश सरकारी और निजी संस्थानों में पांच दिन का कार्य सप्ताह लागू है, तो बैंक कर्मचारियों को भी यह सुविधा मिलनी चाहिए। हड़ताल हुई तो Banking Services पर असर बैंक यूनियनों की ओर से आंदोलन आगे बढ़ने पर ग्राहकों को शाखाओं से जुड़े कामों में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। कैश जमा करने, निकासी, चेक से जुड़े काम और अन्य branch-based services प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि UPI, ATM, Mobile Banking और Internet Banking जैसी डिजिटल सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहने की उम्मीद रहती है। फिर भी हड़ताल के दौरान किसी खास बैंक की सेवाओं पर स्थानीय स्तर पर असर पड़ सकता है। सिर्फ 5-Day Banking ही नहीं, PLI भी मुद्दा बैंक कर्मचारियों की नाराजगी केवल पांच दिन की बैंकिंग व्यवस्था तक सीमित नहीं है। यूनियनों ने Performance Linked Incentive (PLI) से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी आपत्ति जताई है। संगठनों का कहना है कि कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए PLI व्यवस्था पर उचित बातचीत होनी चाहिए। इसी के साथ बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी अन्य लंबित मांगों को भी आंदोलन में शामिल किया गया है। Bank Customers के लिए क्या जरूरी? अगर हड़ताल की तारीख तय होती है, तो ग्राहकों के लिए बेहतर होगा कि वे जरूरी बैंकिंग काम पहले ही निपटा लें। खासकर कैश, चेक या शाखा में जाकर होने वाले काम को हड़ताल की संभावित तारीखों से पहले पूरा करना सुविधाजनक रहेगा। डिजिटल बैंकिंग का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों पर असर अपेक्षाकृत कम पड़ सकता है, लेकिन किसी भी जरूरी लेनदेन के लिए बैंक की आधिकारिक सूचना जरूर देखनी चाहिए। अब सरकार के फैसले पर नजर 5-Day Banking का मुद्दा बैंक कर्मचारियों और ग्राहकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण बन चुका है। कर्मचारी इसे लंबे समय से लंबित मांग बता रहे हैं, जबकि सरकार और बैंकिंग व्यवस्था के लिए इसका मतलब काम के घंटे, शाखाओं की उपलब्धता और ग्राहक सेवा के बीच संतुलन बनाना है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और बैंक प्रबंधन इस मांग पर कब अंतिम फैसला लेते हैं। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकला तो बैंक यूनियनों का आंदोलन आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है।
शिवराज सिंह चौहान

2029 में बदल सकता है Election System! शिवराज सिंह चौहान बोले- 2034 तक इंतजार जरूरी नहीं

One Nation One Election को लेकर देश की राजनीति में फिर से चर्चा तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के एक बयान ने इस मुद्दे को नई हवा दे दी है। चौहान ने कहा है कि देश को एक साथ चुनाव की व्यवस्था के लिए 2034 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है, इसे 2029 में ही लागू किया जा सकता है। उनके इस बयान के बाद अब सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या 2029 Lok Sabha Election के साथ देश में विधानसभा चुनाव भी एक साथ कराए जा सकते हैं। क्या 2029 में बदल जाएगा Election System? One Nation One Election का मतलब लोकसभा और राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराना है। इसका मकसद देश में बार-बार होने वाले चुनावों की प्रक्रिया को कम करना और एक तय चुनावी चक्र तैयार करना है। शिवराज सिंह चौहान के बयान ने इस संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है। हालांकि, इसे लागू करने के लिए कई संवैधानिक और कानूनी बदलाव जरूरी होंगे। इसलिए अंतिम फैसला संसद की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगा। One Nation One Election पर JPC कर रही विचार इस प्रस्ताव से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर Joint Parliamentary Committee (JPC) विचार कर रही है। समिति में इस व्यवस्था के फायदे, चुनौतियां और संभावित कानूनी प्रावधानों पर चर्चा हो रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी राज्य में सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिर जाती है या विधानसभा भंग हो जाती है, तो एक साथ चुनाव की व्यवस्था कैसे बनी रहेगी। इसी तरह लोकसभा की स्थिति को लेकर भी स्पष्ट नियम बनाने होंगे। सरकार के मुताबिक क्या होगा फायदा? One Nation One Election के समर्थकों का मानना है कि बार-बार चुनाव कराने से सरकारी संसाधनों और प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव पड़ता है। चुनाव के दौरान बड़ी संख्या में कर्मचारियों और सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ती है। इसके अलावा Model Code of Conduct लागू होने के कारण कई नए सरकारी फैसलों और योजनाओं की घोषणा पर भी रोक लग जाती है। समर्थकों का कहना है कि चुनावों को एक साथ कराने से प्रशासन को लंबे समय तक विकास कार्यों पर ध्यान देने का मौका मिल सकता है। भारत में पहले हो चुके हैं Simultaneous Elections भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का प्रयोग पहले भी हो चुका है। आजादी के बाद शुरुआती चुनावों में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। 1952, 1957, 1962 और 1967 में देश में बड़े पैमाने पर चुनाव एक साथ हुए थे। बाद में कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग हुईं और धीरे-धीरे लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों का चक्र अलग होता चला गया। विपक्ष की क्या है चिंता? One Nation One Election को लेकर विपक्षी दलों की अपनी चिंताएं हैं। उनका कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने से राज्य स्तर के मुद्दों और क्षेत्रीय दलों को नुकसान हो सकता है। विपक्ष की ओर से संघीय ढांचे को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। उनका तर्क है कि केंद्र और राज्य के चुनावों में मतदाताओं के सामने अलग-अलग मुद्दे होते हैं, इसलिए दोनों चुनावों को एक साथ कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। अब 2029 पर रहेगी नजर फिलहाल One Nation One Election को लेकर अंतिम फैसला अभी बाकी है। कानून में बदलाव और संविधान संशोधन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही यह साफ होगा कि इसे किस समय से लागू किया जा सकता है। लेकिन शिवराज सिंह चौहान के 2029 वाले बयान ने चुनावी राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है। अगर जरूरी कानूनी प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भारत की चुनावी व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यानी अभी सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि One Nation One Election कब लागू होगा, बल्कि असली चर्चा अब इस बात पर है कि क्या देश 2034 से पहले ही यानी 2029 में एक साथ चुनाव की ओर कदम बढ़ा देगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Yogi

Yogi vs Congress: अयोध्या में Fish Feast पर घमासान, अजय राय ने मांगा सबूत

अयोध्या में कांग्रेस नेता अजय राय के दौरे के बाद शुरू हुआ Fish Feast विवाद अब उत्तर प्रदेश की सियासत में बड़ा मुद्दा बन गया है। सावन के बीच अयोध्या में मछली भोज की खबर सामने आने के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। CM Yogi ने अजय राय के साथ-साथ राहुल गांधी को भी निशाने पर लिया, जबकि कांग्रेस नेता ने आरोपों पर सबूत मांगा है। हनुमानगढ़ी में दर्शन, फिर Fish Feast पर विवाद अजय राय अयोध्या पहुंचे थे। यहां उन्होंने हनुमानगढ़ी में दर्शन किए। उनके दौरे के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों की ओर से स्वागत कार्यक्रम भी रखा गया। इसी कार्यक्रम से कथित तौर पर जुड़े Fish Feast की खबर सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। बीजेपी नेताओं और संतों ने सवाल उठाया कि धार्मिक नगरी अयोध्या में सावन के दौरान इस तरह का आयोजन क्यों किया गया। मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक इस पर खूब चर्चा होने लगी। योगी आदित्यनाथ का कांग्रेस पर हमला विवाद के बीच CM Yogi ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने अजय राय के अयोध्या दौरे और कथित मछली भोज को लेकर सवाल खड़े किए। Yogi ने कहा कि अगर किसी को मछली खानी थी तो अयोध्या से बाहर जाकर खा सकता था। उनके बयान के बाद यह मुद्दा और गरमा गया। मुख्यमंत्री ने इसी दौरान कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पर भी निशाना साधा। उन्होंने राहुल गांधी पर देश की विरासत और सनातन परंपराओं को लेकर आपत्तिजनक राजनीति करने का आरोप लगाया। योगी ने राहुल गांधी पर कथित रूप से ‘अर्बन नक्सली’ सोच से प्रभावित होने का भी आरोप लगाया। अजय राय का पलटवार- तस्वीर दिखाइए योगी के आरोपों के बाद अजय राय ने भी जवाब दिया। कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि उनके खिलाफ मछली भोज में शामिल होने का आरोप लगाया जा रहा है तो इसका प्रमाण सामने रखा जाए। अजय राय ने चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनकी ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसमें वह मछली भोज करते नजर आएं, तो वह इस्तीफा देने तक को तैयार हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना ठोस सबूत के उनके खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है। BJP और Congress में बढ़ी बयानबाजी अयोध्या का यह मामला अब सिर्फ एक कार्यक्रम या भोजन तक सीमित नहीं है। बीजेपी इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर कांग्रेस पर हमला कर रही है, जबकि कांग्रेस आरोपों के सबूत मांग रही है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, अयोध्या जैसे संवेदनशील और धार्मिक शहर से जुड़ा मामला होने के कारण इस विवाद का राजनीतिक असर सामान्य विवादों की तुलना में ज्यादा हो सकता है। क्या है पूरा विवाद? दरअसल, अजय राय के अयोध्या दौरे के दौरान उनके स्वागत कार्यक्रम और कथित मछली भोज को लेकर विवाद शुरू हुआ। बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाकर कांग्रेस पर निशाना साधा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस मामले पर बयान दिया। दूसरी ओर, अजय राय ने खुद मछली भोज में शामिल होने के आरोप को चुनौती देते हुए सबूत सार्वजनिक करने की मांग की है। ऐसे में विवाद के केंद्र में यही सवाल है कि कार्यक्रम में वास्तव में क्या हुआ और उसमें अजय राय की भूमिका क्या थी। फिलहाल अयोध्या का यह Fish Feast विवाद यूपी की राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। बीजेपी और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Gold

Gold-Silver Price Today: सोने की चमक बरकरार, ₹1.63 लाख के पार पहुंचा भाव; चांदी नरम

सोने (Gold) की कीमतों में तेजी का सिलसिला सोमवार, 24 अगस्त को भी जारी रहा। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन Gold Price में करीब ₹1,983 की बढ़ोतरी दर्ज की गई और 24 कैरेट सोने का भाव ₹1.63 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंच गया। दूसरी ओर, Silver Price में हल्की नरमी देखने को मिली और चांदी करीब ₹297 टूटकर ₹2.46 लाख प्रति किलो के स्तर पर आ गई। MCX पर शुरुआती कारोबार में सोने का भाव करीब ₹1,63,000 से ₹1,63,500 प्रति 10 ग्राम के आसपास रहा। वहीं चांदी करीब ₹2.46 लाख प्रति किलो पर कारोबार करती नजर आई। अगस्त में सोना करीब ₹20 हजार महंगा अगस्त का महीना सोने के लिए काफी मजबूत साबित हो रहा है। पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में तेजी इतनी तेज रही कि महज चार दिनों में सोने के भाव में करीब ₹8,200 से ₹8,400 प्रति 10 ग्राम की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। महीने की शुरुआत के मुकाबले सोने की कीमत में करीब ₹20 हजार तक का अंतर देखने को मिल रहा है। लगातार बढ़ते भाव ने उन लोगों की चिंता बढ़ा दी है, जो आने वाले दिनों में शादी या किसी दूसरे पारिवारिक कार्यक्रम के लिए सोना खरीदने की तैयारी कर रहे हैं। चांदी में क्यों आई गिरावट? जहां सोने ने सोमवार को तेजी दिखाई, वहीं चांदी में कुछ मुनाफावसूली देखने को मिली। कारोबार के दौरान चांदी करीब ₹2.46 लाख प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंची। पिछले कुछ सत्रों में तेजी के बाद निवेशकों की ओर से मुनाफा वसूली किए जाने को इसकी एक वजह माना जा रहा है। हालांकि, चांदी अभी भी ऊंचे स्तरों पर बनी हुई है। इसलिए बाजार में छोटी अवधि के उतार-चढ़ाव के बावजूद कीमती धातुओं पर निवेशकों की नजर लगातार बनी हुई है। Gold Rate बढ़ने की बड़ी वजह क्या है? अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की तेजी का असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। Reuters के मुताबिक, सोमवार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोना तीन महीने से ज्यादा के उच्च स्तर पर पहुंच गया। कमजोर अमेरिकी डॉलर ने सोने को सपोर्ट दिया है। इसके अलावा अमेरिकी महंगाई के आगामी आंकड़े और फेडरल रिजर्व के चेयर के बयान को लेकर बाजार में उत्सुकता है। ब्याज दरों को लेकर आने वाले संकेत सोने की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। Global Tension से भी सोने को सपोर्ट दुनियाभर में आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश करते हैं। मौजूदा समय में अमेरिका-ईरान तनाव और अन्य वैश्विक घटनाक्रमों ने बाजार की चिंता बढ़ाई है। ऐसे माहौल में सोने की मांग को सहारा मिल सकता है। यही वजह है कि डॉलर की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगाई के आंकड़े और फेड की नीतियों पर आने वाले संकेतों को सोने के बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आगे कैसा रहेगा Gold-Silver का भाव? आने वाले दिनों में सोने और चांदी के भाव में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। अमेरिकी आर्थिक आंकड़े, फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर संकेत, डॉलर की स्थिति और वैश्विक तनाव बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे। फिलहाल सोना मजबूत तेजी के साथ ऊंचे स्तर पर है, जबकि चांदी में आज थोड़ी नरमी आई है। ऐसे में खरीदारी करने वालों के लिए रोजाना के भाव पर नजर रखना जरूरी है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!

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