संसद (Parliament) के गलियारों में एक बार फिर हलचल तेज होने की चर्चा है। केंद्र सरकार इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुला सकती है। इस सत्र में लोकसभा की सीटें बढ़ाने, परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों पर आगे बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक विशेष सत्र की तारीखों का आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इस बार जरूरी समर्थन जुटा पाएगी? अप्रैल 2026 में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला था। ऐसे में सरकार के सामने अब राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की चुनौती है।
लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने की चर्चा
फिलहाल लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटें हैं। प्रस्तावित योजना के तहत इनकी संख्या बढ़ाकर अधिकतम 850 करने की बात सामने आई है। इस बदलाव का संबंध महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया से भी जोड़ा जा रहा है।
अगर लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी होती है, तो संसदीय क्षेत्रों और राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव हो सकता है। हालांकि, सीटों की अंतिम संख्या और उनके बंटवारे को लेकर स्थिति विधेयक के प्रावधानों तथा संवैधानिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।
Delimitation Bill क्या है और इससे क्या बदलेगा?
परिसीमन यानी Delimitation का मतलब लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का दोबारा निर्धारण करना है। इसके जरिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रावधानों में बदलाव किया जा सकता है।
यह मुद्दा इसलिए अहम है, क्योंकि परिसीमन का असर संसद में अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक भागीदारी पर पड़ सकता है। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने चिंता जताई है कि आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने से उनका मौजूदा प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
दूसरी ओर, सरकार की प्रस्तावित योजना में लोकसभा की सीटें बढ़ाने का मुद्दा शामिल है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए प्रस्ताव में राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़ी चिंताओं का किस तरह समाधान किया जाता है।
महिला आरक्षण 2029 से लागू करने की तैयारी?
महिला आरक्षण भी इस पूरे मामले का एक अहम हिस्सा है। संसद ने 2023 में महिला आरक्षण से जुड़ा कानून पारित किया था। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।
हालांकि, इस कानून के क्रियान्वयन को जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है। सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। इसी वजह से परिसीमन और संविधान संशोधन से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है।
अप्रैल में क्यों पास नहीं हो पाया था बिल?
अप्रैल 2026 में लोकसभा में संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान हुआ था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे। इसके बावजूद जरूरी विशेष बहुमत नहीं मिल सका और विधेयक पारित नहीं हुआ।
संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई मतों की जरूरत होती है। कुछ संविधान संशोधनों के लिए कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से मंजूरी लेना भी जरूरी होता है।
यानी सरकार के लिए केवल सांसदों की साधारण बहुमत संख्या पर्याप्त नहीं होगी। उसे संवैधानिक नियमों के मुताबिक जरूरी समर्थन हासिल करना होगा।
DMK समेत दूसरे दलों से संपर्क की चर्चा
मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सरकार विधेयकों के समर्थन में राजनीतिक दलों से बातचीत कर रही है। इसमें डीएमके (DMK) और कुछ छोटे दलों से संपर्क किए जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इन दलों के अंतिम रुख को लेकर अभी स्पष्ट जानकारी नहीं है।
विपक्षी दलों की प्रमुख चिंताओं में परिसीमन की प्रक्रिया, राज्यों का प्रतिनिधित्व और प्रस्तावित बदलावों पर व्यापक चर्चा शामिल है। ऐसे में विशेष सत्र बुलाए जाने पर संसद में इस मुद्दे पर बहस तेज हो सकती है।
कब हो सकता है संसद का Special Session?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकार अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर सकती है। 26 और 27 अक्टूबर को प्रस्तावित BRICS Parliamentary Forum के कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए सत्र की तारीखें तय किए जाने की संभावना भी जताई गई है।
लेकिन अभी तक विशेष सत्र का आधिकारिक कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है। इसलिए तारीखों और विधेयकों को लेकर सामने आ रही जानकारियों को संभावित घटनाक्रम के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
अब सरकार के सामने क्या चुनौती है?
सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं—पहली, विधेयकों के लिए जरूरी संवैधानिक समर्थन जुटाना और दूसरी, परिसीमन को लेकर राज्यों की चिंताओं पर सहमति बनाना।
अगर विशेष सत्र बुलाया जाता है, तो लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी, महिला आरक्षण और राज्यों के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे फिर से चर्चा के केंद्र में आ सकते हैं। फिलहाल सभी की नजर सरकार की आधिकारिक घोषणा और राजनीतिक दलों के रुख पर है।
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