छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में लोक अदालत द्वारा बिना किसी आपसी समझौते के मुआवजे से जुड़े मामले को खत्म करने के फैसले को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत को किसी मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है।
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की अदालत ने कहा कि लोक अदालत का अधिकार क्षेत्र दोनों पक्षों की आपसी सहमति और समझौते के आधार पर विवाद का निपटारा करने तक सीमित है। यदि पक्षों के बीच समझौता नहीं होता है, तो मामले को संबंधित अदालत में वापस भेजना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने राज्य विद्युत मंडल (CSPDCL) की याचिका स्वीकार करते हुए लेबर कोर्ट को मामले की दोबारा सुनवाई कर 5 महीने के भीतर कानून के अनुसार फैसला सुनाने का निर्देश दिया है।
सहमति के बिना ठेकेदार को जिम्मेदारी से मुक्त करना गलत
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक मामले के सभी पक्षों के बीच आपसी सहमति नहीं बनती, तब तक लोक अदालत ठेकेदार को मुआवजा देने के दायित्व से मुक्त नहीं कर सकती।
कोर्ट ने CSPDCL के खिलाफ पारित एकपक्षीय आदेश और लोक अदालत की ओर से 2014 में जारी अवार्ड को रद्द कर दिया। साथ ही लेबर कोर्ट को पूरे मामले की फिर से सुनवाई करने का आदेश दिया।
क्या है लोक अदालत का अधिकार क्षेत्र?
लोक अदालत विवादों को आपसी सहमति और समझौते के जरिए सुलझाने का वैकल्पिक मंच है। इसे विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत वैधानिक दर्जा प्राप्त है।
लोक अदालत का उद्देश्य अदालतों में लंबित मामलों या मुकदमा दायर होने से पहले के विवादों का शांतिपूर्ण तरीके से समाधान करना है।
समझौता होने पर लोक अदालत का फैसला सिविल कोर्ट की डिक्री के समान माना जाता है और संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होता है। सामान्य परिस्थितियों में इसके खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं होता।
हालांकि, यदि पक्षों के बीच समझौता नहीं होता है तो लोक अदालत को मामले के गुण-दोष पर फैसला सुनाने के बजाय उसे संबंधित कोर्ट में वापस भेजना होता है।
2012-13 में करंट की चपेट में आने से हुई थी युवक की मौत
मामला CSPDCL से जुड़ा है। कंपनी ने बिजली मेंटेनेंस और अन्य कार्यों के लिए अभिनव तिवारी को ठेका दिया था। ठेकेदार ने छोटू उर्फ शत्रुहन नाम के युवक को काम पर रखा था।
साल 2012-13 में काम के दौरान छोटू करंट की चपेट में आ गया, जिससे उसकी मौत हो गई।
इसके बाद छोटू के माता-पिता ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत लेबर कोर्ट में दावा पेश किया। उन्होंने करीब 9 लाख 880 रुपएमुआवजे की मांग की थी।
CSPDCL ने यह रकम कोर्ट में जमा कर दी थी। हालांकि, कंपनी का कहना था कि मुआवजा देने की वास्तविक जिम्मेदारी ठेकेदार अभिनव तिवारी की है और जमा की गई राशि ठेकेदार से वसूल की जानी चाहिए।
वहीं, ठेकेदार ने छोटू को अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर दिया और मुआवजा देने की जिम्मेदारी भी स्वीकार नहीं की।
लोक अदालत में बिना समझौते के बंद कर दिया गया मामला
CSPDCL और ठेकेदार के बीच विवाद लेबर कोर्ट में चल रहा था। इसी दौरान ठेकेदार ने मामला लोक अदालत में पेश किया।
लोक अदालत में छोटू के परिजनों ने कहा कि मुआवजे की राशि पहले ही कोर्ट में जमा हो चुकी है, इसलिए वे मामले को मेरिट के आधार पर आगे नहीं बढ़ाना चाहते।
इसके बाद 6 दिसंबर 2014 को लोक अदालत ने मामले को बंद कर दिया। साथ ही ठेकेदार को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया।
हालांकि, इस दौरान CSPDCL और ठेकेदार के बीच कोई आपसी समझौता नहीं हुआ था।
CSPDCL ने हाईकोर्ट में दी चुनौती
लोक अदालत के इस फैसले के खिलाफ CSPDCL ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी ने अपनी याचिका में कहा कि लोक अदालत ने उसका पक्ष सुने बिना एकपक्षीय आदेश जारी किया, जबकि मामले में पक्षकारों के बीच कोई समझौता भी नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद CSPDCL की अपील स्वीकार कर ली और लोक अदालत के 2014 के अवार्ड को रद्द कर दिया।
अब लेबर कोर्ट इस मामले की दोबारा सुनवाई करेगा और हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार 5 महीने के भीतर मामले का फैसला करना होगा।
