भारत-चीन सीमा पर हुआ गतिरोध एक बार फिर चर्चा में है। वजह है पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे का हालिया बयान, जिसने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
नरवणे ने साफ कहा कि जब लद्दाख में चीन के साथ तनाव चरम पर था, तब सरकार ने सेना को अकेला नहीं छोड़ा। उनके मुताबिक, हर बड़ा फैसला आपसी समझ और बातचीत के बाद ही लिया गया।
सरकार और सेना साथ खड़ी थी
नरवणे ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उस मुश्किल दौर में सरकार और सेना के बीच लगातार संवाद बना रहा। फैसले जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिए गए।
उनका इशारा साफ था—स्थिति जितनी गंभीर थी, उतनी ही मजबूती से उसे संभाला भी गया।
Rahul Gandhi के बयान से शुरू हुआ विवाद
दरअसल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इससे पहले दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेना प्रमुख से कहा था—“जो आपको सही लगे, वही कीजिए।”
इस बयान के बाद विपक्ष ने सवाल उठाए कि क्या उस समय सेना को पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ दिया गया था।
अब आमने-सामने दो दावे
एक तरफ राहुल गांधी का आरोप है, तो दूसरी तरफ नरवणे का स्पष्ट बयान। ऐसे में सच्चाई को लेकर सियासी माहौल गर्म हो गया है।
सरकार के समर्थक इसे मजबूत नेतृत्व का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे अलग नजरिए से देख रहा है।
राजनीति में क्यों अहम है ये मुद्दा?
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हमेशा संवेदनशील होते हैं। ऐसे में जब सेना और सरकार के बीच तालमेल पर सवाल उठते हैं, तो यह सीधे लोगों की भावनाओं से जुड़ जाता है।
आने वाले समय में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, खासकर जब राजनीतिक माहौल पहले से ही गरम है।
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