Supreme court ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि शादी के बाद भी बेटी का अपने मायके से संबंध खत्म नहीं होता। अदालत ने साफ किया कि बेटी को पैतृक संपत्ति या अधिकारों से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता और सरकार इस तरह के अधिकार देने से इनकार नहीं कर सकती।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें महिलाओं के संपत्ति और उत्तराधिकार अधिकारों को लेकर सवाल उठे थे। कोर्ट ने अपने विचार में यह स्पष्ट किया कि बेटी सिर्फ शादी के बाद “दूसरे घर की सदस्य” बन जाने से अपने मूल परिवार के अधिकारों से बाहर नहीं हो जाती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य समानता सुनिश्चित करना है और किसी भी स्थिति में बेटी को बेटों के बराबर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले भविष्य में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को और मजबूत करेंगे और पारिवारिक विवादों में भी स्पष्टता लाएंगे।
फिलहाल यह फैसला समाज में बेटियों के अधिकारों को लेकर चल रही बहस को एक नई दिशा देता नजर आ रहा है।
