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Ram Mandir Donation Row: SIT रिपोर्ट से मच सकता है हड़कंप, ट्रस्ट में बदलाव की अटकलें तेज

Table of Content

अयोध्या के Ram Mandir से जुड़े चढ़ावा विवाद ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र बने राम मंदिर में चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर उठे सवालों के बीच अब जांच अपने अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (SIT) आज अपनी रिपोर्ट लखनऊ में उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप सकती है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भी पहुंचेगी, जिसके बाद आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।

सूत्रों के मुताबिक, जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा की गई है। इसी वजह से ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के नाम चर्चा में हैं। हालांकि अभी तक किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

राम मंदिर में हर दिन देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दान और चढ़ावा अर्पित करते हैं। कुछ समय पहले चढ़ावे के रखरखाव और रिकॉर्ड से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर शिकायतें सामने आई थीं। शिकायतों के बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए SIT जांच के आदेश दिए थे।

जांच टीम ने बीते दिनों कई दस्तावेजों की जांच की, संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों से पूछताछ की तथा वित्तीय रिकॉर्ड का भी परीक्षण किया। अब सभी की निगाहें अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं।

रिपोर्ट से तय हो सकती है आगे की दिशा

राजनीतिक गलियारों से लेकर धार्मिक संगठनों तक, हर कोई SIT की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। माना जा रहा है कि यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की जा सकती है।

कुछ सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि रिपोर्ट के आधार पर ट्रस्ट में प्रशासनिक बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि अंतिम फैसला सरकार और संबंधित अधिकारियों की समीक्षा के बाद ही होगा।

आस्था से जुड़ा मामला, इसलिए बढ़ी संवेदनशीलता

राम मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। ऐसे में चढ़ावे और उसके प्रबंधन को लेकर उठे सवाल स्वाभाविक रूप से लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। श्रद्धालु भी चाहते हैं कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और सच्चाई सामने आए।

अब सबकी नजर योगी सरकार के फैसले पर

SIT की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद यह स्पष्ट होगा कि जांच में क्या निष्कर्ष निकले हैं और सरकार आगे क्या कदम उठाने वाली है। फिलहाल अयोध्या से लेकर लखनऊ तक इस मामले को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। आने वाले दिनों में रिपोर्ट के आधार पर लिए गए फैसले इस पूरे विवाद की दिशा तय करेंगे।

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Yukta

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छत्तीसगढ़ में NSUI जिला अध्यक्षों की नियुक्ति पर रोक, यूथ कांग्रेस चुनाव के बीच गुटबाजी तेज

छत्तीसगढ़ में यूथ कांग्रेस चुनाव के बीच कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI में जिला अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर विवाद सामने आया है। गुटबाजी की शिकायतों के बाद पांच जिलों में की गई NSUI जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों पर रोक लगा दी गई है। बताया जा रहा है कि बिलासपुर NSUI अध्यक्ष रंजित सिंह के भूपेश बघेल गुट के प्रत्याशी सत्येंद्र चेलक के समर्थन में प्रचार करने के बाद संगठन के भीतर विवाद बढ़ा। मामले की शिकायत राष्ट्रीय कार्यालय तक पहुंची, जिसके बाद 20 अगस्त को जारी नियुक्ति आदेश को होल्ड कर दिया गया। अब चर्चा है कि यूथ कांग्रेस चुनाव पूरा होने के बाद ही NSUI के जिला अध्यक्षों की नियुक्ति पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। 5 जिलों में हुई थी NSUI अध्यक्षों की नियुक्ति NSUI प्रदेश अध्यक्ष नीरज पांडेय ने 20 अगस्त को पांच जिलों में नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति का आदेश जारी किया था। इनमें रंजेश सिंह क्षत्री को बिलासपुर ग्रामीण, समर्थ मिरानी को बिलासपुर शहर, दुर्गांत आर्या को मुंगेली, उस्मान रजा को बालोद और रोशन सिंह ठाकुर को खैरागढ़-छुईखदान-गंडई का जिला अध्यक्ष बनाया गया था। हालांकि, रविवार को जारी नए आदेश में इन सभी नियुक्तियों को फिलहाल रोक दिया गया है। यूथ कांग्रेस चुनाव का दिया गया हवाला नियुक्तियों पर रोक लगाने वाले आदेश में छत्तीसगढ़ युवा कांग्रेस चुनाव का हवाला दिया गया है। बताया गया कि राष्ट्रीय कार्यालय से चर्चा के बाद 20 अगस्त को जारी किए गए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति आदेश को फिलहाल स्थगित किया जा रहा है। इसके बाद संगठन के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि NSUI की नई नियुक्तियों का फैसला अब यूथ कांग्रेस चुनाव के बाद ही हो सकता है। रंजित सिंह के समर्थन में सामने आए नेता बिलासपुर NSUI अध्यक्ष रंजित सिंह को हटाकर शहर और ग्रामीण के लिए अलग-अलग जिला अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद संगठन के भीतर विरोध शुरू हो गया था। रंजित सिंह वर्ष 2023 से बिलासपुर NSUI जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने छात्रहित से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सक्रियता दिखाई है। नई नियुक्तियों का बिलासपुर के अलावा रायपुर के कुछ वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं द्वारा भी विरोध किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद मामला राष्ट्रीय कार्यालय तक पहुंचा और नियुक्तियों पर रोक लगा दी गई। सत्येंद्र चेलक के प्रचार को लेकर विवाद विवाद की एक बड़ी वजह रंजित सिंह का भूपेश बघेल समर्थित प्रत्याशी सत्येंद्र चेलक के समर्थन में प्रचार करना बताया जा रहा है। रंजित सिंह उनके दौरे के दौरान साथ नजर आए थे। इसी को लेकर संगठन के दूसरे खेमे की ओर से राष्ट्रीय कार्यालय में शिकायत किए जाने की बात सामने आई। हालांकि, इस मामले में अलग-अलग पक्षों के अपने दावे हैं। रंजित सिंह ने प्रदेश अध्यक्ष पर लगाए गुटबाजी के आरोप रंजित सिंह ने NSUI प्रदेश अध्यक्ष नीरज पांडेय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए गुटबाजी के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि संगठन में फैसले किसी व्यक्ति या गुट के फायदे के लिए नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और संगठन के हित को ध्यान में रखकर होने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि बिलासपुर NSUI को शहर और ग्रामीण में बांटकर बिना उनकी जानकारी के नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति की गई। रंजित सिंह ने इस प्रक्रिया को संगठन के नियमों के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में NSUI के आंतरिक चुनाव भी होने हैं। ऐसे में जिला अध्यक्षों की नियुक्ति का फैसला संगठन के चुनाव को प्रभावित कर सकता है। 30 अगस्त से शुरू होना है युवा कांग्रेस का सदस्यता अभियान रंजित सिंह के मुताबिक, 30 अगस्त से युवा कांग्रेस का सदस्यता अभियान भी शुरू होने वाला है। उनका कहना है कि सदस्यता और संगठन चुनाव की प्रक्रिया में कार्यकर्ताओं को अपने नेतृत्व का चुनाव करने का अधिकार मिलना चाहिए। फिलहाल पांच जिलों में NSUI अध्यक्षों की नियुक्ति पर रोक लगने के बाद संगठन के अगले फैसले का इंतजार है। अब देखना होगा कि यूथ कांग्रेस चुनाव के बाद इन नियुक्तियों को बरकरार रखा जाता है या संगठन नए सिरे से फैसला करता है।

गुना में महिला की सूझबूझ से मोबाइल तक पहुंची पुलिस, सोशल मीडिया चैट से संदिग्ध की लोकेशन पता कर स्टेशन पर पकड़ा

गुना में मोबाइल चोरी के एक मामले में महिला की सूझबूझ और सोशल मीडिया का इस्तेमाल चर्चा में है। 29 जुलाई को बाजार में महिला का एंड्राइड मोबाइल गायब हो गया था। बाद में परिवार को जानकारी मिली कि मोबाइल किसी दूसरे व्यक्ति के पास है। इसके बाद पुलिस जांच का इंतजार करने के बजाय परिवार ने अपने स्तर पर मोबाइल और संदिग्ध व्यक्ति का पता लगाने की कोशिश शुरू की। मोबाइल मालिक की बहन ने सोशल मीडिया पर एक संदिग्ध युवक की पहचान कर उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी। युवक ने रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। बातचीत के दौरान महिला को युवक के आने-जाने की जानकारी मिलती रही। इसी चैटिंग से परिवार को पता चला कि युवक इंदौर से बदरवास तहसील के गिन्दौरा गांव जाने वाला है। इसके बाद परिवार ने उसे गुना रेलवे स्टेशन पर पकड़ने की योजना बनाई। 29 जुलाई को बाजार से गायब हुआ था मोबाइल जानकारी के मुताबिक, 29 जुलाई को महिला बाजार गई थी। इसी दौरान उसका एंड्राइड मोबाइल गायब हो गया। काफी तलाश के बाद भी फोन नहीं मिला। परिवार को आशंका थी कि मोबाइल किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ लग गया है। परिजनों ने मोबाइल से जुड़ी जानकारी जुटानी शुरू की। बताया जा रहा है कि फोन में मौजूद कुछ तस्वीरें और नंबर हटा दिए गए थे, लेकिन उसमें लगी सिम नहीं बदली गई थी। इसी वजह से परिवार को संदिग्ध व्यक्ति तक पहुंचने में मदद मिली। बहन ने भेजी फ्रेंड रिक्वेस्ट, फिर शुरू हुई चैटिंग मोबाइल मालिक की बहन ने सोशल मीडिया पर संदिग्ध युवक की पहचान की और उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। युवक ने रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। इसके बाद महिला ने उससे सामान्य बातचीत शुरू की। बातचीत के दौरान उसने युवक के आने-जाने की जानकारी जुटाई। इसी दौरान पता चला कि वह इंदौर से बदरवास तहसील के गिन्दौरा गांव जाने वाला है। गुना स्टेशन पर महिला ने युवक को पहचान लिया सोमवार 24 अगस्त को दोपहर करीब 1:30 बजे युवक गुना रेलवे स्टेशन पहुंचा। परिवार को उसके आने की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी, इसलिए महिला अपने परिजनों के साथ स्टेशन पर मौजूद थी। युवक के स्टेशन पहुंचते ही महिला ने उसे पहचान लिया। उसके पास वही मोबाइल दिखाई देने पर महिला ने उसे पकड़ लिया। इस दौरान स्टेशन पर लोगों की भीड़ भी जमा हो गई। घटना का वीडियो भी सामने आया है। रक्षाबंधन के चलते युवक को छोड़ने की अपील बताया जा रहा है कि रक्षाबंधन के चलते एक महिला ने मोबाइल के साथ पकड़े गए युवक को छोड़ने की अपील की। हालांकि, मामले में मोबाइल चोरी और युवक की भूमिका को लेकर पुलिस जांच कर रही है। पुलिस जांच में सामने आएगी पूरी सच्चाई फिलहाल पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि बाजार में गायब हुआ मोबाइल युवक तक कैसे पहुंचा और उसने उसे अपने पास क्यों रखा। सोशल मीडिया पर हुई बातचीत और स्टेशन पर पकड़े जाने की पूरी घटना भी जांच का हिस्सा बन सकती है। इस मामले में मोबाइल में सिम का मौजूद रहना, सोशल मीडिया चैटिंग और युवक के गुना आने की जानकारी मिलना अहम कड़ियां मानी जा रही हैं। पुलिस की जांच के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट होगी।
Patna Airport

Patna Airport पर Bird Strike से हड़कंप, 164 यात्रियों वाली फ्लाइट की Safe Landing

पटना एयरपोर्ट (Patna Airport) पर सोमवार सुबह एक बार फिर विमान की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाने वाली घटना सामने आई। दिल्ली से पटना आ रही एक फ्लाइट लैंडिंग के दौरान पक्षी से टकरा गई। विमान में 164 यात्री सवार थे। गनीमत रही कि पायलट ने विमान को सुरक्षित रनवे पर उतार लिया और हादसे में किसी यात्री के घायल होने की खबर नहीं है। Landing के दौरान विमान से टकराया पक्षी दिल्ली से पटना पहुंची फ्लाइट जब लैंडिंग के लिए नीचे आ रही थी, तभी विमान से पक्षी टकरा गया। पायलट ने तुरंत एयरपोर्ट कंट्रोल को इसकी जानकारी दी। इसके बाद एयरपोर्ट पर सुरक्षा व्यवस्था को अलर्ट कर दिया गया। विमान के सुरक्षित उतरने के बाद यात्रियों को बाहर निकाला गया। इसके बाद तकनीकी टीम ने विमान की जांच की। शुरुआती जांच में किसी बड़े नुकसान की बात सामने नहीं आई। यात्रियों के लिए यह पल निश्चित तौर पर डराने वाला रहा होगा। हालांकि, क्रू की सतर्कता और समय पर उठाए गए सुरक्षा कदमों के कारण स्थिति नियंत्रण में रही। 7 दिन में Bird Hit की दूसरी घटना पटना एयरपोर्ट पर Bird Hit का यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि एक सप्ताह के भीतर यह दूसरी ऐसी घटना बताई जा रही है। इससे पहले भी दिल्ली-पटना रूट पर आने वाली फ्लाइट पक्षी से टकराई थी। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने एयरपोर्ट के आसपास पक्षियों की मौजूदगी और रनवे की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। टेक-ऑफ और लैंडिंग के दौरान Bird Strike को विमानन सुरक्षा के लिहाज से गंभीर माना जाता है। बारिश के मौसम में बढ़ती है चुनौती मानसून के दौरान एयरपोर्ट के आसपास हरियाली और कीड़े-मकौड़ों की संख्या बढ़ने से पक्षियों की गतिविधियां भी बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि बारिश के मौसम में एयरपोर्ट प्रशासन को रनवे और उसके आसपास के इलाके की लगातार निगरानी करनी पड़ती है। पटना एयरपोर्ट के आसपास Bird Activity को कम करने के लिए अलग-अलग सुरक्षा उपाय किए जाते हैं। रनवे क्षेत्र में पक्षियों की गतिविधि पर नजर रखने के साथ उन्हें दूर रखने के लिए Bird Chasers जैसी व्यवस्था का इस्तेमाल भी किया जाता है। 164 यात्रियों की सुरक्षित लैंडिंग सबसे बड़ी राहत इस घटना में सबसे राहत वाली बात यही रही कि 164 यात्रियों से भरा विमान सुरक्षित पटना पहुंच गया। किसी यात्री के घायल होने की सूचना नहीं है। विमान की तकनीकी जांच के बाद ही आगे की उड़ान से जुड़े फैसले लिए जाते हैं। हालांकि, एक ही सप्ताह में Bird Hit की दो घटनाएं सामने आने के बाद एयरपोर्ट प्रशासन के सामने चुनौती साफ है। यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए रनवे के आसपास Bird Movement को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। क्यों गंभीर है Bird Strike? विमान के उड़ान भरते या उतरते समय पक्षी से टकराव को Bird Strike कहा जाता है। छोटे स्तर की घटना में नुकसान सीमित रह सकता है, लेकिन बड़े पक्षी या तेज गति से टकराव की स्थिति में विमान के महत्वपूर्ण हिस्से प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए एयरपोर्ट पर Bird Control System विमान सुरक्षा का अहम हिस्सा माना जाता है। फिलहाल पटना एयरपोर्ट की इस घटना में बड़ी राहत यही है कि विमान सुरक्षित उतर गया और सभी 164 यात्री सुरक्षित रहे। लेकिन लगातार हो रही Bird Hit की घटनाएं एयरपोर्ट के आसपास सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत जरूर दिखाती हैं। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Balen Shah

Balen Shah से मोहभंग? Nepal के Gen-Z PM के 150 दिन, उपलब्धियों से ज्यादा विवाद

नेपाल की राजनीति में बालेन शाह (Balen Shah) का नाम कभी बदलाव, युवा सोच और पुरानी व्यवस्था को चुनौती देने वाले नेता के तौर पर लिया जाता था। Gen-Z के बीच उनकी लोकप्रियता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई और सत्ता तक पहुंचाया। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के करीब 150 दिन बाद सवाल उठने लगा है—क्या जनता का अपने इस नए नेता से मोहभंग होने लगा है? बालेन शाह के सामने अब वह चुनौती है, जो किसी भी नए नेता के लिए सबसे मुश्किल होती है। चुनावी वादों और उम्मीदों को जमीन पर उतारना। शुरुआती महीनों में सरकार ने कई फैसलों को अपनी उपलब्धि बताया है, लेकिन संसद से दूरी, राजनीतिक संवाद और जनता से जुड़े विवादों ने उनकी सरकार की छवि को झटका दिया है। Balen Shah के 150 दिन: उम्मीद बड़ी, सवाल भी बड़े बालेन शाह ने 27 मार्च 2026 को नेपाल के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। इससे पहले काठमांडू के मेयर के तौर पर उन्होंने अपनी सख्त और सीधे फैसले लेने वाली कार्यशैली से खूब सुर्खियां बटोरी थीं। यही वजह थी कि जब उनकी पार्टी RSP को चुनाव में बड़ी सफलता मिली तो युवाओं को लगा कि नेपाल की राजनीति में अब कुछ अलग होने वाला है। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें सिर्फ लोकप्रिय नेता नहीं, बल्कि एक पूरी सरकार चलाने वाले मुखिया के तौर पर खुद को साबित करना पड़ा। सरकार का दावा है कि उसके शुरुआती एजेंडे पर अच्छी प्रगति हुई है। हालांकि, विपक्ष और आलोचकों की नजर में तस्वीर इतनी आसान नहीं है। Parliament से दूरी बनी बड़ा मुद्दा बालेन शाह की कार्यशैली पर सबसे ज्यादा सवाल उनकी Parliament Attendance को लेकर उठ रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती 39 संसदीय बैठकों में प्रधानमंत्री केवल 5 बैठकों में मौजूद रहे। विपक्षी सांसदों ने इसे गंभीर मुद्दा बनाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को संसद में उपस्थित होकर सरकार के कामकाज और नीतियों पर जवाब देना चाहिए। अब संसद के स्पीकर ने बालेन शाह को 26 अगस्त को सदन में मौजूद होकर सांसदों के सवालों का जवाब देने को कहा है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस नेता से युवाओं ने पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद की थी, उसी की संसद में कम मौजूदगी अब राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। जनता के मुद्दों पर सरकार घिरी काठमांडू में अनौपचारिक बस्तियों और जमीन पर रहने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी। प्रभावित लोगों ने पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। जुलाई में एक राइड-शेयर ड्राइवर की मौत के बाद भी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठे। इस घटना ने अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों और प्रशासन के बीच तनाव को सामने ला दिया। इन घटनाओं ने सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—सख्त प्रशासन और संवेदनशील शासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? Foreign Policy पर भी बढ़ी नजर प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह की विदेश नीति भी चर्चा में रही। भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ संबंध नेपाल के लिए हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहे हैं। बालेन शाह के कुछ बयानों और राजनयिक गतिविधियों को लेकर राजनीतिक बहस हुई। हालांकि बाद में उन्होंने भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात भी की। RSP प्रमुख रबी लामिछाने की भारत यात्रा और वहां हुई मुलाकातों ने भी नेपाल की राजनीति में अलग चर्चा पैदा की। इससे यह सवाल उठा कि पार्टी और सरकार के बीच विदेश नीति को लेकर तालमेल कितना मजबूत है। RSP के अंदर भी सबकुछ ठीक है? बालेन शाह के लिए एक और चुनौती अपनी ही पार्टी के भीतर बेहतर तालमेल बनाए रखना है। रिपोर्टों के मुताबिक, 21 अगस्त को RSP की केंद्रीय समिति की अहम बैठक में बालेन शाह शामिल नहीं हुए। बैठक में स्थानीय चुनावों की तैयारियों समेत कई राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होनी थी। प्रधानमंत्री का बैठक में शामिल नहीं होना पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और नेतृत्व को लेकर अटकलों का कारण बना। हालांकि, इसे सीधे तौर पर किसी बड़े राजनीतिक टकराव का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। Gen-Z का भरोसा अब सबसे बड़ी परीक्षा बालेन शाह की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत Gen-Z और युवा मतदाताओं का समर्थन रही है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पुराने राजनीतिक दलों से नाराज युवाओं ने उन्हें बदलाव के चेहरे के रूप में देखा। लेकिन सरकार बनने के बाद तस्वीर बदलती है। अब सिर्फ भाषण या लोकप्रिय छवि काफी नहीं है। रोजगार, महंगाई, प्रशासन, भ्रष्टाचार और रोजमर्रा की समस्याओं पर जनता ठोस नतीजे चाहती है। यही वजह है कि बालेन शाह के लिए आने वाले महीने बेहद अहम हैं। Balen Shah का Report Card: पास या फेल? 150 दिनों के आधार पर बालेन शाह सरकार को सीधे तौर पर Fail कहना सही नहीं होगा। सरकार ने कुछ फैसलों और प्रशासनिक सुधारों को अपनी उपलब्धि बताया है। लेकिन दूसरी तरफ संसद से दूरी, जनता से जुड़े विवाद और राजनीतिक संवाद की कमी ने कई सवाल खड़े किए हैं। असल परीक्षा अब शुरू होती है। बालेन शाह को यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ Gen-Z के लोकप्रिय नेता नहीं, बल्कि नेपाल को लंबे समय तक प्रभावी तरीके से चलाने वाले प्रधानमंत्री भी हैं। जनता ने उन्हें बदलाव के नाम पर मौका दिया है। अब जनता को नारे नहीं, Result चाहिए। यही आने वाले समय में बालेन शाह के राजनीतिक भविष्य का सबसे बड़ा पैमाना बनेगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
5-Day Banking

5-Day Banking का इंतजार खत्म होगा? Bank Unions ने दी Strike की चेतावनी, ग्राहकों पर भी असर

बैंक में काम कराने वाले ग्राहकों के लिए आने वाले दिन थोड़े मुश्किल हो सकते हैं। 5-Day Banking की मांग को लेकर बैंक कर्मचारी संगठनों ने एक बार फिर आंदोलन तेज करने का फैसला किया है। कर्मचारियों की मांग है कि दूसरे और चौथे शनिवार की मौजूदा छुट्टी व्यवस्था को बदलकर हर शनिवार और रविवार को बैंक बंद रखा जाए। बैंक यूनियनों का कहना है कि पांच दिन का बैंकिंग सप्ताह लागू करने का प्रस्ताव लंबे समय से लंबित है। अब इस मुद्दे पर सरकार और बैंक प्रबंधन पर दबाव बनाने के लिए देशभर में प्रदर्शन और हड़ताल की तैयारी की जा रही है। दो साल से फैसले का इंतजार बैंक कर्मचारियों के मुताबिक, मार्च 2024 में हुए 12वें Bipartite Settlement में पांच दिन की बैंकिंग व्यवस्था को लेकर सहमति बनी थी। प्रस्ताव में शनिवार की छुट्टी के बदले सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना काम के समय में करीब 40 मिनट बढ़ाने का सुझाव दिया गया था। यानी कर्मचारियों के काम के कुल घंटों में बड़ी कटौती किए बिना शनिवार की छुट्टी देने की योजना है। इसके बावजूद प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है। यही वजह है कि बैंक यूनियनों का गुस्सा अब बढ़ता जा रहा है। अभी क्या है Bank Holiday का नियम? फिलहाल बैंकों में हर महीने दूसरे और चौथे शनिवार को छुट्टी रहती है। बाकी शनिवार को बैंक शाखाएं खुलती हैं। रविवार को सामान्य तौर पर बैंक बंद रहते हैं। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि जब अधिकांश सरकारी और निजी संस्थानों में पांच दिन का कार्य सप्ताह लागू है, तो बैंक कर्मचारियों को भी यह सुविधा मिलनी चाहिए। हड़ताल हुई तो Banking Services पर असर बैंक यूनियनों की ओर से आंदोलन आगे बढ़ने पर ग्राहकों को शाखाओं से जुड़े कामों में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। कैश जमा करने, निकासी, चेक से जुड़े काम और अन्य branch-based services प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि UPI, ATM, Mobile Banking और Internet Banking जैसी डिजिटल सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहने की उम्मीद रहती है। फिर भी हड़ताल के दौरान किसी खास बैंक की सेवाओं पर स्थानीय स्तर पर असर पड़ सकता है। सिर्फ 5-Day Banking ही नहीं, PLI भी मुद्दा बैंक कर्मचारियों की नाराजगी केवल पांच दिन की बैंकिंग व्यवस्था तक सीमित नहीं है। यूनियनों ने Performance Linked Incentive (PLI) से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी आपत्ति जताई है। संगठनों का कहना है कि कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए PLI व्यवस्था पर उचित बातचीत होनी चाहिए। इसी के साथ बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी अन्य लंबित मांगों को भी आंदोलन में शामिल किया गया है। Bank Customers के लिए क्या जरूरी? अगर हड़ताल की तारीख तय होती है, तो ग्राहकों के लिए बेहतर होगा कि वे जरूरी बैंकिंग काम पहले ही निपटा लें। खासकर कैश, चेक या शाखा में जाकर होने वाले काम को हड़ताल की संभावित तारीखों से पहले पूरा करना सुविधाजनक रहेगा। डिजिटल बैंकिंग का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों पर असर अपेक्षाकृत कम पड़ सकता है, लेकिन किसी भी जरूरी लेनदेन के लिए बैंक की आधिकारिक सूचना जरूर देखनी चाहिए। अब सरकार के फैसले पर नजर 5-Day Banking का मुद्दा बैंक कर्मचारियों और ग्राहकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण बन चुका है। कर्मचारी इसे लंबे समय से लंबित मांग बता रहे हैं, जबकि सरकार और बैंकिंग व्यवस्था के लिए इसका मतलब काम के घंटे, शाखाओं की उपलब्धता और ग्राहक सेवा के बीच संतुलन बनाना है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और बैंक प्रबंधन इस मांग पर कब अंतिम फैसला लेते हैं। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकला तो बैंक यूनियनों का आंदोलन आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है।

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