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ठोस कचरा प्रबंधन में छत्तीसगढ़ का बेहतर प्रदर्शन, रोजाना 2,612 टन से ज्यादा कचरे का प्रसंस्करण

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रायपुर। छत्तीसगढ़ ठोस कचरा प्रबंधन के मामले में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। प्रदेश में हर दिन 2,615.14 टन ठोस कचरा पैदा होता है, जिसमें से 2,612.97 टन कचरे का प्रसंस्करण किया जा रहा है। यानी उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पैदा होने वाले लगभग पूरे ठोस कचरे का प्रसंस्करण हो रहा है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की वर्ष 2026 की रिपोर्ट पॉलिसी, प्रैक्टिस एंड प्लास्टिक: कॉस्ट ऑफ मैनेजिंग प्लास्टिक वेस्ट इन इंडियन सिटीज में प्रदेश की कचरा प्रबंधन व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में कचरा प्रसंस्करण की दर 100% दर्ज की गई है। प्रदेश के नगरीय निकायों के सभी 3,255 वार्डों में घरों से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र किया जा रहा है।

प्लास्टिक कचरे की मात्रा में आई कमी

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022-23 के दौरान 21,170 टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। इससे पहले वर्ष 2021-22 में यह मात्रा 51,100 टन और 2020-21 में 47,450 टन दर्ज की गई थी।

आंकड़ों में प्लास्टिक कचरे की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दिखाई देती है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्लास्टिक का इस्तेमाल या कचरे की वास्तविक मात्रा भी उसी अनुपात में कम हुई है। इसके लिए आंकड़ों के संकलन, रिपोर्टिंग और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को भी समझना जरूरी है।

कचरा प्रबंधन के खर्च को सार्वजनिक करने की सिफारिश

CSE की रिपोर्ट में कचरा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नगरीय निकायों को कचरा संग्रहण से लेकर उसके अंतिम निस्तारण तक होने वाले खर्च का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।

इसके साथ ही प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में उत्पादक कंपनियों की जिम्मेदारी के तहत मिलने वाली राशि को वास्तविक खर्च के अनुरूप बनाने की सिफारिश की गई है। कचरे को प्रसंस्करण संयंत्र तक पहुंचाने में लगने वाली लागत को भी इसमें शामिल करने पर जोर दिया गया है।

प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में जवाबदेही जरूरी

प्लास्टिक कचरे का प्रभावी प्रबंधन केवल संग्रहण और प्रसंस्करण तक सीमित नहीं है। इसके लिए लागत का सही आकलन, पारदर्शी व्यवस्था और उत्पादक कंपनियों की जिम्मेदारी तय करना भी महत्वपूर्ण है।

छत्तीसगढ़ में ठोस कचरे के प्रसंस्करण और घरों से गीला-सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र करने के आंकड़े सकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं। अब कचरा प्रबंधन पर होने वाले खर्च और प्लास्टिक कचरे के निस्तारण की व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा।

Muskan Negi

muskannegi1302@gmail.com

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बिलासपुर NSUI नियुक्तियों में देवेंद्र यादव समर्थक खेमे का दबदबा, रंजीत सिंह को लगा झटका

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में NSUI की नई नियुक्तियों के बाद कांग्रेस संगठन के भीतर गुटीय समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। नियुक्तियों में AICC सचिव और विधायक देवेंद्र यादव समर्थक खेमे का दबदबा नजर आने की बात कही जा रही है। इससे पहले यूथ कांग्रेस चुनाव के दौरान जारी नियुक्ति आदेशों पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समर्थक खेमे की आपत्तियों के बाद रोक लगा दी गई थी। बताया गया था कि चुनाव नियमों का हवाला देकर नियुक्तियों को फ्रीज कराया गया था। आरोप था कि नियुक्ति सूची में संबंधित खेमे के समर्थकों को जगह नहीं मिली थी। अब रोक हटने के बाद संशोधन के नाम पर लगभग उन्हीं नियुक्तियों को दोबारा जारी किए जाने की चर्चा है। पहली बार शहर और ग्रामीण में बांटा गया जिलाध्यक्ष का पद NSUI के प्रदेश अध्यक्ष नीरज पांडेय की ओर से जारी नियुक्ति आदेश में बिलासपुर जिलाध्यक्ष का पद रायपुर की तर्ज पर शहर और ग्रामीण, दो हिस्सों में बांटा गया है। ग्रामीण जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी रंजेश सिंह क्षत्री को सौंपी गई है, जिन्हें देवेंद्र यादव समर्थक माना जाता है। वहीं, इसी खेमे से जुड़े समर्थ मिरानी को शहर जिलाध्यक्ष बनाया गया है। समर्थ मिरानी को जिला कांग्रेस कमेटी (ग्रामीण) के अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री का समर्थन हासिल बताया जाता है। नई नियुक्तियों के बाद संगठन में अलग-अलग गुटों के प्रभाव और राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। रंजीत सिंह को लगा झटका राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक, बिलासपुर जिले में पिछले कुछ वर्षों से NSUI की कमान संभाल रहे रंजीत सिंह को नई नियुक्तियों से झटका लगा है। इसके पीछे यूथ कांग्रेस चुनाव के दौरान भूपेश बघेल समर्थक खेमे का खुलकर साथ देने को एक संभावित वजह माना जा रहा है। हालांकि, नियुक्तियों को लेकर अलग-अलग खेमों के बीच मतभेद और उनके प्रभाव को लेकर सामने आ रही बातें राजनीतिक आकलन का हिस्सा हैं। संगठन को मजबूत करने पर रंजेश सिंह क्षत्री का जोर ग्रामीण जिलाध्यक्ष नियुक्त होने के बाद रंजेश सिंह क्षत्री ने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और विद्यार्थियों के हितों के लिए काम करने की बात कही। उन्होंने कहा, “मैं किसान का बेटा हूं। मेहनत से सींचना बचपन से सीखा हूं।” रंजेश सिंह क्षत्री के मुताबिक, NSUI केवल एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के अधिकारों, सम्मान और उज्ज्वल भविष्य के लिए संघर्ष करने वाला मंच है। जिलाध्यक्ष के रूप में उनकी प्राथमिकता संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना और कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान के लिए काम करना होगा। नई नियुक्तियों के बाद अब बिलासपुर में NSUI की संगठनात्मक गतिविधियों और अलग-अलग गुटों के बीच तालमेल पर नजर रहेगी।

ठोस कचरा प्रबंधन में छत्तीसगढ़ का बेहतर प्रदर्शन, रोजाना 2,612 टन से ज्यादा कचरे का प्रसंस्करण

रायपुर। छत्तीसगढ़ ठोस कचरा प्रबंधन के मामले में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। प्रदेश में हर दिन 2,615.14 टन ठोस कचरा पैदा होता है, जिसमें से 2,612.97 टन कचरे का प्रसंस्करण किया जा रहा है। यानी उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पैदा होने वाले लगभग पूरे ठोस कचरे का प्रसंस्करण हो रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की वर्ष 2026 की रिपोर्ट पॉलिसी, प्रैक्टिस एंड प्लास्टिक: कॉस्ट ऑफ मैनेजिंग प्लास्टिक वेस्ट इन इंडियन सिटीज में प्रदेश की कचरा प्रबंधन व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में कचरा प्रसंस्करण की दर 100% दर्ज की गई है। प्रदेश के नगरीय निकायों के सभी 3,255 वार्डों में घरों से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र किया जा रहा है। प्लास्टिक कचरे की मात्रा में आई कमी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022-23 के दौरान 21,170 टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। इससे पहले वर्ष 2021-22 में यह मात्रा 51,100 टन और 2020-21 में 47,450 टन दर्ज की गई थी। आंकड़ों में प्लास्टिक कचरे की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दिखाई देती है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्लास्टिक का इस्तेमाल या कचरे की वास्तविक मात्रा भी उसी अनुपात में कम हुई है। इसके लिए आंकड़ों के संकलन, रिपोर्टिंग और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को भी समझना जरूरी है। कचरा प्रबंधन के खर्च को सार्वजनिक करने की सिफारिश CSE की रिपोर्ट में कचरा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नगरीय निकायों को कचरा संग्रहण से लेकर उसके अंतिम निस्तारण तक होने वाले खर्च का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। इसके साथ ही प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में उत्पादक कंपनियों की जिम्मेदारी के तहत मिलने वाली राशि को वास्तविक खर्च के अनुरूप बनाने की सिफारिश की गई है। कचरे को प्रसंस्करण संयंत्र तक पहुंचाने में लगने वाली लागत को भी इसमें शामिल करने पर जोर दिया गया है। प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में जवाबदेही जरूरी प्लास्टिक कचरे का प्रभावी प्रबंधन केवल संग्रहण और प्रसंस्करण तक सीमित नहीं है। इसके लिए लागत का सही आकलन, पारदर्शी व्यवस्था और उत्पादक कंपनियों की जिम्मेदारी तय करना भी महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ में ठोस कचरे के प्रसंस्करण और घरों से गीला-सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र करने के आंकड़े सकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं। अब कचरा प्रबंधन पर होने वाले खर्च और प्लास्टिक कचरे के निस्तारण की व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा।

भोपाल में RGPV की बस डिवाइडर पर चढ़कर बिजली के खंभे से टकराई, 11 घायल; छात्र वेंटिलेटर पर

भोपाल। राजधानी भोपाल में शुक्रवार सुबह वीआईपी रोड पर राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) की बस हादसे का शिकार हो गई। राजा भोज प्रतिमा के आगे घुमावदार मोड़ पर बस डिवाइडर पर चढ़कर बिजली के खंभे से टकरा गई। हादसे के बाद बस एक तरफ करीब 75 प्रतिशत तक झुक गई, जिससे अंदर बैठे छात्रों और कर्मचारियों में चीख-पुकार मच गई। हादसे में आठ विद्यार्थियों और स्टाफ के तीन सदस्यों समेत कुल 11 लोग घायल हुए हैं। सीहोर निवासी छात्र अजय परमार की हालत गंभीर बताई गई है। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है, जबकि छात्र बसंत कुमार के पैर में गंभीर चोट आने के बाद ऑपरेशन करना पड़ा। पुलिस ने बस चालक के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। आधा घंटा लेट थी बस, तेज रफ्तार से चलाने का आरोप बस में सवार छात्रों के मुताबिक, बस निर्धारित समय से करीब आधा घंटा देरी से चल रही थी। आरोप है कि इसी वजह से चालक तेज रफ्तार में बस चला रहा था। हादसे से महज दो मिनट पहले एक छात्र ने मैसेज के जरिए प्रबंधन से चालक की लापरवाही की शिकायत भी की थी। छात्रों के इन आरोपों की जांच की जा रही है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, कॉलेज पहुंचने में देरी के कारण बस तेज गति से चलाए जाने की आशंका जताई गई है। मोड़ पर बस को नियंत्रित नहीं कर पाया चालक कोहेफिजा थाना प्रभारी लोकेंद्र सिंह ठाकुर के मुताबिक, बस सुबह 12 नंबर स्टॉप से विद्यार्थियों और स्टाफ को लेकर रवाना हुई थी। रास्ते में अन्य यात्री भी बस में सवार हुए। वीआईपी रोड पर साजिदा नगर मस्जिद के पास घुमावदार मोड़ पर चालक बस को नियंत्रित नहीं कर पाया। पुलिस के अनुसार, बस चालक की तरफ के डिवाइडर पर चढ़ गई और बिजली के खंभे से टकराकर एक ओर झुक गई। हादसे के बाद बस को सीधा कर उसमें फंसे लोगों को बाहर निकाला गया। छात्रों ने बताया, अचानक ब्रेक लगाने से हुआ हादसा छात्र सुमित के मुताबिक, वह माता मंदिर से बस में सवार हुआ था। उसने बताया कि बस करीब आधा घंटा लेट थी और चालक तेज गति से वाहन चला रहा था। सुमित के अनुसार, वीआईपी रोड पर करबला के पास घुमावदार मोड़ आने पर चालक ने अचानक ब्रेक लगाए। इसी दौरान बस का अगला पहिया डिवाइडर पर चढ़ गया और बस अनियंत्रित हो गई। छात्रा खुशी गौर ने बताया कि वह चालक के सामने वाली तरफ की सीट पर बैठी थी। राजा भोज प्रतिमा और करबला के बीच मोड़ पर बस डिवाइडर से टकराई तो उसने कूदकर अपनी जान बचाई। खुशी के मुताबिक, हादसे के दौरान एक छात्र के ऊपर सीट गिर गई, जिससे उसके गले और हाथ में गंभीर चोटें आईं। नौ घायलों को अस्पताल से छुट्टी, दो का इलाज जारी हादसे के बाद पुलिस और स्थानीय लोगों ने बस में सवार विद्यार्थियों और कर्मचारियों को बाहर निकालकर हमीदिया अस्पताल पहुंचाया। सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच नौ घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई। सीहोर निवासी अजय परमार की हालत गंभीर होने के कारण उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है। वहीं, बसंत कुमार के पैर में फ्रैक्चर होने पर ऑपरेशन किया गया। छात्रा खुशी गौर की आंख के ऊपर भी चोट आई है। घटना की सूचना मिलने के बाद RGPV के स्टाफ और कुलगुरु डॉ. आलोक शर्मा अस्पताल पहुंचे और घायलों के उपचार की जानकारी ली। बसों की अधिकतम गति 50 किमी प्रति घंटा निर्धारित RGPV की बसें आउटसोर्स व्यवस्था के तहत संचालित होती हैं। करीब 20 बसें अलग-अलग रूट पर विद्यार्थियों और कर्मचारियों को विश्वविद्यालय तथा UIT-RGPV तक पहुंचाती हैं। दुर्घटनाग्रस्त बस रूट नंबर 12 पर चलती है। यह दाना पानी से 10 नंबर, 11 नंबर, अरेरा कॉलोनी और माता मंदिर होते हुए वीआईपी रोड के रास्ते कॉलेज पहुंचती है। टेंडर की शर्तों के मुताबिक, बसों की अधिकतम गति 50 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित है। हादसे के बाद बस की गति और चालक की लापरवाही से जुड़े पहलुओं की जांच की जा रही है। कुलगुरु बोले- सभी बसों में लगेंगे स्पीड गवर्नर, GPS से होगी ट्रैकिंग RGPV के कुलगुरु डॉ. आलोक शर्मा ने कहा कि ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे। सभी बसों में स्पीड गवर्नर लगाने और GPS के जरिए उनकी ट्रैकिंग सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जाएगी। कुलगुरु के मुताबिक, टेंडर की शर्तों के अनुसार बसों की गति 50 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए। शुरुआती जानकारी में दुर्घटनाग्रस्त बस में स्पीड गवर्नर नहीं होने और चालक की लापरवाही की आशंका सामने आई है। फिलहाल पुलिस हादसे के कारणों की जांच कर रही है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि दुर्घटना में तेज रफ्तार, तकनीकी कमी या अन्य किसी कारण की कितनी भूमिका थी।

इंदौर में LIG से नौलखा तक एलिवेटेड कॉरिडोर का रास्ता साफ, हाईकोर्ट ने PIL खारिज की

इंदौर। इंदौर में LIG चौराहे से नौलखा चौराहे तक प्रस्तावित 6.5 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने परियोजना के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है। हालांकि, कोर्ट ने निर्माण की तकनीकी निगरानी के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने और परियोजना की कुल लागत व निर्माण पूरा होने की संभावित समय-सीमा सार्वजनिक करने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की डिवीजन बेंच ने 26 अक्टूबर को यह आदेश दिया। कोर्ट ने माना कि परियोजना से जुड़ी तकनीकी चिंताओं पर विचार करना जरूरी है, लेकिन इनके आधार पर पूरे प्रोजेक्ट को रोकना उचित नहीं होगा। नौ चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने का दिया था सुझाव चार्टर्ड इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता अतुल शेठ ने एलिवेटेड कॉरिडोर के विकल्प के रूप में प्रमुख चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर या ग्रेड सेपरेटर बनाने का सुझाव दिया था। उन्होंने MR-9, LIG, इंडस्ट्री हाउस, गिटार, पलासिया, गीताभवन, शिवाजी वाटिका, GPO और नौलखा चौराहे पर फ्लाईओवर बनाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी दलीलों में एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट के ट्रैफिक सर्वे और इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) के तकनीकी अध्ययन का हवाला दिया। उनका तर्क था कि AB रोड पर ज्यादातर वाहन लंबी दूरी तक सीधे चलने के बजाय एक-दो चौराहों के बाद मुड़ जाते हैं। ऐसे में पूरे हिस्से पर एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने के बजाय अलग-अलग चौराहों पर फ्लाईओवर बनाना अधिक उपयोगी हो सकता है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, 5 अप्रैल 2025 की रिपोर्ट में अलग-अलग चौराहों पर फ्लाईओवर बनाने से यातायात दक्षता में 42% से अधिक सुधार की संभावना जताई गई थी, जबकि एलिवेटेड कॉरिडोर से मिलने वाला लाभ 10% से कम बताया गया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि इन अध्ययनों की पर्याप्त तुलना किए बिना परियोजना को आगे बढ़ाया गया। हालांकि, ये आंकड़े याचिकाकर्ता की दलीलों का हिस्सा थे। कोर्ट ने इन्हें अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना। सरकार ने बताया भविष्य की जरूरतों के लिए जरूरी राज्य सरकार ने परियोजना का समर्थन करते हुए कहा कि AB रोड पर वाहनों का दबाव लगातार बढ़ रहा है और जमीन पर सड़क चौड़ी करने की गुंजाइश सीमित है। प्रस्तावित कॉरिडोर से मौजूदा छह लेन के अलावा चार अतिरिक्त लेन उपलब्ध होंगी। इससे वर्तमान और भविष्य की यातायात जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। वहीं, इंदौर उत्थान अभियान समिति ने भी परियोजना के समर्थन में दलील दी। समिति के मुताबिक, अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने से वाहनों को बार-बार ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना पड़ेगा। फ्लाईओवर से उतरने वाले वाहनों के सामान्य यातायात में शामिल होने पर जाम की आशंका बनी रह सकती है। इससे ईंधन की खपत बढ़ने की संभावना भी जताई गई। BRTS हटने के बाद बदले यातायात के हालात हाईकोर्ट ने माना कि इंदौर में बढ़ते यातायात को देखते हुए सड़क की अतिरिक्त क्षमता विकसित करने की जरूरत है। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट फरवरी-मार्च 2024 की थी, जब शहर में BRTS संचालित था। BRTS हटने के बाद सड़क पर अतिरिक्त जगह उपलब्ध हुई, लेकिन आबादी और वाहनों की संख्या बढ़ने से यातायात का दबाव भी बढ़ा है। कोर्ट के मुताबिक, पुराने सर्वे का आकलन मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करना जरूरी है। पीठ ने कहा कि अलग-अलग चौराहों पर छोटे फ्लाईओवर कुछ समय के लिए राहत दे सकते हैं, लेकिन उनसे सड़क की कुल क्षमता उतनी नहीं बढ़ेगी। फ्लाईओवर से उतरने वाले वाहनों के सामान्य यातायात में मिलने पर जाम की आशंका भी बनी रह सकती है। हर महीने निर्माण की समीक्षा करेगी उच्चस्तरीय समिति हाईकोर्ट ने परियोजना की तकनीकी निगरानी के लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) के मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। समिति में PWD और IDA के दो-दो सदस्य, एसजीएसआईटीएस के दो सदस्य, याचिकाकर्ता अतुल शेठ और इंदौर उत्थान अभियान समिति के दो सदस्य शामिल होंगे। समिति के सदस्यों के लिए सिविल या स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में BE या BTech की न्यूनतम योग्यता निर्धारित की गई है। एसजीएसआईटीएस की ओर से नामित अनुभवी प्राध्यापकों को छोड़कर अन्य सदस्यों के पास पुल निर्माण का अनुभव होना चाहिए। समिति महीने में कम से कम एक बार निर्माण कार्य की समीक्षा करेगी और तकनीकी समस्याओं पर PWD को सलाह देगी। जरूरत पड़ने पर मुख्य अभियंता अतिरिक्त बैठक बुला सकेंगे। समिति के फैसले बहुमत के आधार पर लिए जाएंगे। 350 करोड़ से 750 करोड़ रुपये तक लागत पहुंचने का दावा याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वर्ष 2019-20 में परियोजना की लागत करीब 350 करोड़ रुपये बताई गई थी। उनके मुताबिक, छह साल में कई बदलाव होने के बावजूद परियोजना की अंतिम लागत स्पष्ट नहीं है। याचिकाकर्ता ने बिजली की लाइनों और अन्य सुविधाओं को शिफ्ट करने का खर्च जोड़कर कुल लागत 700 से 750 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई। हालांकि, ये आंकड़े याचिकाकर्ता के दावे हैं। हाईकोर्ट ने परियोजना की अंतिम लागत तय नहीं की है। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को परियोजना की कुल लागत और निर्माण पूरा होने की संभावित समय-सीमा सार्वजनिक करने के निर्देश दिए हैं। नीतिगत फैसले में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि एलिवेटेड कॉरिडोर राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय है। जब तक दुर्भावना, अवैधता या मनमानी साबित न हो, ऐसे निर्णय में न्यायिक हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं बनता। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया गया। जनहित याचिका खारिज होने के बाद परियोजना आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है। अब निर्माण की तकनीकी निगरानी, लागत और संभावित समय-सीमा को लेकर हाईकोर्ट के निर्देशों के पालन पर नजर रहेगी।

भारत से व्यापार पर बैन के बावजूद पाकिस्तान में भारतीय सामान की मांग बढ़ी, तीसरे देशों के जरिए हो रही सप्लाई

नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे व्यापार पर रोक के बावजूद पाकिस्तानी बाजार में भारतीय सामान की मांग बढ़ने का दावा किया गया है। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी जुलाई से सितंबर के दौरान पाकिस्तान ने भारत से 61.74 मिलियन डॉलर का सामान आयात किया। उपलब्ध आंकड़ों में यह रकम पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 69% अधिक बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल इसी अवधि में पाकिस्तान ने भारत से करीब ₹3,478 करोड़ का सामान खरीदा था। वहीं, इस अवधि में पाकिस्तान से भारत को होने वाला आयात शून्य रहने की बात कही गई है। सीधे व्यापार पर रोक, फिर कैसे पहुंच रहा भारतीय सामान? 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे व्यापार पर रोक लगा दी गई थी। इसके बावजूद भारतीय उत्पादों की मांग पूरी करने के लिए तीसरे देशों के जरिए व्यापार होने की बात सामने आई है। व्यापार से जुड़े दावों के मुताबिक, कुछ कारोबारी भारत में बने सामान को पहले दुबई, सिंगापुर या श्रीलंका जैसे देशों में भेजते हैं। इसके बाद वहां से उसे पाकिस्तान पहुंचाया जाता है। इस प्रक्रिया में सामान की पैकेजिंग और दस्तावेजों में बदलाव किए जाने की भी बात कही गई है। हालांकि, किसी उत्पाद का तीसरे देश से होकर गुजरना अपने आप में गैरकानूनी नहीं होता। उसकी वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यापार, मूल देश की जानकारी, सीमा शुल्क और संबंधित प्रतिबंधों के नियमों का पालन किया गया है या नहीं। तीसरे देशों के जरिए व्यापार कैसे होता है? व्यापार के इस तरीके को समझने के लिए तीन प्रमुख चरण बताए जाते हैं: GTRI का अनुमान: अनौपचारिक व्यापार सालाना 10 अरब डॉलर से ज्यादा? थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के हवाले से दावा किया गया है कि तीसरे देशों के माध्यम से भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाला अनौपचारिक व्यापार सालाना 10 अरब डॉलर यानी करीब ₹83,000 करोड़ से अधिक हो सकता है। यह आंकड़ा एक अनुमान है। इसे भारत-पाकिस्तान के बीच दर्ज आधिकारिक व्यापार के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। पाकिस्तानी उपभोक्ताओं को महंगा पड़ सकता है भारतीय सामान सीधे व्यापार के बजाय तीसरे देशों के जरिए सामान पहुंचाने पर परिवहन, भंडारण और अन्य कारोबारी खर्च बढ़ सकते हैं। ऐसे में भारतीय उत्पाद पाकिस्तानी उपभोक्ताओं को अधिक कीमत पर मिलने की संभावना रहती है। फिलहाल, भारत-पाकिस्तान के बीच प्रत्यक्ष व्यापार पर लगी रोक के बावजूद भारतीय सामान की मांग और तीसरे देशों के जरिए होने वाली आपूर्ति को लेकर व्यापारिक दावे चर्चा में हैं। इन दावों के वास्तविक पैमाने और संबंधित लेन-देन की वैधता का आकलन करने के लिए आधिकारिक आंकड़ों और स्वतंत्र पुष्टि की जरूरत है।

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