कर्नाटक (Karnataka) में वोटर लिस्ट को लेकर एक बार फिर सियासी चर्चा तेज हो गई है। Special Intensive Revision (SIR) के बाद राज्य की अंतिम मतदाता सूची में करीब 99.32 लाख मतदाताओं की कमी दर्ज की गई है। इसी बीच कांग्रेस के मंत्री सतीश जारकीहोली के SIR प्रक्रिया को सही बताने संबंधी बयान ने इस मुद्दे को और चर्चा में ला दिया है। अब सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं की संख्या क्यों घटी और क्या सभी पात्र लोगों के नाम सुरक्षित हैं?
Karnataka Voter List: करीब 99.32 लाख मतदाताओं की कमी
कर्नाटक में SIR से पहले मतदाताओं की संख्या करीब 5.54 करोड़ थी। 27 अक्टूबर 2026 को जारी अंतिम मतदाता सूची में यह संख्या घटकर लगभग 4.55 करोड़ रह गई। इस तरह कुल 99,32,303 मतदाताओं की कमी दर्ज हुई।
चुनाव अधिकारियों के मुताबिक, मतदाता सूची को अपडेट करने के दौरान मृत व्यक्तियों, दूसरी जगह स्थायी रूप से जा चुके लोगों, डुप्लीकेट प्रविष्टियों और अन्य अपात्र मामलों की जांच की गई। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में नाम कम होने के बाद यह जानना भी जरूरी है कि कितने मामले इन कारणों से जुड़े हैं और कितने पात्र मतदाताओं को दोबारा आवेदन करना पड़ सकता है।
सतीश जारकीहोली के बयान पर क्यों हो रही चर्चा?
कर्नाटक सरकार में मंत्री सतीश जारकीहोली के नाम से सामने आए बयान में SIR प्रक्रिया में गड़बड़ी नहीं होने की बात कही गई है। इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है।
हालांकि, उनके बयान का पूरा आधिकारिक विवरण स्वतंत्र रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए उनके नाम से सामने आए दावे को अंतिम निष्कर्ष मानने से पहले मूल बयान और उसका संदर्भ देखना जरूरी है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने मतदाता सूची में पारदर्शिता और नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलती से वोटर लिस्ट से बाहर न हो।
Election Commission का क्या कहना है?
चुनाव अधिकारियों के अनुसार, मतदाता सूची में बदलाव निर्धारित नियमों और सत्यापन की प्रक्रिया के तहत किए गए हैं। नाम हटाने से पहले संबंधित मामलों की जांच, नोटिस और दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना है। लेकिन किसी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में बहुत बड़ी गिरावट आने पर आंकड़ों की दोबारा जांच करना भी महत्वपूर्ण है, ताकि पात्र मतदाताओं को परेशानी न हो।
Form 7 को लेकर भी उठे सवाल
मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने या नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए Form 7 का इस्तेमाल किया जाता है। इसी फॉर्म को लेकर कर्नाटक में सवाल उठे थे।
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए और यह जांच होनी चाहिए कि नाम हटाने से जुड़े अनुरोध नियमों के अनुसार दर्ज किए गए या नहीं।
दूसरी ओर, निर्वाचन अधिकारियों ने कहा है कि नाम हटाने की कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही की जानी चाहिए। किसी भी मामले में अंतिम फैसला नियमों और संबंधित जांच के आधार पर होना जरूरी है।
Bengaluru में सबसे ज्यादा चर्चा क्यों?
कर्नाटक में मतदाताओं की संख्या में गिरावट का असर बेंगलुरु के कई इलाकों में भी दिखाई दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, बेंगलुरु अर्बन जिले में मतदाताओं की संख्या में बड़ी कमी दर्ज की गई है।
इसी वजह से उन क्षेत्रों के आंकड़ों की दोबारा जांच की जरूरत महसूस की जा रही है, जहां पहले और अंतिम मतदाता सूची के बीच अंतर काफी ज्यादा है। अधिकारियों की जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि नामों में कमी के पीछे क्या कारण रहे और क्या किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट गया है।
वोटर लिस्ट में नाम नहीं है तो क्या करें?
अगर आप कर्नाटक के मतदाता हैं और अंतिम वोटर लिस्ट में अपना नाम नहीं देख पा रहे हैं, तो घबराने के बजाय पहले अपनी जानकारी की जांच करें।
- चुनाव आयोग के आधिकारिक Voters’ Service Portal पर अपना नाम खोजें।
- जरूरत पड़ने पर अपने बूथ लेवल अधिकारी (BLO) से संपर्क करें।
- पात्र होने के बावजूद नाम नहीं मिलने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत Form 6 जमा करें।
- नाम, पता या अन्य विवरण में गलती होने पर संबंधित सुधार प्रक्रिया अपनाएं।
समय रहते जानकारी की जांच करने से मतदान के अधिकार से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में मदद मिल सकती है।
Karnataka SIR पर अब आगे क्या होगा?
कर्नाटक में करीब 99.32 लाख मतदाताओं की कमी के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इस बदलाव के पीछे अलग-अलग कारणों का वास्तविक अनुपात क्या है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया, राजनीतिक दलों की आपत्तियां और मतदाताओं की शिकायतें इस मामले के अलग-अलग पहलू हैं।
सतीश जारकीहोली के नाम से सामने आए बयान ने राजनीतिक चर्चा को बढ़ाया है, लेकिन इस विवाद का समाधान आंकड़ों की पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं की शिकायतों के निष्पक्ष निपटारे से ही संभव होगा।
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