पद्मश्री पीयूष पांडे का मुंबई में अंतिम संस्कार हुआ। उन्होंने फेविकॉल, कैडबरी, एशियन पेंट्स और “अबकी बार मोदी सरकार” जैसे यादगार विज्ञापन बनाए। जानिए कैसे उनके आइडियाज ने भारत की सोच बदल दी।
एड गुरु पीयूष पांडे नहीं रहे — मुंबई में हुआ अंतिम संस्कार

विज्ञापन जगत के दिग्गज और पद्मश्री सम्मानित पीयूष पांडे का अंतिम संस्कार शनिवार को मुंबई के शिवाजी पार्क श्मशान घाट में किया गया।
23 अक्टूबर को उनका निधन हो गया था। वे कुछ समय पहले एक कॉन्फ्रेंस के लिए दिल्ली गए थे, जहां उन्हें गंभीर संक्रमण हो गया था। पहले उन्हें निमोनिया हुआ और बाद में चिकनपॉक्स ने उनकी हालत बिगाड़ दी।
उनकी अंतिम यात्रा में बॉलीवुड से लेकर एड वर्ल्ड तक की कई मशहूर हस्तियां शामिल हुईं — अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन समेत कई दिग्गज लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे।

“जिंदगी और विज्ञापन दोनों का मकसद है जुड़ना, जीतना नहीं”
पीयूष पांडे का मानना था कि “कहानी वही होती है जो दिल से निकले, तभी वह कानों में नहीं, दिमाग में बसती है।”
उनके बनाए विज्ञापनों में यही जुड़ाव साफ झलकता था — आम आदमी की भावनाओं से, रोजमर्रा की जिंदगी से।
27 की उम्र में शुरू हुआ सफर, बनाया ओगिल्वी को पहचान
पीयूष ने 27 वर्ष की उम्र में विज्ञापन की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत अपने भाई प्रसून पांडे के साथ की, जहां दोनों ने रेडियो जिंगल्स की आवाज दी।
1982 में वे Ogilvy India से जुड़े और 1994 में इसके बोर्ड मेंबर बने। 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा, जबकि 2024 में उन्हें LIA Legend Award मिला — यह सम्मान किसी भी भारतीय क्रिएटिव माइंड के लिए गर्व का विषय है।
भारत को याद रहेंगे पीयूष पांडे के ये 6 आइकॉनिक एड कैंपेन
1️⃣ Fevicol का “ट्रक वाला विज्ञापन” (2007)
एक ट्रक पर भीड़ सवार है, सड़क ऊबड़-खाबड़ है, लेकिन कोई गिरता नहीं — बस यही सिंपल आइडिया भारत का सबसे मजबूत ब्रांड बना गया।
“जुड़ने” की ताकत को उन्होंने “फेविकॉल” में उतारा — और यह एड आज भी इतिहास में दर्ज है।

2️⃣ Cadbury का “Cricket वाला विज्ञापन” (2007)
“कुछ खास है जिंदगी में!” — यह लाइन हर भारतीय के दिल में आज भी गूंजती है।
एक बच्चे की खुशी और पूरे मोहल्ले का जश्न, पांडे की आवाज़ और भावनात्मक टच ने इस विज्ञापन को अमर बना दिया।
3️⃣ Asian Paints का “हर घर कुछ कहता है” (2002)
घर की दीवारों में छुपी यादों को कहानी में बदलने वाला यह विज्ञापन लाखों लोगों के दिलों को छू गया।
टैगलाइन “हर घर कुछ कहता है” ने एशियन पेंट्स को मार्केट लीडर बना दिया।
4️⃣ Hutch (Vodafone) का “पग वाला विज्ञापन” (2003)
“भाई, हच है ना!” — एक प्यारा सा पग, एक बच्चा और एक गहरा मैसेज: “Wherever you go, Hutch is with you.”
इस विज्ञापन ने मोबाइल ब्रांड को नया जीवन दिया।
5️⃣ BJP का “अबकी बार मोदी सरकार” (2014)
सिर्फ एक लाइन, जिसने राजनीतिक कम्युनिकेशन को बदल दिया।
पीयूष ने इसे 50 दिन में डिजाइन किया था।
उन्होंने 200 से अधिक टीवी कमर्शियल, 100 रेडियो एड्स और 100 प्रिंट विज्ञापन तैयार किए।
उनका फोकस था — लोगों से उनकी भाषा में बात करना।
6️⃣ पल्स पोलियो का “दो बूंदें जिंदगी की”
इस सरकारी कैंपेन ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई।
पीयूष ने दिखाया कि विज्ञापन सिर्फ बिकवाली नहीं, बदलाव का जरिया भी हो सकता है।
“अबकी बार मोदी सरकार” कैंपेन — 50 दिन में बना इतिहास
एक इंटरव्यू में पीयूष ने बताया था —
“हमने इस लाइन को किसी बड़ी सोच से नहीं, बल्कि आम बोलचाल की भाषा से निकाला था। हमारा मकसद था — कनेक्शन, न कि इम्प्रेशन।”
उनकी टीम ने रिसर्च कर मोदी की लीडरशिप इमेज को केंद्र में रखा।
हर रात बीजेपी नेता उनके साथ बैठकर एड फाइनल करते थे।
यह कैंपेन भारत के इतिहास का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक विज्ञापन बना।
पीयूष पांडे की विरासत – क्रिएटिविटी जो जोड़ती है, बाँटती नहीं
पीयूष ने भारत के विज्ञापन जगत को ‘ग्लोबल लेवल पर ह्यूमन टच’ देना सिखाया।
उनके आइडियाज ने न सिर्फ ब्रांड्स को नई पहचान दी, बल्कि भारत के लोगों को भी जोड़ा।
पीयूष पांडे का जाना सिर्फ विज्ञापन उद्योग की नहीं, भारत की रचनात्मक आत्मा की भी बड़ी क्षति है।
उन्होंने सिखाया कि क्रिएटिविटी का मतलब जीतना नहीं, दिलों को जोड़ना है।
