इस साल जून का महीना भारत के मौसम इतिहास में एक अलग ही कहानी लिख गया है। जहां आमतौर पर जून की बारिश से खेतों में हरियाली छा जाती है, वहीं 2026 का जून लोगों को सूखा और गर्मी दोनों की मार देकर गया। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक यह पिछले 146 सालों में सबसे सूखा जून रहा है, जिसमें देशभर में सामान्य से करीब 40% कम बारिश दर्ज की गई।
इस बारिश की कमी ने सिर्फ मौसम वैज्ञानिकों को ही नहीं, बल्कि किसानों और आम लोगों की दिनचर्या तक को प्रभावित किया है।
IMD की रिपोर्ट क्या कहती है?
India Meteorological Department (IMD) के अनुसार, इस बार मानसून की शुरुआत समय पर हुई थी, लेकिन उसकी रफ्तार और फैलाव दोनों ही कमजोर रहे। जून के ज्यादातर दिनों में बारिश देने वाले सिस्टम सक्रिय नहीं हो पाए, जिससे कई राज्यों में लंबे सूखे हालात बने रहे।
मानसून इतना कमजोर क्यों पड़ा? (5 बड़े कारण)
मानसून ट्रफ का कमजोर होना
मानसून ट्रफ इस बार अपनी सामान्य स्थिति में नहीं रही, जिससे बारिश लाने वाले बादलों का सही तरीके से गठन नहीं हो सका।
El Niño का असर
प्रशांत महासागर में विकसित El Niño स्थिति ने भारतीय मानसून को कमजोर कर दिया, जिसका सीधा असर बारिश की मात्रा पर पड़ा।
समुद्री सिस्टम की कमी
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में लो-प्रेशर सिस्टम की कमी रही, जिससे नमी की सप्लाई कमजोर पड़ गई।
जेट स्ट्रीम में बदलाव
ऊपरी वायुमंडल में हवा के प्रवाह (Jet Stream) में बदलाव ने मानसून की गति और दिशा दोनों को प्रभावित किया।
जलवायु परिवर्तन का असर
लगातार बढ़ते तापमान और बदलते मौसम पैटर्न ने मानसून को अस्थिर बना दिया है, जिससे बारिश का वितरण असमान हो गया है।
आम जिंदगी पर असर
इस सूखे जून का असर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर जमीन पर साफ दिखा—
- खरीफ फसलों की बुवाई में देरी
- कई राज्यों में पानी की कमी
- गर्मी और हीटवेव जैसी स्थिति
- किसानों की लागत और चिंता दोनों में बढ़ोतरी
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव
आगे क्या उम्मीद है?
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई में मानसून कुछ गति पकड़ सकता है, लेकिन जून की भारी कमी को पूरी तरह भर पाना मुश्किल रहेगा। आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम होंगे, क्योंकि वही तय करेंगे कि इस साल की बारिश का कुल संतुलन कैसा रहेगा।
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