दिल्ली दंगा मामले में आरोपी Umar Khalid को लेकर Supreme Court ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद”, जबकि उमर खालिद को पहले बेल मिल सकती थी। अदालत ने अपने पुराने फैसले पर भी आपत्ति जताई और कहा कि कई मामलों में इस मूल सिद्धांत का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी आरोपी को ट्रायल से पहले लंबे समय तक जेल में रखना सही नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण है और बेल को अधिकार की तरह देखा जाना चाहिए।
दरअसल, उमर खालिद पर 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने का आरोप है। उनके खिलाफ यूएपीए (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया था। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जबकि मामले के कुछ अन्य आरोपियों को राहत दी गई थी।
अब सुप्रीम कोर्ट की नई टिप्पणी के बाद इस फैसले को लेकर फिर बहस शुरू हो गई है। अदालत ने कहा कि “बेल नियम और जेल अपवाद” का सिद्धांत सिर्फ सामान्य मामलों में ही नहीं, बल्कि यूएपीए जैसे मामलों में भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आने वाले समय में जमानत से जुड़े मामलों पर बड़ा असर डाल सकती है। इससे निचली अदालतों को भी यह संदेश गया है कि लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
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