बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करते हुए कहा है कि बिना किसी ठोस कारण के जांच और चार्जशीट दाखिल करने में 6 साल से अधिक की देरी करना आरोपी को प्रताड़ित करने के समान है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले त्वरित न्याय और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना।
यह फैसला रमेश सिन्हा और रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया।
2018 की घटना से जुड़ा मामला
याचिकाकर्ता श्रिया पांडेय वर्ष 2018 में एक न्यूज चैनल में रिपोर्टर के रूप में कार्यरत थीं। उस दौरान पुलिसकर्मियों का आंदोलन चल रहा था। 20 जून 2018 को आंदोलनकारी पुलिसकर्मियों की पत्नियों को महिला थाने में बैठाए जाने की सूचना मिलने पर श्रिया अपनी टीम के साथ जानकारी लेने महिला थाना पहुंची थीं।
पत्रकार पर दर्ज कर दिया गया था केस
याचिका के अनुसार, जानकारी मांगने पर पुलिसकर्मियों ने सहयोग नहीं किया और बाद में श्रिया पांडेय के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा, मारपीट और अन्य धाराओं में मामला दर्ज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट पहुंची पत्रकार
पुलिस कार्रवाई को चुनौती देते हुए श्रिया पांडेय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि घटना वर्ष 2018 की थी, जबकि पुलिस ने चार्जशीट नवंबर 2024 में पेश की। इस छह साल की देरी को लेकर पुलिस विभाग कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सका।
कोई स्वतंत्र गवाह नहीं मिला
अदालत ने केस डायरी और चार्जशीट का अवलोकन करने के बाद कहा कि पूरा मामला केवल पुलिसकर्मियों और उनसे जुड़े गवाहों के बयानों पर आधारित था। घटनास्थल पर कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास हैं और पत्रकार द्वारा अपराध किए जाने का कोई प्रत्यक्ष एवं ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है।
कानून के दुरुपयोग पर अदालत की टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने कहा कि ऐसे मामले को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसलिए महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को निरस्त किया जाता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक मुकदमे की प्रक्रिया में उलझाकर रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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