संसद में Delimitation Bill 2026 को लेकर सियासी हलचल एक बार फिर तेज हो गई है। अब तक इस बिल का खुलकर विरोध कर रही DMK के रुख में नरमी के संकेत मिल रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की पार्टी केंद्र की मोदी सरकार को इस बिल पर समर्थन देने के लिए तैयार हो सकती है, लेकिन इसके लिए उसने तीन अहम शर्तें रखी हैं।
DMK का कहना है कि परिसीमन केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे से है। यही वजह है कि पार्टी चाहती है कि सरकार उसकी मांगों को कानूनी रूप से स्पष्ट करे।
DMK की पहली शर्त क्या है?
पहली मांग 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के बंटवारे पर लगी रोक से जुड़ी है। पार्टी चाहती है कि यह व्यवस्था, जिसकी मौजूदा अवधि 2027 में समाप्त होनी है, संविधान संशोधन के जरिए आगे 25 साल तक जारी रखी जाए।
दक्षिणी राज्यों की चिंता लंबे समय से यही रही है कि जनसंख्या को परिसीमन का प्रमुख आधार बनाने पर जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
दूसरी शर्त—सभी राज्यों में 50% सीटों का इजाफा
DMK की दूसरी बड़ी मांग है कि लोकसभा सीटों में सभी राज्यों के लिए समान रूप से 50 प्रतिशत बढ़ोतरी की जाए। पार्टी चाहती है कि इस संबंध में केवल राजनीतिक या मौखिक आश्वासन न हो, बल्कि कानून में स्पष्ट प्रावधान किया जाए।
केंद्र सरकार की ओर से पहले यह तर्क दिया गया है कि प्रस्तावित व्यवस्था में दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं होगा। गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि 543 लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 816 करने के प्रस्ताव में दक्षिण भारत की सीटें भी बढ़ेंगी। उनके मुताबिक दक्षिणी राज्यों की मौजूदा 129 सीटें बढ़कर 195 हो सकती हैं और कुल सदन में उनका हिस्सा करीब 24 प्रतिशत के आसपास बना रहेगा।
तीसरी शर्त—नई सीटों की पूरी लिस्ट जारी हो
DMK की तीसरी मांग भी काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी चाहती है कि नए कानून के साथ-साथ सभी राज्यों में बदले जाने वाले लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की पूरी सूची भी सार्वजनिक की जाए।
यानी पार्टी केवल सीटों की कुल संख्या जानने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि यह भी स्पष्ट देखना चाहती है कि परिसीमन के बाद किन क्षेत्रों की सीमाएं कैसे बदलेंगी।
DMK के समर्थन से क्या बदलेगा?
परिसीमन बिल को लेकर केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संविधान संशोधन से जुड़ी आवश्यक संख्या जुटाना है। रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा में NDA की मौजूदा ताकत 319 बताई गई है, जबकि DMK के 22 सांसद हैं। यदि DMK समर्थन देती है तो NDA की संख्या 341 तक पहुंच सकती है।
हालांकि, केवल DMK के समर्थन से ही जरूरी आंकड़ा पूरा नहीं होता। ऐसे में सरकार को दूसरे दलों और सांसदों का समर्थन भी जुटाना होगा।
अप्रैल में बिल पेश किए जाने के दौरान इसे 298 वोट मिले थे। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 किए जाने की बात सामने आई है।
दक्षिण बनाम उत्तर की बहस क्यों?
परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंता मुख्य रूप से जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और अन्य दक्षिणी राज्यों का तर्क रहा है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए हैं, इसलिए केवल आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उनके लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है।
वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि प्रस्तावित मॉडल में दक्षिणी राज्यों की सीटें घटने के बजाय बढ़ेंगी। सरकार के मुताबिक तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59, कर्नाटक की 28 से 42 और केरल की 20 से 30 हो सकती हैं।
अभी अंतिम फैसला बाकी
फिलहाल DMK का समर्थन पूरी तरह तय नहीं माना जा सकता। पार्टी सूत्रों के मुताबिक अंतिम निर्णय बिल के अंतिम ड्राफ्ट और उसके प्रावधानों की समीक्षा के बाद ही लिया जाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और DMK के बीच बातचीत पर सबकी नजर रहेगी।
परिसीमन बिल अब सिर्फ संसद में सीटों के पुनर्वितरण का मुद्दा नहीं रह गया है। इसके साथ दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी, जनसंख्या नियंत्रण और केंद्र-राज्य संबंधों का सवाल भी जुड़ गया है। ऐसे में DMK की तीन शर्तें मानना सरकार के लिए आसान होगा या नहीं, यही इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।
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