राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद को संबोधित किया। उन्होंने धर्म, पर्यावरण, युवाओं के आचरण और भारत के पड़ोसी देश के रवैये सहित कई विषयों पर विचार रखे। भागवत ने युवाओं से धर्म को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखने और इसे अपने दैनिक जीवन व आचरण में उतारने की अपील की।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल रिलिजन नहीं, बल्कि जीवन जीने का अनुशासन है। किसी इच्छा की पूर्ति, भय, लालच या जान बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। सुख-दुख और परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन धर्म स्थायी रहता है।
कर्मकांड धर्म का हिस्सा, लेकिन पूरा धर्म नहीं
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म को लेकर भ्रम का एक कारण अपनी भाषा और धर्म के वास्तविक अर्थ को भूल जाना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में दंड-बैठक जरूरी होती है, उसी तरह धर्म के कर्मकांड और अनुशासन उसके अभ्यास का हिस्सा हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्मकांड धर्म का एक अंग है, लेकिन पूरा धर्म नहीं है।
कचरा न करना और ट्रैफिक नियमों का पालन भी धर्म
भागवत ने कहा कि धर्म केवल पूजा और धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। खाना खाने के बाद कचरा न करना और ट्रैफिक नियमों का पालन करना भी धर्म का हिस्सा है।
उन्होंने युवाओं से अपनी उपासना-पद्धति, परंपरा और गुरु का सम्मान करने के साथ-साथ दूसरों की उपासना-पद्धतियों का भी सम्मान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि किसी को कन्वर्ट नहीं करना और सभी की आस्थाओं का सम्मान करना भी धर्म का हिस्सा है।
पाकिस्तान का नाम लिए बिना पड़ोसी देश पर टिप्पणी
संघ प्रमुख ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना पश्चिम दिशा के पड़ोसी देश का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक पड़ोसी देश बिना कारण विवाद करता है और बार-बार भारत को परेशानी देता है। उनके अनुसार, भारत ने कई बार उसे सबक सिखाया, लेकिन इसके बावजूद भारत ने दूसरे देशों के साथ व्यवहार में अपनी मानवीय दृष्टि नहीं छोड़ी।
भागवत ने कहा कि भारत में अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें रही हैं, लेकिन देश ने दुनिया के संघर्षों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर भारत ने उन लोगों की भी मदद की, जिन्होंने पहले भारत को नुकसान पहुंचाया था।
युवाओं के धर्म पर विचार करने से जताई खुशी
मोहन भागवत ने कहा कि उन्हें खुशी है कि युवा धर्म के बारे में विचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आजकल धर्म को कई लोग बुढ़ापे या रिटायरमेंट से जोड़कर देखते हैं, जबकि गीता और रामायण जैसे ग्रंथों का अध्ययन जीवन के हर चरण में किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्ति के अस्तित्व की शुरुआत से अंत तक बना रहता है। व्यक्ति उसे माने या न माने, धर्म जीवन में मौजूद रहता है।
अहंकार से पैदा होती है गलतफहमी
भागवत ने युवाओं को अहंकार से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति यह मानने लगता है कि हर चीज उसके नियंत्रण में है और सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार होना चाहिए, तो गलतफहमी पैदा होती है।
उन्होंने युवाओं से धर्म के सिद्धांतों को समझने और उन्हें अपने व्यवहार में उतारने का आह्वान किया।
युवा धर्म संसद में 1,700 छात्र-छात्राएं शामिल
उज्जैन के गीता भवन में 17 से 19 सितंबर तक सेवाज्ञ संस्थानम् की ओर से युवा धर्म संसद का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम में देशभर से करीब 1,700 युवा छात्र-छात्राएं शामिल हो रहे हैं। इसके अलावा लगभग 300 विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य भी कार्यक्रम का हिस्सा बन रहे हैं।
आयोजन सिद्धपीठ हनुमत निवास अयोध्या के पीठाधीश्वर एवं संरक्षक आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण महाराज के मार्गदर्शन में किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम के बाद यह युवा धर्म संसद का छठा संस्करण है। अगले वर्ष इसका आयोजन द्वारका में किया जाएगा।
AI और सूचना-विचार संघर्ष पर भी होगा संवाद
कार्यक्रम में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा पर व्याख्यान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सूचना-विचार संघर्ष पर संवाद तथा देशभर से चयनित युवाओं के विशेष उद्बोधन सत्र आयोजित किए जाएंगे।
व्याख्यान सत्र में अवधेशानंद गिरि जी महाराज, मनोज मुंतशिर, प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी, स्मृति अनंतलक्ष्मी और जे. नंद कुमार सहित कई वक्ता युवाओं का मार्गदर्शन करेंगे।
सह-मीडिया प्रमुख बादल सिंह के अनुसार, इस बार कार्यक्रम में 25 राज्यों से युवा शामिल हो रहे हैं। इससे पहले आयोजित पांच संस्करणों में करीब 7,100 प्रतिभागी हिस्सा ले चुके हैं।

