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Omar Abdullah Government Crisis: उमर सरकार पर संकट के बादल, 25 विधायक नाराज; फारूक अब्दुल्ला ने बुलाई बैठक

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जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नेशनल कॉन्फ्रेंस (National Conference) के अंदर चल रही नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला (Omar Abdullah) के लिए मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं, क्योंकि पार्टी के कई विधायक सरकार के कामकाज और कैबिनेट में हुए बदलावों से खुश नहीं हैं। करीब 25 विधायकों ने अपनी मांगें पूरी करने के लिए 14 दिन का अल्टीमेटम दिया है। चेतावनी है कि बात नहीं बनी तो विधायक सरकार से समर्थन वापस लेने या इस्तीफे जैसे कदम उठा सकते हैं।

इस बीच 6 नवंबर को पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के श्रीनगर स्थित आवास पर नाराज विधायकों की अहम बैठक हुई। इसमें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी शामिल हुए। हालांकि, सभी 25 विधायक बैठक में मौजूद नहीं थे। India Today के मुताबिक, बैठक में 15 असंतुष्ट विधायक पहुंचे थे। वहीं, Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले 18 नाराज विधायकों ने अलग बैठक की थी।

अब सवाल सिर्फ पार्टी के अंदर मतभेद का नहीं, बल्कि उमर अब्दुल्ला सरकार के बहुमत का भी है।

25 विधायकों ने क्यों खोला मोर्चा?

नेशनल कॉन्फ्रेंस में असंतोष की सबसे बड़ी वजह 27 अक्टूबर 2026 को हुआ कैबिनेट विस्तार बताया जा रहा है। इस दौरान उमर अब्दुल्ला ने चार नए मंत्रियों को कैबिनेट में जगह दी। इनमें अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद कल्लू शामिल हैं।

इस फेरबदल में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को मंत्री पद नहीं मिला। इनमें मुबारक गुल और अब्दुल मजीद लारमी जैसे अनुभवी विधायक भी शामिल हैं। इसके बाद पार्टी के भीतर नाराजगी बढ़ने लगी।

विधायकों का आरोप है कि सरकार के बड़े फैसले लेने में उनकी राय नहीं ली जाती। कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी और सरकार के फैसले सीमित लोगों के बीच ही लिए जा रहे हैं। यही वजह है कि अब विधायक नेतृत्व से जवाब मांग रहे हैं।

नाराज विधायकों की 3 बड़ी मांगें

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं।

1. पूरी कैबिनेट में बदलाव: विधायक मौजूदा मंत्रियों के विभागों और कामकाज की समीक्षा चाहते हैं। उनकी मांग है कि कैबिनेट का नए सिरे से गठन हो और विधायकों की सलाह को महत्व दिया जाए।

2. CM के सलाहकार को हटाने की मांग: विधायक मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को पद से हटाने की मांग कर रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार के कामकाज में कुछ सलाहकारों का प्रभाव जरूरत से ज्यादा है।

3. विधायकों की शिकायतों का समाधान: असंतुष्ट नेताओं का कहना है कि निर्वाचित विधायकों को सम्मान मिलना चाहिए। सरकार के फैसलों, विभागों के बंटवारे और विकास कार्यों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

इसके अलावा मंत्रियों की नियुक्ति में पारदर्शिता, वरिष्ठ नेताओं को प्रतिनिधित्व और जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सरकार का मजबूत रुख भी उनकी मांगों में शामिल है।

फारूक अब्दुल्ला के घर बैठक, 15 विधायक पहुंचे

6 नवंबर को श्रीनगर के गुपकर रोड स्थित फारूक अब्दुल्ला के आवास पर हुई बैठक को पार्टी के लिए अहम माना जा रहा है। नाराज विधायक अपनी मांगों को लेकर पार्टी अध्यक्ष से मिले। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी बातचीत में शामिल हुए।

India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में 15 असंतुष्ट विधायक पहुंचे। उनके साथ एक निर्दलीय विधायक भी इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ा हुआ बताया गया है। हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने निर्दलीय विधायक से बातचीत करने से इनकार करते हुए केवल नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों से चर्चा करने की बात कही।

इससे पहले 5 नवंबर को भी नाराज विधायकों ने बंद कमरे में बैठक कर अपनी रणनीति पर चर्चा की थी। पार्टी के अंदर इस तरह लगातार बैठकें होना बताता है कि मामला केवल कुछ नेताओं की नाराजगी तक सीमित नहीं रह गया है।

हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं ने बगावत की खबरों को खारिज किया है। उनका कहना है कि विधायकों के बीच मतभेद हैं, लेकिन इसे पार्टी में टूट कहना सही नहीं होगा।

Aga Syed Ruhullah Mehdi के इस्तीफे से बढ़ी परेशानी

नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक और बड़ा झटका तब लगा, जब श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने 3 नवंबर को पार्टी और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देने का ऐलान किया।

रुहुल्लाह ने पार्टी नेतृत्व पर चुनावी वादे पूरे नहीं करने का आरोप लगाया। उनके प्रमुख मुद्दों में अनुच्छेद 370 और 35A की बहाली, जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा, संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा और राजनीतिक बंदियों की रिहाई शामिल हैं।

उन्होंने फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी सवाल उठाए। करीब 24 साल तक नेशनल कॉन्फ्रेंस से जुड़े रहने के बाद उनका यह फैसला पार्टी के लिए अहम राजनीतिक घटनाक्रम बन गया।

रुहुल्लाह के इस्तीफे और विधायकों की नाराजगी ने पार्टी नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ संगठन के अंदर असंतोष है, तो दूसरी तरफ चुनावी वादों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

क्या गिर सकती है उमर अब्दुल्ला सरकार? समझिए पूरा Number Game

इस विवाद के बीच सबसे ज्यादा चर्चा जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बहुमत के आंकड़ों को लेकर हो रही है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 90 निर्वाचित सीटें हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास फिलहाल 41 विधायक हैं। कांग्रेस के 6, निर्दलीय के 6 और CPM के एक विधायक के समर्थन से सत्ताधारी गठबंधन की संख्या 54 तक पहुंचती है।

विधानसभा में बहुमत के लिए 46 विधायकों का समर्थन जरूरी है।

अब अगर 20 नाराज NC विधायक इस्तीफा दे देते हैं और उनके इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष स्वीकार कर लेते हैं, तो विधानसभा की प्रभावी संख्या घटकर 70 रह सकती है। ऐसी स्थिति में बहुमत का आंकड़ा 36 हो जाएगा।

वहीं, अगर एक निर्दलीय विधायक भी समर्थन वापस लेता है, तो सत्ताधारी गठबंधन की संख्या 33 तक आ सकती है। इस स्थिति में उमर अब्दुल्ला सरकार बहुमत से नीचे पहुंच सकती है।

यही वजह है कि 25 विधायकों की नाराजगी को पार्टी के लिए गंभीर चुनौती माना जा रहा है। हालांकि, यह पूरा गणित संभावित स्थिति पर आधारित है। अभी तक विधायकों के सामूहिक इस्तीफे या समर्थन वापसी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

Anti-Defection Law भी बन सकता है बड़ी चुनौती

अगर नाराज विधायक पार्टी छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल होने का फैसला करते हैं, तो उन्हें दल-बदल कानून का सामना करना पड़ सकता है।

संविधान की दसवीं अनुसूची के मुताबिक, किसी पार्टी के टिकट पर चुने गए विधायक के स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने पर उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है।

पार्टी में विलय के लिए विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायकों के हिसाब से यह संख्या कम से कम 28 होगी।

हालांकि, विधायक का इस्तीफा देना एक अलग संवैधानिक प्रक्रिया है। इस पर विधानसभा अध्यक्ष का फैसला अहम होगा।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के पुराने नेताओं और नाराज विधायकों को साथ बनाए रखने की है। 14 दिन का अल्टीमेटम पार्टी नेतृत्व के लिए अहम समयसीमा बन गया है।

अगर विधायकों की मांगों पर सहमति बनती है, तो पार्टी के भीतर चल रहा विवाद शांत हो सकता है। लेकिन बातचीत बेनतीजा रहती है तो मामला समर्थन वापसी और विधानसभा में बहुमत की परीक्षा तक पहुंच सकता है।

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अब सबकी नजर इस बात पर है कि उमर अब्दुल्ला सरकार नाराज विधायकों को मनाने के लिए क्या कदम उठाती है। आने वाले दिन तय करेंगे कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का यह अंदरूनी विवाद बातचीत से सुलझता है या सरकार के लिए नई राजनीतिक चुनौती बनता है।

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Yukta

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India Visa Rules: पाकिस्तान-बांग्लादेश से आए 6 समुदायों के लिए बदले नियम, अब लेना होगा Visa

India में रहने वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए इमिग्रेशन नियमों में बदलाव किया गया है। केंद्र सरकार के नए आदेश के बाद अब हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के उन लोगों को भारत में आगे रहने के लिए उचित श्रेणी का वीजा लेना होगा, जिन्हें पहले कुछ शर्तों के तहत पासपोर्ट और वीजा से छूट मिली हुई थी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 4 नवंबर 2026 को Immigration and Foreigners (Exemption) (Amendment) Order, 2026 जारी किया। यह बदलाव 5 नवंबर को सरकारी गजट में प्रकाशित हुआ। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सरकार ने क्या बदलाव किए हैं और इसका किन लोगों पर असर पड़ेगा। Visa Rules Change: क्या बदला है सरकार ने? 5 बड़ी बातें 1. छह अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर बदले नियम नए आदेश में हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों को शामिल किया गया है। ये वे समुदाय हैं, जिनके लोगों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न या उसके डर के कारण भारत आने पर कुछ विशेष छूट दी गई थी। 2. 31 दिसंबर 2024 तक भारत आने वालों के लिए प्रावधान इस बदलाव का संबंध उन लोगों से है, जो 31 दिसंबर 2024 या उससे पहले भारत पहुंचे थे। इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो बिना वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेजों के भारत आए थे या जिनके यात्रा दस्तावेजों की वैधता समाप्त हो चुकी थी। 3. अब भारत में रहने के लिए लेना होगा वीजा पहले निर्धारित शर्तों के तहत इन लोगों को पासपोर्ट और वीजा से छूट मिली हुई थी। लेकिन नए संशोधन के अनुसार, भारत में अपना प्रवास जारी रखने के लिए उन्हें उचित श्रेणी का वीजा लेना होगा। हालांकि, आदेश में प्रवेश से संबंधित पहले वाली छूट को पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है। 4. नेपाल और भूटान की यात्रा के नियमों में भी बदलाव सरकार ने नेपाल और भूटान जाने वाले भारतीय नागरिकों के लिए भी यात्रा दस्तावेजों से जुड़े प्रावधानों में संशोधन किया है। दोनों देशों के बीच सीधे आने-जाने के लिए निर्धारित पहचान दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जा सकेगा। वहीं, किसी तीसरे देश के रास्ते यात्रा करने पर पासपोर्ट और लागू परिस्थितियों में वीजा की जरूरत होगी। 5. कुछ पाकिस्तानी नागरिकों के लिए भी विशेष प्रावधान नए आदेश में उन कुछ पाकिस्तानी नागरिकों के लिए भी प्रावधान किया गया है, जो 31 दिसंबर 2009 या उससे पहले भारत में स्थायी रूप से बसने के इरादे से आए थे। इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जो पाकिस्तानी कंप्यूटरीकृत पहचान पत्र (CNIC) नहीं होने के कारण अपना पासपोर्ट रिन्यू नहीं करा पा रहे हैं। हालांकि, भारत में आगे रहने के लिए उन्हें भी उचित वीजा लेना होगा। CAA और नए Visa Rules में क्या अंतर है? सरकार के इस फैसले के बाद नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की भी चर्चा हो रही है। हालांकि, दोनों के उद्देश्य और समय-सीमा अलग-अलग हैं। CAA के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के पात्र लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। इसके लिए 31 दिसंबर 2014 तक भारत आने समेत अन्य निर्धारित शर्तें पूरी करनी होती हैं। वहीं, नए इमिग्रेशन संशोधन में 31 दिसंबर 2024 तक भारत आए लोगों के वीजा और भारत में रहने से जुड़े नियमों में बदलाव किया गया है। किन लोगों पर पड़ेगा नए नियमों का असर? इस फैसले का असर मुख्य रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए छह गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों के उन लोगों पर पड़ेगा, जो पहले मिली विशेष छूट के आधार पर भारत में रह रहे थे। आसान शब्दों में कहें तो सरकार ने पुराने नियमों के तहत मिली कुछ छूटों में बदलाव किया है। अब संबंधित लोगों को भारत में अपना प्रवास जारी रखने के लिए वीजा संबंधी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Patna में पुलिस मुठभेड़ में 3 शूटर ढेर, 20 मिनट तक चली गोलीबारी

Patna में पुलिस मुठभेड़ में 3 शूटर ढेर, 20 मिनट तक चली गोलीबारी

बिहार की राजधानी Patna में पुलिस और अपराधियों के बीच हुई मुठभेड़ में तीन शूटर मारे गए। बताया जा रहा है कि दोनों ओर से करीब 20 मिनट तक गोलीबारी हुई। इस दौरान अपराधियों ने पुलिस टीम पर 24 राउंड फायरिंग की, जिसमें एक थाना प्रभारी (SHO) भी घायल हो गए। घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया। मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिजनों ने मौके पर पहुंचकर हंगामा किया। इस दौरान तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई की भी खबर सामने आई है। 20 मिनट तक चली मुठभेड़ जानकारी के मुताबिक, पुलिस को अपराधियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी। इसके बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंची। इसी दौरान अपराधियों ने पुलिस को निशाना बनाते हुए फायरिंग शुरू कर दी। जवाब में पुलिस ने भी कार्रवाई की। दोनों तरफ से करीब 20 मिनट तक गोलीबारी चली। इस मुठभेड़ में तीन शूटर मारे गए। SHO भी हुए घायल मुठभेड़ के दौरान अपराधियों की ओर से करीब 24 राउंड गोलियां चलाई गईं। इस फायरिंग में एक SHO घायल हो गए। घायल पुलिस अधिकारी को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। परिजनों ने किया हंगामा, पुलिस से भिड़े मुठभेड़ में तीन लोगों के मारे जाने की खबर मिलते ही उनके परिजन मौके पर पहुंच गए। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई का विरोध करते हुए हंगामा शुरू कर दिया। इस दौरान तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई की घटना भी हुई। घटना के बाद इलाके में पुलिस बल तैनात किया गया। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। मुठभेड़ किन परिस्थितियों में हुई और इसमें शामिल अपराधियों का आपराधिक रिकॉर्ड क्या था, इसकी जानकारी जांच के बाद सामने आएगी। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
Trump की पार्टी के समर्थन वाले पोस्ट हटाने लगे एलन मस्क

Trump की पार्टी के समर्थन वाले पोस्ट हटाने लगे एलन मस्क

मस्क ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की पार्टी के समर्थन में किए गए कुछ सोशल मीडिया पोस्ट हटाने शुरू कर दिए हैं। इससे अमेरिकी राजनीति और मस्क के राजनीतिक रुख को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। दरअसल, मस्क ने ट्रम्प और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के चुनाव प्रचार में काफी पैसा लगाया था। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने चुनाव अभियान के समर्थन में करीब 4400 करोड़ रुपये खर्च किए थे। इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए भी ट्रम्प के पक्ष में प्रचार किया और लोगों से उन्हें समर्थन देने की अपील की थी। चुनावी हार के बाद बदले हालात चुनावी नतीजों के बाद मस्क की राजनीतिक रणनीति और उनके पुराने बयानों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रम्प की पार्टी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद मस्क ने समर्थन से जुड़े कुछ पोस्ट हटा दिए। मस्क की संपत्ति में भी बड़ी गिरावट इस पूरे घटनाक्रम के बीच एलन मस्क की संपत्ति में भी भारी गिरावट की खबर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी नेटवर्थ में करीब 2 लाख करोड़ रुपये की कमी आई है। हालांकि, किसी कारोबारी की संपत्ति में बदलाव शेयर बाजार और उनकी कंपनियों के शेयरों की कीमतों पर भी निर्भर करता है। क्या मस्क बदल रहे हैं अपनी राजनीतिक रणनीति? मस्क का यह कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने ट्रम्प के चुनाव प्रचार में खुलकर अपनी ताकत और पैसा लगाया था। अब पुराने पोस्ट हटाए जाने की खबर से यह सवाल उठ रहा है कि क्या मस्क अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव कर रहे हैं या इसके पीछे कोई दूसरी वजह है। फिलहाल, इस मामले को लेकर मस्क की ओर से पोस्ट हटाने के कारणों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना जरूरी है। आने वाले समय में उनका अगला कदम काफी दिलचस्प हो सकता है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!

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