चुनाव आयोग (Election Commission) के अंदर कामकाज और अधिकारियों की जिम्मेदारियों को लेकर विवाद सामने आया है। RTI से मिले दस्तावेजों के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने वरिष्ठ अधिकारी मनीष गर्ग के काम करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। आरोप था कि अधिकारियों के बीच काम का बंटवारा बिना जरूरी चर्चा के बदल दिया गया।
इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि जब शिकायत दो चुनाव आयुक्तों की ओर से की गई, तो कैबिनेट सचिवालय ने सीधे कार्रवाई क्यों नहीं की? सामने आई फाइल नोटिंग के मुताबिक, सचिवालय ने शिकायतों पर विचार किया, लेकिन पूरे चुनाव आयोग की ओर से औपचारिक शिकायत नहीं होने का हवाला देते हुए सीधे हस्तक्षेप करने से परहेज किया।
RTI से कैसे सामने आया पूरा मामला?
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले दस्तावेजों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे।
दोनों आयुक्तों ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर आपत्ति जताई थी। शिकायतों में कहा गया कि 28 जुलाई को वरिष्ठ अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे में बदलाव का आदेश जारी किया गया, लेकिन इससे पहले जरूरी चर्चा नहीं हुई।
यह जानकारी पारदर्शिता कार्यकर्ता और पूर्व नौसेना अधिकारी कमोडोर लोकेश के. बत्रा की RTI अर्जी के जवाब में सामने आई। दस्तावेजों में शिकायतों के साथ कैबिनेट सचिवालय की आंतरिक फाइल नोटिंग भी शामिल है।
मनीष गर्ग पर क्या लगाए गए आरोप?
शिकायत के मुताबिक, प्रशासनिक विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालने के बाद मनीष गर्ग ने वरिष्ठ अधिकारियों के काम का बंटवारा बदलने का आदेश जारी किया था।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि इस तरह के बदलाव से पहले संबंधित अधिकारियों और आयोग के स्तर पर चर्चा होनी चाहिए थी।
विवेक जोशी ने अपनी शिकायत में यह भी कहा था कि प्रशासनिक विभाग से जुड़ी एक फाइल मांगने पर उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।
हालांकि, ये शिकायतों में लगाए गए आरोप हैं। इनके आधार पर किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। मामले को समझने के लिए संबंधित नियमों और सभी पक्षों के रुख को ध्यान में रखना जरूरी है।
Cabinet Secretariat ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
इस मामले में कैबिनेट सचिवालय की भूमिका भी चर्चा में है। RTI से सामने आई फाइल नोटिंग के अनुसार, अगस्त 2026 की शुरुआत में शिकायतों पर आंतरिक स्तर पर विचार किया गया था।
सचिवालय के सामने सवाल था कि क्या केंद्र सरकार का प्रशासनिक तंत्र चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज से जुड़े इस विवाद में सीधे हस्तक्षेप कर सकता है।
फाइल नोटिंग के मुताबिक, दोनों आयुक्तों के पत्र व्यक्तिगत क्षमता में भेजे गए थे। उन्हें पूरे चुनाव आयोग की ओर से औपचारिक शिकायत नहीं माना गया। इसी वजह से सचिवालय ने सीधे कार्रवाई करने के बजाय पत्र मिलने की पुष्टि की और मामले की जानकारी संबंधित कार्यालयों को भेजी।
5 अगस्त को कैबिनेट सचिव ने दोनों आयुक्तों के पत्र मिलने की पुष्टि की थी। मामले की जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भी दी गई।
चुनाव आयोग ने पहले क्या कहा था?
इस विवाद पर चुनाव आयोग ने 26 सितंबर 2026 को भी स्पष्टीकरण दिया था। आयोग के मुताबिक, संबंधित अधिकारी की ओर से काम के बंटवारे में बदलाव को लेकर जारी आदेश दोनों चुनाव आयुक्तों के निर्देश के बाद लागू नहीं किए गए थे।
इस स्पष्टीकरण के बाद मामले का एक पहलू साफ हुआ कि विवादित आदेशों को लागू करने की स्थिति क्या रही। हालांकि, इससे शिकायतों में उठाए गए सभी सवालों का समाधान हो गया, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
मतदाता सूची के कामकाज से क्या है संबंध?
काम के बंटवारे को लेकर उठे विवाद ने मतदाता सूची से जुड़े प्रशासनिक अधिकारों पर भी ध्यान खींचा है। मतदाता सूची में नाम जोड़ना, हटाना और रिकॉर्ड में सुधार करना चुनाव प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
ऐसे कामों में जिम्मेदारियां किस अधिकारी के पास होंगी और फैसले किस स्तर पर लिए जाएंगे, यह स्पष्ट होना जरूरी है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि इस विवाद के कारण मतदाता सूची में कोई गड़बड़ी हुई या मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए।
Election Commission की स्वतंत्रता पर फिर चर्चा
यह मामला केवल अधिकारियों के बीच मतभेद तक सीमित नहीं है। इससे यह सवाल भी उठता है कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के अंदर प्रशासनिक शिकायतों का निपटारा किस प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।
एक ओर अधिकारियों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में स्पष्ट नियम और शिकायतों के निपटारे की तय प्रक्रिया विवाद को बढ़ने से रोक सकती है।
अब आगे क्या होगा?
23 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, RTI से शिकायतों और कैबिनेट सचिवालय की फाइल नोटिंग का विवरण सामने आया है। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि शिकायतों में लगाए गए आरोप अंतिम रूप से सही पाए गए हैं।
अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि चुनाव आयोग इस मामले में क्या कदम उठाता है और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को लेकर कोई नया स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं।
फिलहाल, इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यही है कि दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों के बावजूद कैबिनेट सचिवालय ने सीधे कार्रवाई क्यों नहीं की। RTI से सामने आए दस्तावेजों ने इस सवाल पर नई चर्चा शुरू कर दी है।
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