ईरान की सियासत में इन दिनों सबकुछ सामान्य नहीं है। सत्ता के अलग-अलग केंद्रों के बीच खींचतान की खबरों ने एक बार फिर देश की राजनीति को चर्चा में ला दिया है। सबसे ज्यादा नजर विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) पर है। रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि उन्हें विदेश मंत्री के पद से हटाने की तैयारी चल रही है।
हालांकि, अभी तक अराघची को हटाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में इस खबर को फिलहाल दावे और मीडिया रिपोर्टों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने ईरान की सत्ता में चल रहे बड़े Power Struggle को जरूर सामने ला दिया है।
Araghchi को हटाने की आखिर क्यों हो रही चर्चा?
अब्बास अराघची ईरान की विदेश नीति के अहम चेहरों में शामिल हैं। अमेरिका के साथ बातचीत और दूसरे देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है।
रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार के भीतर कुछ लोगों को अराघची की कार्यशैली को लेकर आपत्ति है। दावा है कि अमेरिका के साथ बातचीत जैसे संवेदनशील मामलों में विदेश मंत्री और राष्ट्रपति कार्यालय के बीच मतभेद सामने आए हैं। इसी के बाद अराघची को पद से हटाने की चर्चा तेज हुई।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि अंतिम फैसला लिया जा चुका है या नहीं।
Pezeshkian की सरकार के सामने बढ़ी चुनौती
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की सरकार भी इस पूरे विवाद के केंद्र में है। पेजेश्कियान अपेक्षाकृत सुधारवादी रुख के लिए जाने जाते हैं और विदेश नीति में बातचीत तथा कूटनीति को अहमियत देते रहे हैं।
दूसरी ओर, ईरान की सुरक्षा और सैन्य व्यवस्था में Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) का प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण है। मौजूदा तनाव के बीच यह सवाल उठ रहा है कि देश के बड़े फैसलों में राष्ट्रपति सरकार की भूमिका कितनी है और सुरक्षा प्रतिष्ठान का प्रभाव कितना बढ़ चुका है।
यही सवाल अब ईरान की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
IRGC के बढ़ते प्रभाव की क्यों हो रही चर्चा?
ईरान में IRGC सिर्फ एक सामान्य सैन्य संगठन नहीं है। देश की सुरक्षा, क्षेत्रीय रणनीति और राजनीतिक व्यवस्था में इसका लंबे समय से प्रभाव रहा है।
हालिया घटनाक्रमों के बाद कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि IRGC का प्रभाव और मजबूत हुआ है। खासकर युद्ध और क्षेत्रीय तनाव के माहौल में सुरक्षा से जुड़े फैसलों में सैन्य नेतृत्व की भूमिका बढ़ने की बात कही जा रही है।
अगर यह स्थिति आगे भी बनी रहती है, तो इसका सीधा असर ईरान की Foreign Policy पर पड़ सकता है।
Supreme Leader की भूमिका सबसे अहम
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए Supreme Leader की भूमिका को समझना जरूरी है। राष्ट्रपति सरकार और प्रशासन का नेतृत्व करते हैं, लेकिन देश की सर्वोच्च राजनीतिक और सैन्य सत्ता Supreme Leader के पास रहती है।
इसी वजह से राष्ट्रपति और विदेश मंत्री की राजनीतिक स्थिति को केवल सरकार के फैसलों से नहीं देखा जा सकता। ईरान में Supreme Leader, राष्ट्रपति कार्यालय और IRGC जैसे अलग-अलग Power Centres के बीच संतुलन बेहद अहम है।
मौजूदा घटनाक्रम में इसी Power Balance को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
अमेरिका के साथ बातचीत बनी बड़ा मुद्दा
अराघची का नाम अमेरिका के साथ बातचीत से भी जुड़ा रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच किसी भी तरह की बातचीत देश की आंतरिक राजनीति में बेहद संवेदनशील मुद्दा बन जाती है।
एक तरफ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ ईरान के कट्टरपंथी और सुरक्षा से जुड़े धड़े अमेरिका के प्रति सख्त रुख रखने के पक्ष में रहे हैं।
ऐसे माहौल में विदेश मंत्री की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए अराघची को लेकर सामने आई खबरों को ईरान की व्यापक Foreign Policy के संदर्भ में देखा जा रहा है।
क्या राष्ट्रपति की Power सच में कम हो रही है?
यह सवाल फिलहाल पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। पेजेश्कियान अब भी राष्ट्रपति हैं और उनकी सरकार औपचारिक रूप से देश के प्रशासन को संभाल रही है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषणों में यह चर्चा जरूर बढ़ी है कि संकट के समय सुरक्षा और सैन्य संस्थानों का प्रभाव बढ़ सकता है।
राष्ट्रपति की ताकत कमजोर होने और IRGC के ज्यादा प्रभावशाली होने के दावे भी इसी संदर्भ में सामने आए हैं। हालांकि, इन दावों के हर पहलू की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए इसे फिलहाल ईरान की सत्ता में चल रहे Power Struggle के संकेत के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
Araghchi की कुर्सी का फैसला क्यों होगा अहम?
अगर अराघची को वास्तव में विदेश मंत्री पद से हटा दिया जाता है, तो इसका असर सिर्फ ईरान के विदेश मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगा।
इससे यह संकेत मिल सकता है कि तेहरान आने वाले दिनों में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ बातचीत को लेकर अपनी रणनीति बदल रहा है। साथ ही यह भी साफ हो सकता है कि विदेश नीति में राष्ट्रपति सरकार की आवाज ज्यादा मजबूत है या सुरक्षा प्रतिष्ठान का प्रभाव बढ़ रहा है।
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन अराघची को लेकर उठी चर्चा ने ईरान की राजनीति में चल रही अंदरूनी खींचतान को जरूर उजागर कर दिया है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि अराघची अपनी कुर्सी बचा पाते हैं या ईरान की सत्ता में चल रहा यह Power Shift विदेश मंत्रालय में भी बड़ा बदलाव लेकर आता है।
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