देश की राजनीति में एक बार फिर Delimitation (परिसीमन) का मुद्दा चर्चा में है। केंद्र सरकार परिसीमन Bill को आगे बढ़ाने के लिए संसद का Special Session बुलाने के विकल्प पर विचार कर सकती है। अगर सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है, तो संसद के साथ-साथ राज्यों की राजनीति पर भी इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है।
परिसीमन का मामला सिर्फ लोकसभा सीटों की संख्या बदलने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय होती हैं और राज्यों को मिलने वाले राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी इसका असर पड़ सकता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष के साथ विपक्षी दलों और राज्यों की भी नजर बनी हुई है।
Special Session क्यों बुलाने की चर्चा?
परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव को संसद में लाने के लिए सरकार विशेष सत्र का रास्ता अपना सकती है। हालांकि, अभी तक विशेष सत्र की तारीख या बिल के अंतिम प्रारूप को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
सरकार अगर विशेष सत्र बुलाती है, तो इस दौरान परिसीमन से जुड़े संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर चर्चा हो सकती है। साथ ही राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की कोशिश भी की जा सकती है।
आखिर Delimitation क्या होता है?
सरल भाषा में समझें तो Delimitation यानी परिसीमन का मतलब लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का पुनर्निर्धारण है। इसका उद्देश्य जनसंख्या में हुए बदलाव के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना होता है।
देश में आखिरी बड़े परिसीमन की प्रक्रिया 1970 के दशक में हुई थी। इसके बाद लोकसभा सीटों के राज्यों के बीच आवंटन को लेकर एक निश्चित व्यवस्था लागू रही। अब 2026 के बाद होने वाली प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है।
किन राज्यों पर पड़ सकता है असर?
परिसीमन की चर्चा में सबसे बड़ा सवाल राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का है। जिन राज्यों में पिछले दशकों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, वहां लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जाती रही है।
दूसरी ओर, दक्षिण भारत के कई राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। इन राज्यों में यह चिंता रही है कि अगर सिर्फ मौजूदा जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया, तो उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन एक अहम राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
विपक्ष के सामने भी बड़ा मुद्दा
अगर Delimitation Bill संसद में पेश होता है, तो विपक्ष इस पर सरकार से कई सवाल पूछ सकता है। राज्यों के प्रतिनिधित्व, जनसंख्या नियंत्रण और संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दे बहस के केंद्र में रह सकते हैं।
विपक्षी दलों की कोशिश होगी कि परिसीमन की प्रक्रिया में राज्यों के हितों को नजरअंदाज न किया जाए। वहीं सरकार की ओर से जनसंख्या के बदलते आंकड़ों और समान प्रतिनिधित्व की जरूरत को आधार बनाया जा सकता है।
क्या बदल सकती है लोकसभा की तस्वीर?
परिसीमन होने की स्थिति में लोकसभा के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव के साथ सीटों की संख्या में भी बदलाव संभव है। इसका सीधा असर आने वाले लोकसभा चुनावों के राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी। इसके लिए परिसीमन आयोग की प्रक्रिया, जनगणना के आंकड़े और सरकार की ओर से तय किए जाने वाले कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण होंगे।
सरकार के अगले कदम पर नजर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार परिसीमन को लेकर कब और किस रूप में कदम उठाती है। अगर संसद का Special Session बुलाया जाता है और Bill पेश होता है, तो यह मौजूदा राजनीतिक माहौल में एक बड़ा घटनाक्रम होगा।
परिसीमन का असर लंबे समय तक देश की चुनावी राजनीति पर रह सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में सरकार की घोषणा के साथ-साथ विपक्ष और राज्यों की प्रतिक्रिया भी काफी महत्वपूर्ण होगी।
