डेस्क | देशहरपल
अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट में एक नया बिल पेश किया गया है, जिसमें भारत, चीन, हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान से आने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस बिल का उद्देश्य रूस की तेल आय को कम करना और यूक्रेन युद्ध के लिए उसकी आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया गया है।
बिल के तहत केवल टैरिफ ही नहीं, बल्कि रूस के ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा क्षेत्र पर भी नए प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ का सुझाव था, जिसे बाद में घटाकर 100% कर दिया गया।
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर बढ़ेगा दबाव
यदि यह बिल कानून बन जाता है, तो अमेरिका पहली बार किसी देश पर सिर्फ इसलिए अतिरिक्त टैरिफ लगाएगा क्योंकि वह रूस से तेल खरीद रहा है। अमेरिकी सांसदों का मानना है कि इससे रूस की कमाई घटेगी और उस पर युद्ध रोकने का दबाव बढ़ेगा।
यूरोपीय देशों को मिलेगी राहत
बिल में 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से छूट देने का प्रावधान है। अमेरिका का कहना है कि ये देश रूस से 15% से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और लगातार अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं।
डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं, बल्कि उन देशों के लिए है जो अभी भी रूस के ऊर्जा कारोबार को आर्थिक सहारा दे रहे हैं।
दोनों दलों का समर्थन
इस प्रस्ताव को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों का समर्थन मिला है। अमेरिकी राजनीति में ऐसे विधेयक को बाइपार्टिसन बिल कहा जाता है। हालांकि, इसे कानून बनने के लिए अभी सीनेट और प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) से मंजूरी और फिर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर जरूरी होंगे।
ग्राहम की पहल, ट्रम्प का समर्थन
यह बिल सबसे पहले रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने अप्रैल 2025 में पेश किया था। 11 जुलाई को ग्राहम के निधन से पहले उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस बिल को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं।
व्हाइट हाउस में ट्रम्प ने भी कहा कि यह ग्राहम के सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है और इसके कानून बनने की अच्छी संभावना है।
अमेरिका रूस पर इतना सख्त क्यों?
- यूक्रेन युद्ध के लिए रूस की आर्थिक फंडिंग कम करना।
- रूस की तेल और गैस से होने वाली आय पर असर डालना।
- भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों पर रूसी तेल आयात कम करने का दबाव बनाना।
- रूस को शांति वार्ता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर करना।
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