इंदौर। इंदौर नगर निगम के एक अधिकारी को कानून के पुराने प्रावधानों के आधार पर आदेश जारी करना भारी पड़ गया। बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर के खिलाफ जारी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। मामला अदालत पहुंचने के बाद नगर निगम को अपना आदेश वापस लेना पड़ा। इस पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने संबंधित अधिकारी पर 1 लाख रुपए की कॉस्ट लगाई और निर्देश दिया कि इसकी वसूली अधिकारी से की जाए, नगर निगम के खजाने से नहीं।
जस्टिस संदीप नटवरलाल भट्ट ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा कि अधिकारियों को अपने अधिकारों का इस्तेमाल प्रचलित कानून के अनुसार करना चाहिए। अदालत के मुताबिक, निरस्त हो चुकी धाराओं के आधार पर आदेश जारी करना गंभीर कानूनी चूक है। इसके कारण याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा और न्यायालय का समय भी खर्च हुआ।
आदेश और लेजर रिपोर्ट वापस लेने पर सहमत हुआ नगर निगम
बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड ने नगर निगम के 30 सितंबर 2026 के आदेश और उसके आधार पर 7 अक्टूबर को जारी लेजर रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से सीनियर एडवोकेट मनोज मुंशी ने संबंधित अधिकारी के निर्देश पर अदालत को बताया कि विवादित आदेश प्रथम दृष्टया कानून के विरुद्ध है और निगम इसे वापस ले रहा है।
अदालत ने आदेश और लेजर रिपोर्ट वापस लेने संबंधी नगर निगम के कथन को रिकॉर्ड पर लिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आदेश वापस लेने से अधिकारी की गंभीर कानूनी चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
2020 में ही विलोपित हो चुकी थीं तीन धाराएं
हाईकोर्ट ने पाया कि विवादित आदेश नगर निगम अधिनियम की धारा 143, 146 और 153 के आधार पर जारी किया गया था, जबकि ये धाराएं वर्ष 2020 में ही विलोपित की जा चुकी थीं।
अदालत ने कहा कि नगर निगम जैसी वैधानिक संस्था के अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के मौजूदा प्रावधानों की जानकारी रखें और उसी के अनुसार निर्णय लें।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी ने कानूनी प्रावधानों की समुचित जांच किए बिना यांत्रिक तरीके से आदेश पारित किया। इसके चलते अस्पताल को न्याय के लिए हाईकोर्ट आना पड़ा। अदालत ने इस स्थिति को निराशाजनक बताते हुए भविष्य में ऐसी गलती नहीं दोहराए जाने की अपेक्षा जताई।
75 हजार रुपए विधिक सेवा प्राधिकरण, 25 हजार अस्पताल को मिलेंगे
हाईकोर्ट ने कुल 1 लाख रुपए की कॉस्ट लगाते हुए राशि जमा करने के निर्देश भी दिए हैं।
- 75,000 रुपए: मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, इंदौर में जमा करने होंगे।
- 25,000 रुपए: याचिकाकर्ता बाफना हॉस्पिटल को वाद-व्यय के रूप में दिए जाएंगे।
- समय-सीमा: आदेश की तारीख से सात दिनों के भीतर राशि जमा करनी होगी।
- वसूली: पूरी राशि संबंधित अधिकारी से वसूली जाएगी, ताकि सरकारी खजाने पर इसका भार न पड़े।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों की गलत कार्रवाई के कारण होने वाली मुकदमेबाजी का आर्थिक बोझ अनावश्यक रूप से सार्वजनिक धन पर नहीं डाला जाना चाहिए। कॉस्ट लगाने का उद्देश्य ऐसी गलतियों को रोकना और अधिकारियों को उनके कानूनी दायित्वों के प्रति जवाबदेह बनाना है।
अस्पताल और नगर निगम की ओर से इन वकीलों ने की पैरवी
याचिकाकर्ता बाफना हॉस्पिटल की ओर से एडवोकेट विभोर खंडेलवाल और जयेश गुरनानी ने पैरवी की। वहीं, नगर निगम की ओर से सीनियर एडवोकेट मनोज मुंशी और एडवोकेट शशांक श्रीवास्तव अदालत में उपस्थित हुए।











































