भोपाल में आयुष्मान भारत योजना से जुड़े निजी अस्पतालों के डॉक्टर और संचालक बुधवार को अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे। प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के बैनर तले डॉक्टरों ने जेपी अस्पताल परिसर स्थित आयुष्मान योजना के कार्यालय पहुंचकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने आयुष्मान योजना के तहत अस्पतालों का लंबित भुगतान जल्द जारी करने के साथ NABH की अनिवार्यता को लेकर भी आपत्ति जताई।
5-6 महीने से भुगतान नहीं मिलने का दावा
यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन (UPHDA) के उपाध्यक्ष डॉ. धनंजय मिश्रा ने बताया कि निजी अस्पतालों का आयुष्मान योजना के तहत बड़ी राशि बकाया है। उनका दावा है कि भोपाल के निजी अस्पतालों को औसतन करीब 1.5 से 2 करोड़ रुपये तक का भुगतान लंबित है।
अस्पताल संचालकों के मुताबिक, कई अस्पतालों को पिछले 5-6 महीने से भुगतान नहीं मिला है। इसके चलते दवा वेंडर्स, कर्मचारियों और अन्य खर्चों का भुगतान करने में परेशानी हो रही है। हालिया बैठकों में निजी अस्पताल संगठनों ने भुगतान सात महीने से अधिक समय से लंबित होने का दावा भी किया है।
डॉक्टरों ने मांग की है कि आयुष्मान योजना के पात्र लंबित दावों का भुगतान तत्काल किया जाए। उनका कहना है कि यदि भुगतान नहीं हुआ तो प्रदेश स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।
NABH की अनिवार्यता को लेकर विवाद
भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के निजी अस्पतालों के लिए आयुष्मान योजना में NABH प्रमाणन की शर्त को लेकर भी अस्पताल संगठनों और स्वास्थ्य विभाग के बीच विवाद बना हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक, 1 अक्टूबर से इन चार शहरों में आयुष्मान से जुड़े निजी अस्पतालों के लिए NABH संबंधी शर्त लागू होने की बात कही गई है।
अस्पताल संगठनों का कहना है कि वे गुणवत्ता मानकों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन NABH को अनिवार्य करने के बजाय इसे स्वैच्छिक और प्रोत्साहन आधारित रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अस्पताल के आकार, बेड संख्या और उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से व्यावहारिक गुणवत्ता मानक तय किए जाने चाहिए।
छोटे और मध्यम अस्पतालों को लेकर चिंता
अस्पताल संचालकों का कहना है कि NABH प्रमाणन की शर्त पूरी करना छोटे और मध्यम अस्पतालों के लिए मुश्किल हो सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, चार बड़े शहरों में करीब 250 निजी अस्पतालों के आयुष्मान योजना से बाहर होने की आशंका जताई गई है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी NABH की अनिवार्यता से जुड़े मामले में यह मुद्दा उठ चुका है। अदालत के समक्ष दायर याचिका में दावा किया गया था कि अंतिम स्तर के NABH प्रमाणन की अनिवार्यता से छोटे और मध्यम अस्पतालों के डी-एम्पैनलमेंट का खतरा पैदा हो सकता है।
अस्पताल संगठनों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में निजी अस्पताल आयुष्मान नेटवर्क से बाहर होते हैं, तो आसपास के इलाकों में इलाज कराने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के लिए विकल्प कम हो सकते हैं। उनका सवाल है कि ऐसी स्थिति में सरकारी और बाकी सूचीबद्ध अस्पताल अतिरिक्त मरीजों का भार संभालने के लिए कितने तैयार हैं।
सरकार से हस्तक्षेप की मांग
निजी अस्पताल संगठनों ने राज्य सरकार से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि किसी भी बड़े पैमाने पर डी-एम्पैनलमेंट से पहले अस्पताल संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर व्यावहारिक समाधान निकाला जाना चाहिए।
अस्पताल संचालकों का कहना है कि उनका विरोध NABH के जरिए गुणवत्ता सुधार से नहीं, बल्कि उसकी अनिवार्यता से है। उनका दावा है कि यदि 1 अक्टूबर से बड़े पैमाने पर डी-एम्पैनलमेंट की कार्रवाई होती है, तो प्रदेशभर के अस्पताल संगठन सामूहिक रूप से आंदोलन करेंगे।

