पश्चिम बंगाल (West Bengal) में विधानसभा चुनाव से पहले जारी हुई ड्राफ्ट मतदाता सूची (SIR – Special Intensive Revision) ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। करीब 58 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने के बाद यह मुद्दा अब सिर्फ चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि TMC और BJP के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई का रूप ले चुका है।
हिंदी-भाषी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असर
ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि हिंदी-भाषी आबादी वाले विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम सबसे ज्यादा कटे हैं। कई शहरी और औद्योगिक सीटों पर यह कटौती 15 से 30 प्रतिशत तक बताई जा रही है। इन्हीं इलाकों में बड़ी संख्या में मजदूर, प्रवासी और मध्यम वर्ग के मतदाता रहते हैं।
बीजेपी का आरोप है कि इस प्रक्रिया से उन इलाकों के मतदाता ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जहाँ पार्टी की पकड़ मानी जाती है। पार्टी इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था से छेड़छाड़ करार दे रही है।
मुस्लिम-बहुल सीटों पर कम कटौती, सवाल खड़े
वहीं दूसरी ओर, मुस्लिम-बहुल विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता नामों की कटौती अपेक्षाकृत कम देखने को मिली है। इसी आधार पर विपक्ष सवाल उठा रहा है कि एक ही राज्य में अलग-अलग क्षेत्रों में संशोधन का असर इतना अलग क्यों है।
यह मुद्दा अब सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक भरोसे और निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर भी विवाद में
इस पूरे विवाद में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की विधानसभा सीट भवानीपुर का नाम सामने आना TMC के लिए भी झटका माना जा रहा है। यहां करीब 45 हजार मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए, जो कुल मतदाताओं का लगभग 22 प्रतिशत है।
हालात को देखते हुए TMC ने अपने कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर वोटर वेरिफिकेशन करने के निर्देश दिए हैं, ताकि वास्तविक मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में वापस जुड़ सकें।
TMC का पक्ष: नियमों के तहत हुई कार्रवाई
तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार की गई प्रशासनिक कवायद है। पार्टी के मुताबिक हटाए गए नामों में शामिल हैं:
- मृत मतदाता
- स्थायी रूप से स्थानांतरित लोग
- डुप्लिकेट एंट्री
- अधूरे या समय पर जमा न किए गए दस्तावेज
TMC का आरोप है कि बीजेपी इस तकनीकी प्रक्रिया को राजनीतिक और सामुदायिक रंग देने की कोशिश कर रही है।
BJP का पलटवार: लोकतंत्र से खिलवाड़
बीजेपी ने चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग करते हुए कहा है कि अगर मतदाता सूची में सुधार निष्पक्ष नहीं हुआ, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित होगा। पार्टी ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को चुनावी मंच तक ले जा सकती है।
अभी अंतिम नहीं है वोटर लिस्ट
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जारी की गई सूची केवल ड्राफ्ट है। मतदाताओं को 45 दिनों तक दावा और आपत्ति दर्ज कराने का मौका दिया गया है। सभी आपत्तियों के निपटारे के बाद अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी 2026 को प्रकाशित की जाएगी।
पश्चिम बंगाल में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट अब एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। हिंदी-भाषी इलाकों में ज्यादा नाम कटने, मुस्लिम-बहुल सीटों पर कम असर और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ने इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है। आने वाले हफ्तों में यह विवाद और तेज होने की संभावना है, क्योंकि अंतिम सूची से ही यह तय होगा कि किसे राहत मिली और किसकी चिंता बढ़ी।
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