अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर मिडिल ईस्ट की राजनीति में सक्रिय नजर आ रहे हैं। उन्होंने अब्राहम अकॉर्ड (Abraham Accords) को आगे बढ़ाने की कोशिश तेज कर दी है। इस कदम के तहत कुछ मुस्लिम देशों को इज़राइल के साथ रिश्ते सामान्य करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
लेकिन इस पूरी रणनीति के बीच सबसे बड़ा सवाल पाकिस्तान के सामने खड़ा हो गया है—क्या वह फिलीस्तीन के समर्थन वाले अपने पुराने रुख को बदल पाएगा?
क्या है अब्राहम अकॉर्ड?
अब्राहम अकॉर्ड 2020 में शुरू हुआ एक कूटनीतिक समझौता है, जिसके तहत कुछ अरब देशों ने इज़राइल के साथ आधिकारिक संबंध स्थापित किए थे। इसमें यूएई, बहरीन और मोरक्को जैसे देश शामिल हैं।
अब ट्रंप चाहते हैं कि इस समझौते को और आगे बढ़ाया जाए और ज्यादा मुस्लिम देशों को इसमें जोड़ा जाए।
पाकिस्तान पर क्यों बढ़ा दबाव?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप की योजना में पाकिस्तान जैसे देशों को भी इज़राइल के साथ रिश्ते सामान्य करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
लेकिन पाकिस्तान के लिए यह फैसला आसान नहीं है।
🇵🇰 पाकिस्तान का पुराना स्टैंड
- पाकिस्तान हमेशा से फिलीस्तीन के समर्थन में रहा है
- उसका साफ कहना है कि जब तक स्वतंत्र फिलीस्तीन देश नहीं बनता, तब तक इज़राइल को मान्यता नहीं दी जाएगी
सबसे बड़ी चुनौती: फिलीस्तीन का मुद्दा
पाकिस्तान में इज़राइल को लेकर सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक विरोध भी है।
- जनता का बड़ा हिस्सा फिलीस्तीन के समर्थन में है
- धार्मिक और राजनीतिक संगठनों का दबाव भी काफी मजबूत है
- ऐसे में सरकार के लिए कोई भी बदलाव करना आसान नहीं होगा
पाकिस्तान के सामने दुविधा
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान एक कठिन स्थिति में फंसा है:
- अगर वह अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होता है, तो देश के अंदर भारी विरोध हो सकता है
- अगर शामिल नहीं होता, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव और अलग-थलग पड़ने का खतरा बढ़ सकता है
फिलीस्तीन के हक का सवाल
पाकिस्तान का रुख अभी भी स्पष्ट है—
वह मानता है कि पहले फिलीस्तीन को एक स्वतंत्र देश का दर्जा मिलना चाहिए, उसके बाद ही किसी भी तरह के इज़राइल से संबंधों पर विचार किया जा सकता है।
