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Iran पर America का बड़ा हमला: 11वीं रात 5 शहरों पर बरसाए बम

Iran पर America का बड़ा हमला: 11वीं रात 5 शहरों पर बरसाए बम

America ने लगातार 11वीं रात Iran के 5 प्रमुख शहरों पर हवाई हमले किए। इन हमलों में कई सैन्य ठिकानों और रणनीतिक स्थानों को निशाना बनाया गया। दोनों देशों के बीच बढ़ता संघर्ष अब पूरे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बन गया है। लगातार हो रहे हमलों के कारण आम लोगों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। कई इलाकों में लोग रातभर दहशत के साए में रहने को मजबूर हैं। सुरक्षा के डर से परिवार अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर जा रहे हैं। स्थानीय प्रशासन ने लोगों से सतर्क रहने और आवश्यक सुरक्षा निर्देशों का पालन करने की अपील की है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका इस युद्ध में अब तक करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाला यह सैन्य अभियान अमेरिका के लिए आर्थिक और राजनीतिक दोनों स्तर पर बड़ी चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह संघर्ष जल्द नहीं रुका तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतों, वैश्विक व्यापार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। दुनिया के कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। वहीं आम लोग भी जल्द से जल्द शांति बहाल होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं, ताकि क्षेत्र में सामान्य जीवन फिर से पटरी पर लौट सके। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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America

America Iran Conflict: 5 शहर बने निशाना, Pentagon ने बताया युद्ध का भारी खर्च

मध्य पूर्व में America और Iran के बीच जारी तनाव अब और गंभीर होता जा रहा है।America ने लगातार 11वीं रात ईरान के पांच शहरों में बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए हैं। इन हमलों में ड्रोन ठिकानों, सैन्य अड्डों और विमान हैंगर को निशाना बनाया गया। दूसरी ओर, अमेरिकी रक्षा विभाग ने बताया है कि इस सैन्य अभियान पर अब तक 37.5 अरब डॉलर (करीब ₹3.6 लाख करोड़) से अधिक खर्च हो चुका है। लगातार बढ़ते हमलों ने एक बार फिर पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ईरान के पांच शहरों में America की Airstrike America सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ताजा कार्रवाई में Iran के कई रणनीतिक सैन्य ठिकानों पर सटीक एयरस्ट्राइक की गई। इन हमलों का उद्देश्य ईरान की ड्रोन क्षमता और सैन्य नेटवर्क को कमजोर करना बताया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, जिन इलाकों को निशाना बनाया गया वहां ड्रोन स्टोरेज, एयरक्राफ्ट हैंगर और सैन्य उपकरण मौजूद थे। हालांकि ईरान ने अभी तक हमलों से हुए नुकसान का आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है। लगातार 11वीं रात जारी रहा हमला अमेरिका का यह अभियान लगातार 11वीं रात तक जारी रहा। पिछले कई दिनों से दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई तेज होती जा रही है। जहां एक ओर अमेरिका अपने अभियान को आतंकवाद और सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है, वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात इसी तरह बने रहे तो आने वाले दिनों में संघर्ष और व्यापक रूप ले सकता है। युद्ध पर अब तक ₹3.6 लाख करोड़ से ज्यादा खर्च अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) के अनुसार, ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान पर अब तक 37.5 अरब डॉलर, यानी भारतीय मुद्रा में करीब ₹3.6 लाख करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद अमेरिकी संसद में भी इस अभियान को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रक्षा विभाग ने आगे की सैन्य जरूरतों को देखते हुए अतिरिक्त बजट की मांग भी की है। ट्रंप ने दिए सख्त संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ किया है कि यदि ईरान अपनी सैन्य गतिविधियों में कमी नहीं लाता, तो अमेरिका आगे भी इसी तरह की कार्रवाई जारी रखेगा। वहीं ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई के संकेत दिए हैं, जिससे पूरे मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ गया है। दोनों देशों के बीच फिलहाल किसी बड़े कूटनीतिक समाधान के संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। दुनिया पर भी दिखने लगा असर अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर अब सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और शेयर बाजार पर भी इस युद्ध का असर पड़ने लगा है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। आगे क्या? लगातार हो रहे हवाई हमले, बढ़ता सैन्य खर्च और दोनों देशों के सख्त रुख को देखते हुए यह साफ है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अभी खत्म होता नजर नहीं आ रहा। यदि जल्द कोई कूटनीतिक पहल नहीं होती, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान अगला कदम क्या उठाते हैं। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Pentagon

America vs Iran: Pentagon ने पहली बार मानी 100 सैनिकों के घायल होने की बात

America-Iran War लगातार गंभीर होता जा रहा है। अब अमेरिका ने पहली बार आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि हाल के ईरानी हमलों में उसके 100 अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग Pentagon ने कहा कि सुरक्षा कारणों और सैन्य अभियानों की संवेदनशीलता को देखते हुए इस जानकारी को तुरंत सार्वजनिक नहीं किया गया था। वहीं, इस खुलासे के बाद अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई तेज करते हुए ईरान के 9 शहरों में एयरस्ट्राइक की है। इन घटनाओं ने पूरे मध्य पूर्व में तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। Pentagon ने देर से क्यों दी जानकारी? पेंटागन के मुताबिक, घायल सैनिकों की संख्या पहले इसलिए साझा नहीं की गई क्योंकि इससे चल रहे सैन्य अभियानों और क्षेत्र में तैनात जवानों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता था। अधिकारियों का कहना है कि अधिकतर सैनिकों को विस्फोटों के कारण सिर और शरीर पर हल्की चोटें आई थीं। कई जवान इलाज के बाद दोबारा अपनी ड्यूटी पर लौट चुके हैं, जबकि कुछ अभी भी मेडिकल निगरानी में हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि जानकारी छिपाने का उद्देश्य नहीं था, बल्कि सैन्य सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी था। America ने Iran के 9 शहरों पर किया बड़ा हमला घायल सैनिकों की पुष्टि के बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई को और तेज कर दिया। अमेरिकी सेना ने ईरान के 9 शहरों में मौजूद कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में मिसाइल लॉन्च साइट्स, ड्रोन बेस, हथियार भंडार, कमांड सेंटर और एयर डिफेंस सिस्टम को लक्ष्य बनाया गया। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों का दावा है कि इन एयरस्ट्राइक का मकसद भविष्य में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर होने वाले हमलों को रोकना और ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना है। लगातार बढ़ रहा है Middle East का तनाव पिछले कुछ दिनों से अमेरिका और ईरान के बीच लगातार जवाबी हमले हो रहे हैं। ईरान समर्थित समूहों द्वारा अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद अमेरिका ने कई चरणों में हवाई कार्रवाई की है। ताजा एयरस्ट्राइक को इसी अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव इसी तरह जारी रहा तो इसका असर पूरे Middle East की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। दुनिया की नजर America-Iran Conflict पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष को लेकर दुनिया भर के देशों की चिंता भी बढ़ गई है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित हो सकती है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। आगे क्या हो सकता है? फिलहाल अमेरिका ने साफ संकेत दिए हैं कि यदि उसके सैनिकों या सैन्य ठिकानों पर दोबारा हमला होता है तो जवाब पहले से अधिक सख्त होगा। वहीं, ईरान ने भी अमेरिकी एयरस्ट्राइक की आलोचना करते हुए उचित जवाब देने की चेतावनी दी है। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर है कि आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ता है या फिर कूटनीतिक प्रयास दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में सफल होते हैं। फिलहाल Middle East में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और हर नई सैन्य कार्रवाई वैश्विक राजनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी असर डाल सकती है. हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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US Airstrike

US Airstrike on Iran: Tabriz Missile Field में विस्फोट, लगातार 9वीं रात हमला; Iraq में अमेरिकी जवान की मौत

मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है। US ने लगातार नौवीं रात भी ईरान के कई अहम सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले (Airstrike) किए। इन हमलों के बाद उत्तर-पश्चिमी शहर तबरीज (Tabriz) के मिसाइल क्षेत्र में आग लगने की खबर सामने आई है। इसी बीच इराक में एक अमेरिकी सैनिक की मौत ने हालात को और गंभीर बना दिया है। दोनों घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और दुनिया की नजर इस संघर्ष पर टिकी हुई है। Tabriz Missile Field में धमाके के बाद लगी आग ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तबरीज स्थित मिसाइल फील्ड के आसपास देर रात तेज धमाकों की आवाजें सुनी गईं। कुछ ही देर में इलाके से धुएं का बड़ा गुबार उठता दिखाई दिया। स्थानीय प्रशासन ने आग लगने की पुष्टि की है, हालांकि नुकसान कितना हुआ है, इसे लेकर अभी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। रिपोर्टों के अनुसार, तबरीज के अलावा दक्षिणी ईरान के कुछ अन्य सैन्य और रणनीतिक इलाकों में भी हमलों की सूचना मिली है। कई स्थानों पर एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय कर दिया गया और सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट पर हैं। अमेरिका ने क्यों बढ़ाए हमले? अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि हाल के ऑपरेशन का मकसद ईरान की मिसाइल क्षमता, ड्रोन नेटवर्क और सैन्य ढांचे को कमजोर करना है। अमेरिका का दावा है कि इन हमलों का उद्देश्य अपने सैनिकों और सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि ईरान ने इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की है और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। Iraq में अमेरिकी सैनिक की मौत से बढ़ा तनाव इस बीच उत्तरी इराक से आई एक घटना ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। अमेरिकी सेना के मुताबिक, एक सैनिक की मौत उस समय हुई जब वह एक गिराए गए ड्रोन के विस्फोटक अवशेष को निष्क्रिय करने के मिशन में शामिल था। इस हादसे में एक अन्य सैनिक घायल भी हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इस घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा खतरा और बढ़ गया है। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की नई श्रृंखला शुरू कर दी। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ी सुरक्षा, दुनिया की नजर Middle East पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव का असर अब पूरे खाड़ी क्षेत्र में दिखाई देने लगा है। कई देशों ने अपने सैन्य ठिकानों की सुरक्षा बढ़ा दी है। वहीं, दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग होरमुज जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। कूटनीतिक समाधान की राह अब भी मुश्किल संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए फिलहाल तनाव कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। लगातार हो रहे हमले और जवाबी कार्रवाई यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में मध्य पूर्व की स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है। दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश तनाव कम करने की दिशा में कोई कदम उठाएंगे या फिर यह संघर्ष और व्यापक रूप लेगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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America का Iran पर लगातार 9वीं रात हमला, तबरीज मिसाइल फील्ड में लगी आग

America ने लगातार नौवीं रात Iran पर हमला किया, जिसके बाद ईरान के तबरीज मिसाइल फील्ड में भीषण आग लगने की खबर सामने आई है। स्थानीय मीडिया के अनुसार, हमले के बाद इलाके में कई धमाके सुनाई दिए और दूर तक धुएं का गुबार देखा गया। ईरान ने इस हमले को अपनी सुरक्षा और संप्रभुता पर सीधा हमला बताया है। वहीं, अमेरिका की ओर से कहा गया है कि कार्रवाई का उद्देश्य क्षेत्र में मौजूद सैन्य खतरों को कम करना था। इस बीच, इराक में तैनात एक अमेरिकी सैनिक की मौत की भी पुष्टि हुई है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, सैनिक की मौत एक सुरक्षा अभियान के दौरान हुई। घटना की जांच जारी है और अमेरिकी रक्षा विभाग ने मामले पर विस्तृत जानकारी देने की बात कही है। बढ़ रही आम लोगों की चिंता लगातार हो रहे हमलों के कारण पूरे क्षेत्र में डर और अनिश्चितता का माहौल है। तबरीज और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों ने रातभर धमाकों की आवाजें सुनने और घरों से बाहर निकलने में भय महसूस होने की बात कही। कई परिवार सुरक्षित स्थानों की तलाश में हैं। दुनिया की नजर पश्चिम एशिया पर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ, तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहा है। फिलहाल, क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं और दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते इस टकराव पर बनी हुई है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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America का चाबहार पोर्ट पर बड़ा हमला, कंट्रोल टावर बनाया निशाना

America का चाबहार पोर्ट पर बड़ा हमला, कंट्रोल टावर बनाया निशाना

America ने Iran के रणनीतिक महत्व वाले चाबहार पोर्ट पर बड़ा हमला किया है। इस हमले में पोर्ट के कंट्रोल टावर को निशाना बनाया गया। वहीं, अमेरिका ने लगातार छठी रात भी ईरान के कई ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की है, जिससे पूरे क्षेत्र में हालात और गंभीर हो गए हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हमले के बाद चाबहार पोर्ट के आसपास धुआं उठता दिखाई दिया। शुरुआती जानकारी के अनुसार, कंट्रोल टावर को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, इस हमले में कितनी जनहानि हुई है, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार पोर्ट? चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत ने इस बंदरगाह के विकास में बड़ा निवेश किया है। इसी रास्ते भारत, अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक व्यापार बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में इस पोर्ट पर हुआ हमला भारत की व्यापारिक और रणनीतिक योजनाओं के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है। लगातार छठी रात एयरस्ट्राइक अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर लगातार छठी रात हवाई हमले किए। बताया जा रहा है कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है। दूसरी ओर, ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष को लेकर दुनिया के कई देश चिंता जता रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Chabahar Port

US Airstrike on Iran: Chabahar Port को नुकसान, भारत के Trade Route पर बढ़ी दुनिया की नजर

अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब और गहरा गया है। ताजा घटनाक्रम में ईरानी बंदरगाह चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) को लेकर चर्चा तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी एयरस्ट्राइक में चाबहार पोर्ट के एक महत्वपूर्ण हिस्से को नुकसान पहुंचा है। यह वही पोर्ट है, जिसमें भारत की बड़ी रणनीतिक भागीदारी है और जो भारत के लिए व्यापार और कनेक्टिविटी का अहम रास्ता माना जाता है। चाबहार पोर्ट पर हमले की खबर सामने आने के बाद भारत की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि यह परियोजना भारत की Central Asia Connectivity Strategy का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, अभी तक भारत सरकार की ओर से इस मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। US Airstrike में Chabahar Port का Control Tower हुआ प्रभावित मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों के दौरान चाबहार पोर्ट क्षेत्र को भी निशाना बनाया गया। हमले में पोर्ट के Maritime Control Tower को नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है। चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित है और अरब सागर से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बंदरगाह है। इसकी रणनीतिक स्थिति इसे क्षेत्रीय व्यापार और समुद्री गतिविधियों के लिए बेहद अहम बनाती है। Iran पर लगातार छठी रात जारी रहे अमेरिकी हमले अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी सेना ने ईरान के कई ठिकानों पर लगातार हवाई हमले किए हैं। इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं और रणनीतिक ठिकानों को कमजोर करना बताया जा रहा है। वहीं, ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी और उसके सहयोगी देशों के ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है। दोनों देशों के बीच बढ़ते संघर्ष ने पूरे Middle East Region में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारत के लिए क्यों खास है Chabahar Port? चाबहार पोर्ट भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक निवेश है। भारत इस पोर्ट के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहता है। इस पोर्ट की मदद से भारत को पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर हुए बिना क्षेत्रीय व्यापार के नए विकल्प मिलते हैं। यही कारण है कि चाबहार पोर्ट को भारत की विदेश नीति और आर्थिक रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। Chabahar Port पर हमले से भारत की चिंता क्यों बढ़ी? अगर क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर समुद्री व्यापार, ऊर्जा सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी पर पड़ सकता है। चाबहार जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट की सुरक्षा भारत के लिए अहम मुद्दा बन सकती है। हालांकि, फिलहाल पोर्ट के संचालन और भारत से जुड़े प्रोजेक्ट पर प्रभाव को लेकर पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है। भारत लगातार क्षेत्रीय घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। Middle East Crisis का Global Market पर असर अमेरिका-ईरान तनाव का असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव से कच्चे तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत या सैन्य कार्रवाई की दिशा पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण होगी। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Donald Trump

US Election Update: Donald Trump ने जताई Cyber Attack की आशंका, 4 देशों के पास हैकिंग क्षमता होने का दावा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने एक बार फिर अमेरिकी चुनावों की सुरक्षा को लेकर बड़ा बयान दिया है। Donald Trump का दावा है कि उनके पास मौजूद खुफिया दस्तावेजों के अनुसार दुनिया के चार देशों में अमेरिकी चुनाव प्रणाली को हैक करने की तकनीकी क्षमता मौजूद है। हालांकि उन्होंने इन देशों के नाम सार्वजनिक नहीं किए और न ही दस्तावेजों को मीडिया के सामने पेश किया। ट्रंप के इस बयान के बाद अमेरिका में चुनावी सुरक्षा, साइबर खतरों और विदेशी हस्तक्षेप को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों से पहले यह मुद्दा फिर से सुर्खियों में रह सकता है। खुफिया दस्तावेजों का दिया हवाला अपने संबोधन के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्हें ऐसी खुफिया जानकारी मिली है, जिससे पता चलता है कि कुछ विदेशी देशों के पास अमेरिकी चुनावी व्यवस्था में साइबर हस्तक्षेप करने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह सुरक्षित रखना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। हालांकि ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये दस्तावेज कब के हैं, किस एजेंसी ने तैयार किए हैं और इनमें किन देशों का जिक्र किया गया है। चुनावी सुरक्षा पर क्यों बढ़ी चिंता? पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका में चुनावी सुरक्षा को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। अमेरिकी एजेंसियां पहले भी यह मान चुकी हैं कि कई विदेशी समूह चुनावी ढांचे को साइबर हमलों के जरिए निशाना बनाने की कोशिश करते रहे हैं। हालांकि साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी देश के पास तकनीकी क्षमता होना और वास्तव में चुनाव परिणामों को प्रभावित कर देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अमेरिका की चुनाव प्रणाली कई स्तरों की सुरक्षा, राज्य सरकारों की निगरानी और स्वतंत्र सत्यापन प्रक्रिया से होकर गुजरती है। 2020 चुनाव का भी किया जिक्र डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले भी 2020 के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने कई बार चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी और बाहरी हस्तक्षेप की आशंका जताई थी। हालांकि उस समय अदालतों और संबंधित एजेंसियों को ऐसे आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत नहीं मिले थे। अब एक बार फिर ट्रंप ने चुनावी सुरक्षा का मुद्दा उठाकर इस बहस को नया मोड़ दे दिया है। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज ट्रंप के बयान के बाद अमेरिकी राजनीति में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। उनके समर्थकों का कहना है कि यदि ऐसी खुफिया जानकारी मौजूद है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं विपक्षी नेताओं का मानना है कि इतने गंभीर दावे बिना सार्वजनिक सबूतों के नहीं किए जाने चाहिए। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा बनाए रखना लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है। आगे क्या हो सकता है? फिलहाल ट्रंप ने जिन खुफिया दस्तावेजों का जिक्र किया है, वे सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। ऐसे में उनके दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। यदि आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़े दस्तावेज या आधिकारिक जानकारी सामने आती है, तो अमेरिकी चुनावी सुरक्षा और साइबर नीति पर नई चर्चा शुरू हो सकती है। फिलहाल यह मामला राजनीतिक बयानबाजी और चुनावी सुरक्षा से जुड़ी बहस का हिस्सा बना हुआ है। सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या ट्रंप अपने दावे के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण पेश करते हैं या नहीं। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Hormuz Strait

Hormuz Strait Alert: भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए सरकार का बड़ा कदम, नई पोस्टिंग पर रोक

Hormuz Strait Crisis के बीच भारत सरकार ने अपने नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने शिपिंग कंपनियों, जहाज प्रबंधन कंपनियों और क्रू भर्ती एजेंसियों को निर्देश दिया है कि अगले आदेश तक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर नए भारतीय नाविकों (Indian Seafarers) की तैनाती न की जाए। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव और हालिया समुद्री हमलों को देखते हुए यह फैसला एहतियात के तौर पर लिया गया है। क्यों लिया गया यह फैसला? बीते कुछ समय से होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। व्यापारिक जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता भी बढ़ गई है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए भारत सरकार ने समुद्री क्षेत्र से जुड़ी सभी कंपनियों को नई एडवाइजरी जारी की है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि जब तक हालात सामान्य नहीं होते, तब तक भारतीय नाविकों को इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर नियुक्त करने से बचा जाए। भारतीय नाविकों की सुरक्षा सरकार की पहली प्राथमिकता सरकार का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह एहतियाती है। किसी भी भारतीय नागरिक की जान जोखिम में न पड़े, इसलिए पहले से ही सावधानी बरती जा रही है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि स्थिति की लगातार निगरानी की जा रही है और जरूरत पड़ने पर आगे भी नए निर्देश जारी किए जा सकते हैं। हालिया हमलों के बाद बढ़ी चिंता हाल के दिनों में होर्मुज क्षेत्र में कई व्यापारिक जहाज हमलों का निशाना बने हैं। इन घटनाओं में भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए। इन हमलों ने पूरी दुनिया का ध्यान इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा की ओर खींचा है। इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार ने शिपिंग सेक्टर के लिए नई सुरक्षा गाइडलाइन जारी करते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। जहाजों को भी दिए गए हाई अलर्ट निर्देश सरकार ने केवल नई तैनाती रोकने का फैसला नहीं लिया, बल्कि इस क्षेत्र में पहले से संचालित जहाजों को भी हाई अलर्ट पर रहने के निर्देश दिए हैं। जहाजों के कप्तानों और ऑपरेटरों से कहा गया है कि वे समुद्री सुरक्षा एजेंसियों की एडवाइजरी का पालन करें, नेविगेशन अलर्ट पर लगातार नजर रखें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना संबंधित अधिकारियों को दें। हजारों भारतीय नाविक अब भी क्षेत्र में कार्यरत भारत दुनिया के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है। बड़ी संख्या में भारतीय नाविक अंतरराष्ट्रीय कार्गो और तेल टैंकरों पर काम करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, हजारों भारतीय नाविक अभी भी होर्मुज जलडमरूमध्य और उसके आसपास के समुद्री क्षेत्र में विभिन्न जहाजों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि सभी संबंधित एजेंसियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत सहायता उपलब्ध कराई जा सके। क्यों महत्वपूर्ण है Strait of Hormuz? होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है। अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री यातायात प्रभावित होता है, तो इसका असर केवल शिपिंग उद्योग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक तेल कीमतों, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ता है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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US Federal Reserve में बढ़ा भारतीयों का प्रभाव

US Federal Reserve में बढ़ा भारतीयों का प्रभाव

दुनिया की सबसे प्रभावशाली केंद्रीय बैंकिंग संस्थाओं में शामिल अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) में भारतीय मूल के अर्थशास्त्रियों का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। भारत के पूर्व रिजर्व बैंक (RBI) गवर्नर डॉ. रघुराम राजन समेत तीन भारतीय विशेषज्ञों को फेडरल रिजर्व की महत्वपूर्ण सलाहकार समितियों में शामिल किया गया है। इसे भारत के लिए गर्व की बात माना जा रहा है। फेडरल रिजर्व ने अपने विभिन्न आर्थिक और वित्तीय सलाहकार समूहों के लिए नए सदस्यों की घोषणा की है। इनमें भारतीय मूल के जाने-माने अर्थशास्त्रियों को भी जगह मिली है। इन विशेषज्ञों का काम अमेरिकी अर्थव्यवस्था, बैंकिंग व्यवस्था और भविष्य की आर्थिक नीतियों पर महत्वपूर्ण सुझाव देना होगा। डॉ. रघुराम राजन, जो भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रह चुके हैं और वर्तमान में वैश्विक स्तर पर एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री माने जाते हैं, को एक अहम सलाहकार समिति में शामिल किया गया है। उनके साथ दो अन्य भारतीय मूल के अर्थशास्त्रियों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थशास्त्रियों की बढ़ती भागीदारी इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर भारतीय प्रतिभा और आर्थिक विशेषज्ञता को लगातार सम्मान मिल रहा है। भारतीय पेशेवर आज दुनिया के बड़े वित्तीय संस्थानों, तकनीकी कंपनियों और नीति निर्माण से जुड़े संगठनों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, यह नियुक्ति फेडरल रिजर्व के निर्णय लेने वाले बोर्ड की सदस्यता नहीं है, बल्कि सलाहकार समितियों का हिस्सा है। फिर भी इन समितियों की सिफारिशें आर्थिक नीतियों और वित्तीय फैसलों को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। ऐसे समय में भारतीय विशेषज्ञों की यह बढ़ती भागीदारी दोनों देशों के बीच ज्ञान, अनुभव और आर्थिक सहयोग को भी नई मजबूती दे सकती है। भारतीय मूल के विशेषज्ञों को मिली यह जिम्मेदारी न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह भारत की वैश्विक पहचान और आर्थिक विशेषज्ञता की बढ़ती स्वीकार्यता का भी प्रतीक मानी जा रही है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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ड्डा का राहुल पर पलटवार: बोले- कांग्रेस बताए अपने राज्यों में पेपर लीक क्यों हुए, सरकार चर्चा को तैयार

पेपर लीक के मुद्दे पर संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। केंद्रीय मंत्री और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस पहले यह बताए कि उसके शासन वाले राज्यों में पेपर लीक की घटनाएं क्यों हुईं। नड्डा ने कहा कि केंद्र सरकार इस गंभीर विषय पर संसद में विस्तृत चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर रहा है, जबकि सरकार दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के पक्ष में है। दरअसल, राहुल गांधी ने हाल ही में दावा किया था कि पिछले 10 वर्षों में देशभर में 152 पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। उन्होंने इसे युवाओं के भविष्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बताते हुए सरकार पर परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित रखने में विफल रहने का आरोप लगाया था। इस पर जवाब देते हुए नड्डा ने कहा कि केवल आंकड़े पेश करने से काम नहीं चलेगा। कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि जिन राज्यों में उसकी सरकारें रही हैं, वहां भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं क्यों हुईं और उन्हें रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए। उन्होंने दोहराया कि केंद्र सरकार परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए प्रतिबद्ध है तथा संसद में इस विषय पर सार्थक चर्चा का स्वागत करती है।

अजमेर में मार्बल व्यापारी पर जानलेवा हमला, CCTV में कैद हुई वारदात

राजस्थान के अजमेर जिले के किशनगढ़ में बुधवार सुबह मार्बल व्यापारी पर चार बदमाशों ने लाठी-डंडों से हमला कर दिया। स्कॉर्पियो से आए हमलावरों ने गोदाम में घुसकर व्यापारी के साथ बेरहमी से मारपीट की। पूरी घटना गोदाम में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई है। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है। गोदाम में घुसकर किया हमला गांधीनगर थाना क्षेत्र स्थित मार्बल एरिया में बुधवार सुबह करीब 8:20 बजे स्कॉर्पियो में सवार चार युवक गोदाम के बाहर पहुंचे। गोदाम में बैठे मार्बल व्यापारी गोवर्धन पर उन्होंने लाठी-डंडों से हमला कर दिया। व्यापारी ने शुरुआत में हमलावरों का मुकाबला करने की कोशिश की, लेकिन चारों बदमाशों ने उसे घेर लिया और जमीन पर गिराकर लगातार लाठियों से पीटा। वारदात के बाद सभी आरोपी मौके से फरार हो गए। सिर और हाथ में गंभीर चोट हमले में व्यापारी के सिर और हाथ में गंभीर चोटें आईं। घायल अवस्था में उन्हें तत्काल किशनगढ़ के राजकीय अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है। पीड़ित ने दर्ज कराई शिकायत गांधीनगर थाना प्रभारी अनिल शर्मा ने बताया कि पीड़ित व्यापारी की शिकायत पर अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान कर उनकी गिरफ्तारी के प्रयास कर रही है। भाई के साथ गोदाम में मौजूद था व्यापारी पीड़ित गोवर्धन ने बताया कि वह बुधवार सुबह अपने भाई के साथ गोदाम में बैठा था। इसी दौरान स्कॉर्पियो में सवार चार युवक पहुंचे और बिना किसी बातचीत के अचानक हमला कर दिया। बदमाशों ने गोदाम के अंदर घुसकर उन्हें नीचे गिराया और लाठियों से बेरहमी से पीटा। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार किया जाएगा। अधिक खबरों के लिए विजिट करें:deshharpal.com

BPCL को जून तिमाही में ₹3,962 करोड़ का घाटा, कच्चे तेल की महंगाई से बिगड़े नतीजे

भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) ने वित्त वर्ष 2026-27 की जून तिमाही (Q1) के नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी को इस तिमाही में ₹3,962 करोड़ का शुद्ध घाटा हुआ है। पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी ने ₹6,124 करोड़ का मुनाफा कमाया था, जबकि मार्च तिमाही में ₹3,191 करोड़ का लाभ दर्ज किया गया था। 23% बढ़ा कंपनी का रेवेन्यू घाटे के बावजूद BPCL का परिचालन से राजस्व (Revenue from Operations) बढ़कर ₹1.59 लाख करोड़ पहुंच गया। यह पिछले साल की समान तिमाही के ₹1.29 लाख करोड़ के मुकाबले करीब 23% अधिक है। वहीं, मार्च तिमाही के ₹1.35 लाख करोड़ की तुलना में इसमें करीब 18% की वृद्धि दर्ज की गई। कच्चे तेल की महंगाई बनी घाटे की वजह कंपनी के अनुसार, अमेरिका-ईरान तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इसके साथ ही शिपिंग (भाड़ा) और इंश्योरेंस लागत भी बढ़ गई। हालांकि, बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में नहीं डाला जा सका, जिससे कंपनी की लाभप्रदता प्रभावित हुई और तिमाही घाटे में बदल गई। शेयर में गिरावट नतीजों के बाद BPCL का शेयर 3% की गिरावट के साथ ₹309 पर बंद हुआ। BPCL के बारे में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) देश की प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों में शामिल है। इसकी स्थापना 24 जनवरी 1976 को हुई थी। कंपनी मुंबई, कोच्चि, नुमालीगढ़ और बीना में रिफाइनरियों का संचालन करती है, जिनकी कुल रिफाइनिंग क्षमता 40 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष से अधिक है। BPCL पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, लुब्रिकेंट्स और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के रिफाइनिंग व वितरण का कार्य करती है। अधिक खबरों के लिए विजिट करें:deshharpal.com

फ्रांस की पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू का इस्तीफा, विवादित कृषि बिल के विरोध में छोड़ा पद

फ्रांस की पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू ने विवादित कृषि विधेयक के विरोध में इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। इस बिल में दो प्रतिबंधित कीटनाशकों के सीमित इस्तेमाल और सिंचाई के लिए बड़े जलाशय बनाने की अनुमति देने का प्रावधान है। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे मधुमक्खियों, जैव विविधता और पर्यावरण को गंभीर नुकसान हो सकता है। एसोसिएटेड प्रेस (AP) के अनुसार, बारबू बुधवार को राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को अपना इस्तीफा सौंपेंगी। उन्होंने कहा कि सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के अपने वादों से पीछे हटते हुए ऐसे प्रावधानों को मंजूरी दी, जिनका वह लगातार विरोध करती रही थीं। बिल के दो विवादित प्रावधान 1. प्रतिबंधित कीटनाशकों को मंजूरीविधेयक में एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन जैसे प्रतिबंधित कीटनाशकों के सीमित उपयोग की अनुमति दी गई है। इनका इस्तेमाल चुकंदर, सेब और चेरी जैसी फसलों में किया जा सकेगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ये रसायन मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीड़ों के लिए बेहद हानिकारक हैं, जिससे कृषि उत्पादन और पारिस्थितिकी तंत्र दोनों प्रभावित हो सकते हैं। 2. सिंचाई के लिए बड़े जलाशयों की अनुमतिबिल में किसानों को सिंचाई के लिए बड़े जलाशय और कृत्रिम तालाब बनाने की प्रक्रिया आसान करने का भी प्रावधान है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि इससे भूजल और नदियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और गर्मियों में जल संकट बढ़ सकता है। संसद से पास हुआ विधेयक फ्रांस की संसद में मंगलवार को पेश किए गए इस विधेयक को सीनेट ने 214 के मुकाबले 111 मतों से पारित कर दिया। सरकार का कहना है कि यह कानून किसानों की बढ़ती लागत और घटती आय को देखते हुए लाया गया है, ताकि वे यूरोप के अन्य देशों के किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। बारबू ने जताई नाराजगी मोनिक बारबू ने कहा कि विवादित प्रावधान आखिरी समय में बिल में जोड़े गए और उन्हें हटाने पर सरकार ने कोई गंभीर चर्चा नहीं की। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि पिछले नौ महीनों में उन्होंने जंगलों, स्वच्छ जल, साफ हवा और जैव विविधता की रक्षा के लिए काम किया, लेकिन अब वह अपने उद्देश्यों को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं। पहले भी विवादों में रहा कीटनाशक एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन नियोनिकोटिनॉइड समूह के कीटनाशक हैं। फ्रांस ने 2018 में एसेटामिप्रिड पर प्रतिबंध लगाया था। इससे पहले भी इस प्रतिबंध को हटाने की कोशिश हुई थी, लेकिन फ्रांस की सर्वोच्च अदालत ने पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर संभावित खतरे का हवाला देते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया था। अधिक खबरों के लिए विजिट करें:deshharpal.com

इंदौर में छात्र आंदोलन को मिला कांग्रेस का समर्थन, दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी धरने में पहुंचे

इंदौर के टंट्याभील चौराहे पर चल रहे छात्र आंदोलन को बुधवार रात कांग्रेस का खुला समर्थन मिला। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी धरना स्थल पहुंचे और छात्रों के बीच बैठकर उनके आंदोलन में शामिल हुए। इस दौरान कांग्रेस नेताओं और प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की। टंट्याभील चौराहे पर पिछले कई दिनों से छात्र शिक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन और सोनम वांगचुक को हिरासत में लिए जाने के बाद इंदौर में भी आंदोलन तेज हो गया है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में छात्र धरना स्थल पर पहुंचकर अपनी मांगों के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं। बुधवार रात दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी ने छात्रों के बीच बैठकर आंदोलन का समर्थन किया। उनके साथ शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे सहित कई कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी धरने में शामिल हुए। दिग्विजय सिंह ने कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस पिछले 25 दिनों से यह मांग उठा रही है और उन्होंने स्वयं 21 जून को भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी थी। छात्रों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहेगा। अधिक जानकारी के लिए विजिट करें:deshharpal.com

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