नई दिल्ली। भारत के सबसे बड़े कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़े हजारों दस्तावेज लीक होने का दावा सामने आया है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ‘वर्ल्ड लीक्स’ (World Leaks) नामक हैकर समूह ने डार्क वेब पर इस परियोजना से जुड़े बड़ी संख्या में दस्तावेज अपलोड करने का दावा किया है। दावा किए गए दस्तावेजों में प्लांट के कुछ हिस्सों के ब्लूप्रिंट, सप्लायरों की सूची, कंट्रोल रूम से संबंधित जानकारी, निरीक्षण रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी दस्तावेज शामिल हैं। बताया जा रहा है कि संबंधित सर्वर मई 2026 में हैक हुआ था और जून में डेटा लीक होने का दावा किया गया। यह मामला अब सार्वजनिक रूप से सामने आया है। रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने स्वीकार किया है कि उसके ठेके से जुड़े कुछ डेटा जिस थर्ड-पार्टी डेटा सेंटर कंपनी योट्टा (Yotta) के सर्वर पर संग्रहीत थे, उसमें साइबर सुरक्षा से जुड़ी घटना हुई है। कंपनी ने इसकी जानकारी संबंधित सरकारी एजेंसियों को दे दी है। कैसे हुआ कथित डेटा लीक? उपलब्ध जानकारी के अनुसार घटनाक्रम इस प्रकार है— फिलहाल न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL), रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर और भारतीय कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In) इस पूरे मामले की जांच और समीक्षा कर रहे हैं। कितना गंभीर हो सकता है यह मामला? परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डार्क वेब पर साझा किए गए दस्तावेज वास्तविक और प्रमाणिक हैं, तो इनके जरिए कोई भी हमलावर प्लांट के सपोर्ट सिस्टम, सप्लाई चेन और सुरक्षा व्यवस्था की विस्तृत जानकारी हासिल कर सकता है। इससे भविष्य में साइबर हमलों या अन्य सुरक्षा जोखिमों की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, अभी तक संबंधित एजेंसियों ने सार्वजनिक रूप से यह पुष्टि नहीं की है कि लीक हुए सभी दस्तावेज वास्तविक हैं या नहीं। 2019 में भी हुआ था साइबर हमला यह पहली बार नहीं है जब कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट साइबर हमले की खबरों में आया हो। वर्ष 2019 में भी प्लांट के प्रशासनिक नेटवर्क में उत्तर कोरिया से जुड़े एक हैकर समूह का मैलवेयर मिलने की पुष्टि हुई थी। उस समय NPCIL ने स्पष्ट किया था कि संयंत्र की संचालन प्रणाली (Operational System) प्रभावित नहीं हुई थी। जानिए इस मामले से जुड़े अहम सवाल और जवाब डार्क वेब क्या है? डार्क वेब इंटरनेट का वह हिस्सा है, जिसे सामान्य ब्राउज़र जैसे Chrome, Edge या Safari से एक्सेस नहीं किया जा सकता। इसे देखने के लिए विशेष ब्राउज़र, जैसे Tor Browser, की आवश्यकता होती है। सप्लाई चेन अटैक क्या होता है? जब साइबर अपराधी किसी संस्था पर सीधे हमला करने के बजाय उसके ठेकेदार, सॉफ्टवेयर प्रदाता या डेटा सेंटर को निशाना बनाते हैं, तो इसे सप्लाई चेन अटैक कहा जाता है। इसके जरिए मुख्य संस्था तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। हैकर्स डेटा डार्क वेब पर क्यों डालते हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे फिरौती मांगना, डेटा बेचना, जासूसी करना, अपनी हैकिंग क्षमता का प्रदर्शन करना या भविष्य के साइबर हमलों के लिए जानकारी साझा करना जैसे उद्देश्य हो सकते हैं। कंट्रोल रूम का लेआउट लीक होने से क्या खतरा है? यदि किसी संवेदनशील संस्थान के कंट्रोल रूम या तकनीकी ढांचे की जानकारी सार्वजनिक हो जाए, तो संभावित हमलावर सुरक्षा व्यवस्था और महत्वपूर्ण प्रणालियों की बेहतर समझ हासिल कर सकते हैं। इससे भविष्य में साइबर हमलों या घुसपैठ की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। भारत में न्यूक्लियर प्लांट की साइबर सुरक्षा कौन देखता है? भारत में परमाणु संयंत्रों की साइबर सुरक्षा की जिम्मेदारी NPCIL, CERT-In, NCIIPC और AERB जैसी संस्थाओं के पास होती है, जो समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट और निगरानी करती हैं। नोट: फिलहाल दस्तावेजों के लीक होने और उनकी प्रामाणिकता को लेकर जांच जारी है। संबंधित एजेंसियों ने मामले की समीक्षा शुरू कर दी है और अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे। देश-दुनिया, तकनीक और सुरक्षा से जुड़ी ताजा खबरों के लिए विजिट करें: deshharpal.com