संपादकीय – निखिल सिद्धभट्टी
भारतीय घरों में झाड़ू सिर्फ सफाई का साधन नहीं, एक प्रतीक भी है—संगठन का, संतुलन का और टिकाऊपन का। कोई भी गृहिणी आपको बताएगी कि अच्छी झाड़ू वही होती है जिसकी हर एक तिनकी मजबूती से एक-दूसरे से जुड़ी हो और बीच में एक मजबूत आधार हो। लेकिन अगर वही झाड़ू सिर्फ दिखावे के लिए किसी चमकदार पाइप में कसकर बंद कर दी जाए, तो वह ज़्यादा दिन नहीं चलती। यही रूपक आज आम आदमी पार्टी (AAP) की स्थिति पर सटीक बैठता है।
AAP की स्थापना भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जनांदोलन के रूप में हुई थी। इसमें समाज के वे लोग जुड़े थे जो पारंपरिक राजनीति से दूर रहकर देश को एक नई दिशा देना चाहते थे—शांति भूषण, योगेंद्र यादव, आशुतोष, कुमार विश्वास और आगे चलकर राघव चड्ढा जैसे नाम इस विचारधारा के स्तंभ बने। यह वह जमात थी जो सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की बात करती थी।
लेकिन समय के साथ यह झाड़ू बिखरती चली गई। सवाल उठता है—क्या यह बिखराव सिर्फ “ऑपरेशन लोटस” जैसी राजनीतिक रणनीतियों का परिणाम है? या इसके पीछे कुछ और गहरी वजहें हैं?
निस्संदेह, भारतीय राजनीति में विपक्षी दलों को तोड़ने के आरोप नई बात नहीं हैं। “ऑपरेशन लोटस” का नाम भी इसी संदर्भ में बार-बार सामने आता है। लेकिन अगर हम ईमानदारी से विश्लेषण करें, तो यह मानना मुश्किल है कि AAP से जुड़े इतने शिक्षित, वैचारिक और स्वतंत्र सोच वाले लोग सिर्फ बाहरी दबाव में पार्टी छोड़ते चले गए। असली कारण कहीं अधिक आंतरिक दिखाई देता है।
AAP के भीतर समय के साथ एक “वन मैन शो” की छवि उभरती गई। अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व शुरुआत में आंदोलनकारी ऊर्जा से भरा हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे उसी नेतृत्व में केंद्रीकरण और कथित “सिंडिकेट संस्कृति” की झलक दिखने लगी। निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती गई, असहमति के लिए जगह सिकुड़ती गई, और नतीजा यह हुआ कि एक-एक कर पार्टी के संस्थापक चेहरे किनारे होते चले गए।
विडंबना यह भी है कि जो पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी हुई थी, उसके कई प्रमुख नेता खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरकर जेल तक पहुंच गए। इससे न केवल पार्टी की नैतिक साख को झटका लगा, बल्कि उसके मूल विचार को भी कमजोर किया।
राघव चड्ढा जैसे युवा और प्रभावशाली नेता का लंबे समय तक पार्टी की सक्रिय गतिविधियों से दूरी बनाना भी एक संकेत था—एक ऐसा संकेत जिसे शायद समय रहते समझा नहीं गया। आज भी पार्टी के भीतर ऐसे कई चेहरे हैं जो खुलकर सामने नहीं आ रहे, लेकिन “घुटन” महसूस कर रहे हैं।
अब सवाल यह नहीं है कि दोष किस पर डाला जाए—BJP, मोदी या अमित शाह पर। सवाल यह है कि क्या AAP अपने भीतर झांकने को तैयार है?
अरविंद केजरीवाल के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती आत्ममंथन की है। उन्हें यह समझना होगा कि AAP कोई पारंपरिक पार्टी नहीं थी, बल्कि एक विचार था—और विचार को आदेशों से नहीं, संवाद से चलाया जाता है। उन्हें अपने पुराने और नए साथियों के साथ बैठकर एक नया रास्ता तैयार करना होगा, न कि “सुपर CM” की छवि में सिमट जाना होगा।
अगर समय रहते यह झाड़ू फिर से नहीं गूंथी गई, तो वह दिन दूर नहीं जब इस झाड़ू में सिर्फ एक ही तिनका बचेगा—और तब सफाई नहीं, सिर्फ प्रतीक रह जाएगा।
अब वक्त है—हर तिनके को फिर से जोड़ने का। वरना इतिहास गवाह है, बिखरी हुई झाड़ू न घर साफ कर पाती है, न राजनीति।

