राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) ने भारत के विभाजन और उसके बाद देश में आए लाखों लोगों को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसकी चर्चा राजनीतिक और सामाजिक दोनों हलकों में हो रही है। उन्होंने कहा कि 1947 के विभाजन के बाद भारत आने वाले लोगों को ‘शरणार्थी’ (Refugees) कहना सही नहीं है, क्योंकि वे किसी दूसरे देश में शरण लेने नहीं आए थे, बल्कि अपने ही देश लौटे थे।
भागवत के मुताबिक, इन लोगों ने धन-दौलत, कारोबार और पुश्तैनी घर पीछे छोड़ दिए, लेकिन अपनी संस्कृति, आस्था और राष्ट्रीय पहचान से समझौता नहीं किया। इसलिए उनके संघर्ष को केवल ‘शरणार्थी’ शब्द में नहीं बांधा जा सकता।
“उन्होंने संपत्ति नहीं, अपना देश चुना”
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के समय लाखों परिवारों को मजबूरी में अपना सब कुछ छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने भारत को इसलिए चुना क्योंकि यह उनकी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमि थी।
उन्होंने कहा कि “इन लोगों ने संपत्ति नहीं, अपना देश चुना। वे यहां इसलिए आए ताकि बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन कर सकें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।”
सिंधी समाज के योगदान का किया उल्लेख
RSS प्रमुख ने सिंधी समाज के संघर्ष और योगदान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विभाजन का सबसे गहरा असर जिन समुदायों पर पड़ा, उनमें सिंधी समाज भी शामिल था। लाखों लोगों ने रातों-रात अपना घर-बार छोड़ दिया, लेकिन भारत में नई शुरुआत करते हुए व्यापार, शिक्षा, उद्योग और समाज सेवा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
भागवत ने कहा कि आज देश के विकास में इन परिवारों का योगदान किसी से छिपा नहीं है।
विभाजन को बताया बड़ी मानवीय त्रासदी
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत का विभाजन केवल सीमाओं का बंटवारा नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन को बदल देने वाली त्रासदी थी। लाखों परिवार बिछड़ गए, हजारों लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया और करोड़ों लोगों को नए सिरे से जीवन शुरू करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि इस इतिहास को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को इसके बारे में बताना जरूरी है, ताकि समाज में एकता और राष्ट्रीय चेतना मजबूत हो सके।
इतिहास से सीख लेने की जरूरत
मोहन भागवत ने कहा कि इतिहास को भूलना किसी भी समाज के लिए ठीक नहीं होता। उनका मानना है कि अतीत की घटनाओं से सीख लेकर ही बेहतर भविष्य बनाया जा सकता है। उन्होंने सभी नागरिकों से सामाजिक सौहार्द, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का आह्वान किया।
बयान क्यों बना चर्चा का विषय?
मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब देश में विभाजन, नागरिकता और ऐतिहासिक पहचान जैसे मुद्दों पर लगातार बहस हो रही है। ऐसे में उनका यह कहना कि विभाजन के बाद भारत आए लोगों को शरणार्थी नहीं कहा जाना चाहिए, राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।
हालांकि, इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की अपनी-अपनी राय है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस बयान पर और प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।
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