इजराइल (Israel) में आम चुनाव के नतीजे आने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनके गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं मिला। इसी बीच चुनाव में विदेशी दखल और पैसों के इस्तेमाल को लेकर एक नया विवाद सामने आया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद (Mossad) भी जांच में शामिल हो गई है। मोसाद, घरेलू सुरक्षा एजेंसी शिन बेट (Shin Bet) के साथ मिलकर यह पता लगाएगी कि क्या विदेशी देशों या संगठनों ने इजराइल के चुनाव को प्रभावित करने के लिए फंडिंग की थी।
इस मामले में कतर और तुर्किये का नाम सामने आया है। हालांकि, दोनों देशों ने किसी भी तरह के हस्तक्षेप के आरोपों को खारिज किया है। वहीं, इजराइल के चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि इस जांच से चुनाव के आधिकारिक नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
Mossad और Shin Bet को क्यों सौंपी गई जांच?
इजराइल के केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के जज नोआम सोहल्बर्ग ने विदेशी हस्तक्षेप की आशंका सामने आने के बाद शिन बेट को जांच के निर्देश दिए थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसी को चुनाव से पहले ही कुछ संदिग्ध विदेशी गतिविधियों से जुड़ी खुफिया जानकारी मिली थी। आशंका है कि विदेशी फंडिंग के जरिए अरब समुदाय के मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की गई हो सकती है।
अब मोसाद को भी इस जांच में शामिल किया गया है। वह खासतौर पर विदेशी देशों से जुड़े पहलुओं और संभावित फंडिंग नेटवर्क की पड़ताल में मदद करेगी।
जांच एजेंसियां यह जानने की कोशिश कर रही हैं कि पैसा कहां से आया, किन माध्यमों से भेजा गया और क्या इसका इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया गया था। फिलहाल जांच पूरी नहीं हुई है और आरोपों की पुष्टि होना बाकी है।
Qatar और Turkey का नाम क्यों आया?
विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों में कतर का नाम प्रमुखता से सामने आया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि कतर से जुड़ी संभावित फंडिंग के जरिए इजराइल के अरब समुदाय में मतदान बढ़ाने की कोशिश की गई हो सकती है।
इसके अलावा तुर्किये की संभावित भूमिका की भी जांच की जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि क्या इन देशों से जुड़े किसी नेटवर्क ने चुनाव के दौरान पैसे का इस्तेमाल किया था।
हालांकि, कतर और तुर्किये दोनों ने आरोपों को खारिज किया है। इसलिए फिलहाल इन दावों को जांच के विषय के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
चुनाव आयोग का बड़ा बयान, बोले- नतीजों पर नहीं होगा असर
विदेशी हस्तक्षेप की जांच शुरू होने के बाद इजराइल में चुनाव की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे थे। इस पर केंद्रीय चुनाव आयोग के कार्यवाहक महानिदेशक डीन लिवने ने स्थिति स्पष्ट की।
उन्होंने कहा कि चुनाव कानूनी प्रक्रिया के तहत कराए गए थे और मतदान केंद्रों पर वोटिंग की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जरूरी इंतजाम किए गए थे।
आयोग ने यह भी साफ किया कि जांच किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है। इसका मकसद सिर्फ विदेशी हस्तक्षेप और संभावित गैरकानूनी गतिविधियों की सच्चाई सामने लाना है।
शिन बेट ने भी जांच को सीमित दायरे में बताया है। एजेंसी के मुताबिक, किसी पूरे समुदाय पर सवाल नहीं उठाया जा रहा है और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ ही कार्रवाई होगी।
Netanyahu की Likud सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन बहुमत से दूर
इजराइल की 120 सदस्यीय संसद को नेसेट कहा जाता है। यहां सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है।
चुनाव के अंतिम नतीजों में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिलीं। इसके साथ ही वह सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन उनके समर्थन वाले गठबंधन को कुल 53 सीटें ही मिल सकीं।
वहीं, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिलीं। अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने मिलकर 19 सीटें हासिल कीं।
इस तरह किसी भी खेमे के पास अपने दम पर बहुमत नहीं है। अब सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच समर्थन और गठबंधन को लेकर बातचीत अहम होगी।
77.9% मतदान, अरब पार्टियों को मिलीं 19 सीटें
इस चुनाव में 77.9 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। चुनाव आयोग के अनुसार, कुल 57,16,665 वोटों की गिनती हुई।
अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने कुल 19 सीटें हासिल कीं। इस प्रदर्शन के बाद सरकार गठन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, नेतन्याहू और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेदों के कारण आगे की राह आसान नहीं दिख रही है। दोनों खेमों को बहुमत के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाना होगा।
4 नवंबर को राष्ट्रपति को सौंपे जाएंगे आधिकारिक नतीजे
चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक, प्रमाणित चुनाव परिणाम 4 नवंबर 2026 को राष्ट्रपति इसाक हर्जोग को सौंपे जाएंगे।
इसके बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करेंगे और सरकार बनाने के लिए उपयुक्त उम्मीदवार को आमंत्रित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगे।
नई नेसेट का शपथ ग्रहण 10 नवंबर को निर्धारित है। ऐसे में आने वाले दिनों में गठबंधन की बातचीत पर सभी की नजर रहेगी।
अब इजराइल की राजनीति में आगे क्या होगा?
इजराइल के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, मोसाद और शिन बेट की जांच में विदेशी फंडिंग से जुड़े आरोपों की सच्चाई सामने लाना। दूसरी, संसद में 61 सीटों का समर्थन जुटाकर नई सरकार बनाना।
नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ी होने के बावजूद बहुमत से दूर है। वहीं विपक्षी दलों के सामने भी अलग-अलग राजनीतिक दलों को साथ लाने की चुनौती है।
फिलहाल चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि जांच से आधिकारिक नतीजे प्रभावित नहीं होंगे। अब देखना होगा कि जांच में क्या खुलासे होते हैं और इजराइल में अगली सरकार किस गठबंधन के सहारे बनती है।
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