अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ दोनों देशों के बीच शांति की कोशिशें चल रही हैं, तो दूसरी तरफ शर्तों को लेकर टकराव लगातार बढ़ रहा है। इसी बीच ईरान ने अमेरिका के सामने सात शर्तों वाला नया प्रस्ताव रख दिया है। तेहरान का साफ कहना है कि जब तक उसकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी। इतना ही नहीं, ईरान ने दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापारिक रास्तों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने से भी इनकार कर दिया है।
रॉयटर्स की 5 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने कतर के जरिए अमेरिका को अपना नया परमाणु प्रस्ताव भेजा है। अमेरिकी प्रशासन फिलहाल इस प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है। ईरान के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी मोहसेन रेजाई ने रूस दौरे के दौरान कहा कि अमेरिका को पहले उसकी सात शर्तें माननी होंगी। इसके बाद ही बातचीत और होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर विचार किया जाएगा।
ईरान की 7 शर्तें क्या हैं?
Iran की ओर से भेजे गए नए प्रस्ताव की पूरी आधिकारिक सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि, ईरानी अधिकारियों के बयानों और पहले पेश किए गए सात चरणों वाले प्रस्ताव के आधार पर कुछ प्रमुख मांगें सामने आई हैं।
- आर्थिक प्रतिबंधों से राहत: अमेरिका ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध हटाए।
- तेल कारोबार की अनुमति: ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल बेचने की छूट मिले।
- नौसैनिक नाकेबंदी खत्म हो: ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी हटाई जाए।
- फ्रीज संपत्तियां वापस मिलें: विदेशों में जमा ईरान की रोकी गई संपत्तियां जारी की जाएं।
- युद्ध का मुआवजा: युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के मुद्दे पर सहमति बने।
- क्षेत्रीय संघर्ष खत्म हो: लेबनान समेत मध्य पूर्व के दूसरे मोर्चों पर भी युद्धविराम लागू हो।
- होर्मुज पर समझौता: समुद्री रास्ते की सुरक्षा और आवाजाही को लेकर ईरान की शर्तों पर सहमति बनाई जाए।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये मांगें अलग-अलग बयानों और पुराने प्रस्तावों से सामने आई हैं। इन्हें नए प्रस्ताव की प्रमाणित आधिकारिक सात-सूत्रीय सूची नहीं माना जाना चाहिए।
Hormuz Strait को लेकर ईरान का सख्त रुख
होर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया है। यह समुद्री रास्ता फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।
Iran का कहना है कि अमेरिका जब तक अपनी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म नहीं करता और उसकी मांगों पर सहमति नहीं बनती, तब तक होर्मुज में सामान्य आवाजाही बहाल करने का फैसला नहीं लिया जाएगा।
हालांकि, ईरान ने इससे पहले मध्यस्थों के सामने एक ऐसा प्रस्ताव भी रखा था, जिसके तहत समझौता होने पर दो दिनों के भीतर होर्मुज को खोलने की संभावना जताई गई थी। यानी रास्ता खोलने का विकल्प पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन इसके लिए ईरान अपनी शर्तों पर समझौता चाहता है।
अमेरिका की मांग और ईरान के बीच सबसे बड़ा विवाद
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में सबसे बड़ी रुकावट परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है। वॉशिंगटन चाहता है कि किसी भी शुरुआती समझौते में ईरान के यूरेनियम संवर्धन, परमाणु भंडार और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण से जुड़े मुद्दों को शामिल किया जाए।
दूसरी तरफ, तेहरान का कहना है कि पहले आर्थिक प्रतिबंधों और समुद्री नाकेबंदी जैसे मुद्दों का समाधान होना चाहिए। उसके बाद ही परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत आगे बढ़ सकती है।
यही वजह है कि दोनों देश बातचीत के क्रम को लेकर भी सहमत नहीं हो पा रहे हैं। अमेरिका परमाणु मुद्दे को शुरुआत में शामिल करना चाहता है, जबकि ईरान पहले अपनी शर्तों पर कार्रवाई की मांग कर रहा है।
कतर के जरिए जारी है बातचीत, लेकिन नहीं निकला समाधान
दोनों देशों के बीच सीधे बातचीत के बजाय कतर के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। 2 नवंबर को दोहा में ईरानी प्रतिनिधियों और कतर के मध्यस्थों के बीच बातचीत हुई थी। इस दौरान प्रस्ताव में बदलाव और समझौते के मसौदे पर चर्चा हुई, लेकिन कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि मध्यस्थों के जरिए बातचीत जारी है और अब सब कुछ वॉशिंगटन के रुख पर निर्भर करता है।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने भी कहा था कि सितंबर में पेश किए गए सात चरणों वाले प्रस्ताव को छोटा करके तेजी से लागू करने की संभावना पर काम किया जा रहा है।
Trump ने सैन्य कार्रवाई का विकल्प रखा खुला
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। हालांकि, उन्होंने सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला रखा है।
इस बीच 3 नवंबर को अमेरिका ने ईरान के क़ेश्म द्वीप पर सीमित सैन्य कार्रवाई की थी। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे रक्षात्मक कार्रवाई बताया था। इसके बाद ईरान ने चेतावनी दी कि उस पर दोबारा हमला हुआ तो जवाबी कार्रवाई का दायरा बढ़ सकता है।
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत के जरिए समाधान निकलने की उम्मीद जताई है। वहीं, ईरान का कहना है कि वह अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
चीन और रूस भी बढ़ा रहे कूटनीतिक प्रयास
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच चीन और रूस भी सक्रिय नजर आ रहे हैं। चीन ने सभी पक्षों से सैन्य कार्रवाई के बजाय राजनीतिक समाधान निकालने की अपील की है। वहीं, रूस ने भी दोबारा सैन्य संघर्ष शुरू होने की आशंका पर चिंता जताई है।
कतर के अलावा ओमान और अन्य क्षेत्रीय देश भी तनाव कम करने की कोशिशों में जुटे हैं। इन देशों की चिंता है कि अगर संघर्ष दोबारा बढ़ा तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा और व्यापार पर पड़ सकता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक रुकावट रहने का असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर भी पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है।
अगर इस रास्ते से तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर आगे चलकर पेट्रोल-डीजल, माल ढुलाई और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
इसके अलावा समुद्री जहाजों के बीमा और परिवहन खर्च में बढ़ोतरी से अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर दबाव आ सकता है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल ईरान का प्रस्ताव अमेरिका के पास है और उस पर समीक्षा जारी है। कतर समेत दूसरे मध्यस्थ दोनों देशों के बीच समझौते का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका ईरान की सात शर्तों पर सहमत होगा? या फिर परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ेगा?
फिलहाल किसी समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। आने वाले दिनों में अमेरिका का जवाब और मध्यस्थ देशों की कोशिशें तय करेंगी कि दोनों देश बातचीत की मेज पर लौटते हैं या पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ता है।
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