भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को Shri Krishna Janmashtami पूरे देश में भक्ति, उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। यह दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार, माखनचोर श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में विशेष महत्व रखता है। 2025 में यह पर्व रोहिणी नक्षत्र के संयोग में आ रहा है, जिससे इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ गया है।
जन्माष्टमी का आध्यात्मिक संदेश
श्रीकृष्ण का जीवन हमें धर्म, साहस और प्रेम का अद्वितीय पाठ पढ़ाता है। उन्होंने गीता में कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग का मार्ग दिखाया। उनकी लीलाएं बताती हैं कि कठिन से कठिन समय में भी सच्चाई और सदाचार का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
व्रत और पूजन विधि
Janmashtami के दिन भक्त निर्जला उपवास रखते हैं। रात 12 बजे, जब नंदलाल का जन्म हुआ था, मंदिरों में घंटियों और शंखनाद के साथ भजन-कीर्तन की गूंज होती है। श्रीकृष्ण की बाल स्वरूप में पूजा कर उन्हें माखन, मिश्री, पंचामृत और तुलसी पत्र अर्पित किए जाते हैं।
झांकियों और दही हांडी की धूम
मथुरा, वृंदावन, द्वारका और देशभर में सजाई गई कृष्ण लीलाओं की झांकियां भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में दही हांडी का आयोजन जन्माष्टमी की शोभा बढ़ाता है। गोविंदा टीमें मानव पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ती हैं, जो एकता, साहस और आनंद का प्रतीक है।
2025 का विशेष संयोग
इस वर्ष Janmashtami पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का मेल दुर्लभ है। ज्योतिष के अनुसार, यह योग भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति लाएगा।
उत्सव का असली अर्थ
Janmashtami हमें यह सिखाती है कि भगवान श्रीकृष्ण की तरह अन्याय के खिलाफ खड़ा होना, प्रेम और करुणा का भाव रखना ही जीवन का सच्चा उत्सव है।
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