प्रयागराज में चल रहे माघ मेला 2026 (Magh Mela 2026) के दौरान एक ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक तीनों हलकों में हलचल मचा दी है। मामला जुड़ा है शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से, जो बीते तीन दिनों से मेला क्षेत्र में धरने पर बैठे हैं और अब उन्हें मेला प्रशासन की ओर से एक औपचारिक नोटिस थमा दिया गया है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पारंपरिक पालकी यात्रा के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे। इसी दौरान प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण का हवाला देते हुए उनकी पालकी यात्रा को बीच में ही रोक दिया।
यहीं से मामला गरमा गया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे धार्मिक परंपराओं और संतों के सम्मान के खिलाफ बताते हुए संगम स्नान से इनकार कर दिया और धरने पर बैठ गए। उनके समर्थकों का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक रोक नहीं थी, बल्कि संतों के साथ किए गए व्यवहार ने उन्हें आहत किया है।
नोटिस में क्या कहा गया?
माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को जारी नोटिस में उनसे 24 घंटे के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा है कि वे किस आधार पर स्वयं को “शंकराचार्य” कह रहे हैं।
प्रशासन का तर्क है कि जब तक किसी पीठ पर शंकराचार्य की औपचारिक नियुक्ति (पट्टाभिषेक) नहीं होती और अदालत या परंपरागत संस्थाओं से मान्यता नहीं मिलती, तब तक किसी व्यक्ति द्वारा इस पदवी का उपयोग करना विवादित हो सकता है।
यानी अब विवाद केवल संगम स्नान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे-सीधे शंकराचार्य पद की वैधता पर आ टिका है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष
धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने साफ शब्दों में कहा है कि
“हम शंकराचार्य हैं या नहीं, यह कोई प्रशासन या सरकार तय नहीं कर सकती।”
उनका कहना है कि उनका पद धार्मिक परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ा है, न कि किसी सरकारी अनुमति से। वे यह भी कह चुके हैं कि जब तक उनके साथ हुए व्यवहार पर प्रशासन माफी नहीं मांगता और सम्मानपूर्वक व्यवहार नहीं करता, तब तक वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे।
राजनीति भी कूदी मैदान में
इस पूरे विवाद ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बात कर उनका समर्थन किया है। वहीं अन्य दलों के नेताओं और सामाजिक संगठनों ने भी प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
कुछ नेताओं ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा है, तो कुछ ने इसे केवल सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा मामला बताया है।
प्रशासन का क्या कहना है?
प्रशासन का पक्ष है कि यह कार्रवाई पूरी तरह व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी थी, न कि किसी संत या धर्म विशेष के अपमान से। उनका कहना है कि मेला क्षेत्र में लाखों श्रद्धालु मौजूद होते हैं और किसी भी तरह की विशेष छूट कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन सकती है।
साथ ही, “शंकराचार्य” की उपाधि को लेकर नोटिस को वे एक कानूनी और प्रक्रियात्मक सवाल बता रहे हैं, न कि धार्मिक हस्तक्षेप।
अब आगे क्या?
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस नोटिस का क्या जवाब देते हैं।
उनका जवाब तय करेगा कि मामला शांत होगा या और ज्यादा तूल पकड़ेगा।
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