मध्यप्रदेश में सहकारिता विभाग के नियम और गेहूं खरीदी की तारीखों के बीच फंसे किसान अब भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि जो किसान समय पर अपना कर्ज चुकाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भी तकनीकी खामियों और नियमों के कारण अतिरिक्त ब्याज का बोझ उठाना पड़ रहा है।
भोपाल में कांग्रेस सेवादल के सत्याग्रह में शामिल बैरसिया के ललोई गांव के किसान ओमप्रकाश शर्मा की कहानी इस समस्या की सच्चाई सामने लाती है।
15 दिन में 5 हजार से 12 हजार बना ब्याज
ओमप्रकाश शर्मा ने बताया कि उन्होंने ललोई सहकारी समिति से 2 लाख रुपए का किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) लोन लिया था। उन्हें कुल 2 लाख 5 हजार रुपए चुकाने थे, जिसमें से 5 हजार रुपए पहले से ही सोसाइटी में जमा थे।
उन्होंने 2 तारीख को 2 लाख 300 रुपए का चेक जमा किया, जो 24 तारीख को खाते में क्लियर भी हो गया। इसके बावजूद उन पर ब्याज लगा दिया गया।
ओमप्रकाश के मुताबिक, “मेरी सिर्फ इतनी गलती थी कि मैं 5 हजार रुपए का वाउचर नहीं भर पाया, जबकि पैसे पहले से जमा थे। इसके बावजूद सोसाइटी ने उसी रकम पर 12,194 रुपए का ब्याज लगा दिया। सिर्फ 15 दिनों में इतना बड़ा ब्याज वसूल लिया गया।”
गेहूं नहीं बिका, फिर कैसे चुकाएं कर्ज?
ओमप्रकाश ने कहा कि किसानों की आय का मुख्य जरिया खेती है। जब तक फसल नहीं बिकती, तब तक कर्ज चुकाना संभव नहीं होता।
उन्होंने सवाल उठाया, “सरकार ने 31 मार्च को कर्ज चुकाने की आखिरी तारीख तय कर दी, लेकिन गेहूं की खरीदी 9 अप्रैल से शुरू हुई। ऐसे में किसान पैसे कहां से लाएं?”
आधे किसान बने डिफॉल्टर
किसानों का कहना है कि मजबूरी में उन्होंने दूसरों से उधार लेकर कर्ज चुकाया, लेकिन समय पर गेहूं की खरीदी न होने के कारण प्रदेश के करीब 50% किसान डिफॉल्टर हो गए।
एक तरफ फसल की खरीदी में देरी और दूसरी तरफ ब्याज का दबाव—इन दोनों के बीच किसान पूरी तरह पिसता नजर आ रहा है।
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