सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला (Sabarimala) मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान इस बार सिर्फ कानूनी बहस ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक राय पर भी तीखी टिप्पणियाँ देखने को मिलीं। सुनवाई के दौरान जजों ने साफ संदेश दिया कि अदालतें अफवाहों या व्यक्तिगत विचारों पर नहीं, बल्कि सिर्फ तथ्यों और कानून पर ही फैसला देती हैं।
“WhatsApp University” पर कोर्ट का साफ संदेश
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने बेहद स्पष्ट और सख्त लहजे में कहा कि अदालत में “WhatsApp University” से आई किसी भी जानकारी का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का आधार केवल प्रमाण और कानूनी तथ्यों पर टिका होता है, न कि सोशल मीडिया पर फैली अपुष्ट जानकारियों पर।
उनकी यह टिप्पणी उस समय आई जब बहस के दौरान अलग-अलग दावों और चर्चाओं का हवाला दिया जा रहा था।
शशि थरूर के लेख पर CJI की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कांग्रेस सांसद शशि थरूर के एक लेख का भी जिक्र हुआ। इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने साफ किया कि किसी भी लेखक का लेख केवल उसका व्यक्तिगत दृष्टिकोण होता है। उसे अदालत के फैसले या कानूनी व्याख्या का आधार नहीं माना जा सकता।
CJI की यह टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि अदालत में केवल संविधान और कानून की व्याख्या ही अंतिम होती है, न कि किसी व्यक्ति की राय या मीडिया में प्रकाशित विचार।
सबरीमाला मामला क्यों बना हुआ है चर्चा में?
Sabarimala मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर यह मामला लंबे समय से देश में चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है। यह मामला धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक समानता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर बेहद संवेदनशील माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसला दिया था, लेकिन इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल होने के कारण यह मामला फिर से न्यायिक प्रक्रिया में है।
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