भोपाल: स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के योगदान का उल्लेख किए जाने के बाद भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का नाम नहीं लिए जाने पर सवाल उठाए हैं। मसूद ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर कहा कि देश की आजादी की लड़ाई किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि सभी वर्गों के लोगों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम थी।
मसूद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा के दौरान मुस्लिम सेनानियों का उल्लेख नहीं होना अफसोसजनक है। उन्होंने प्रधानमंत्री से इस मामले पर देश से माफी मांगने की मांग भी की है।
‘मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम भी मिलेंगे’
अपने ज्ञापन में आरिफ मसूद ने कहा कि प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के योगदान का उल्लेख किया, लेकिन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र नहीं किया।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री यदि इंडिया गेट स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल या अंडमान-निकोबार की सेलुलर जेल की दीवारों पर दर्ज नाम देखें तो उन्हें मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम भी मिलेंगे।
मसूद ने दावा किया कि 1757 से 1947 तक चले आजादी के संघर्ष से जुड़े दस्तावेजों में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
मजनू शाह फकीर और 1857 के विद्रोह का दिया उदाहरण
विधायक ने अपने ज्ञापन में बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में वर्णित फकीर एवं संन्यासी विद्रोह का उल्लेख किया। उन्होंने मजनू शाह फकीर और उनके साथियों को अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रमुख नामों में बताया।
मसूद के अनुसार, मजनू शाह के बाद मूसा शाह, चिराग अली और नूरुल मोहम्मद ने भी इस आंदोलन को आगे बढ़ाया।
उन्होंने 1857 के विद्रोह का जिक्र करते हुए अहमदुल्ला शाह मदरासी के योगदान का भी उल्लेख किया। मसूद ने कहा कि उन्होंने दिल्ली, पटना, फैजाबाद और कलकत्ता समेत कई क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन को मजबूत करने में भूमिका निभाई थी।
अंग्रेजों की कार्रवाई का भी किया जिक्र
ज्ञापन में मसूद ने 1857 के दौरान मुस्लिम उलेमा और अन्य लोगों पर अंग्रेजों की कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि विद्रोह को दबाने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को बिना मुकदमे के फांसी दी गई थी।
उन्होंने अपने दावों के समर्थन में विभिन्न ऐतिहासिक पुस्तकों और लेखकों के संदर्भ दिए हैं।
‘आजादी के योगदान को किसी एक समुदाय तक सीमित न करें’
आरिफ मसूद ने कहा कि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को किसी एक समुदाय तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों ने योगदान दिया था। ऐसे में सभी स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को समान सम्मान मिलना चाहिए।
मसूद ने प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर कहा कि मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख नहीं किए जाने से उन लोगों के योगदान की तौहीन हुई है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री से इस पर माफी मांगने की मांग की है।


