भारत की आज़ादी की लड़ाई में जहां महात्मा गांधी, भगत सिंह और रानी लक्ष्मीबाई जैसे बड़े नाम चर्चित रहे, वहीं कई ऐसे वीर-वीरांगनाएं भी थीं जिनका योगदान इतिहास के पन्नों में कम लिखा गया। Bishni Devi Shah इन्हीं में से एक हैं, जिन्हें Uttarakhand की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी (First Woman Freedom Fighter) के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपने साहस, त्याग और अदम्य इच्छाशक्ति से पहाड़ के कोने-कोने में आज़ादी की अलख जगाई।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष की शुरुआत
Bishni Devi Shah का जन्म उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में हुआ। बचपन से ही उनमें न्याय और देशभक्ति की भावना थी। पहाड़ी गांव में पली-बढ़ी होने के बावजूद उन्होंने समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लिया।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
- Jungle Satyagraha और Namak Satyagraha जैसे आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी।
- पहाड़ी क्षेत्रों की महिलाओं को संगठित कर आंदोलन में जोड़ना।
- ब्रिटिश अधिकारियों के सामने बिना डर आवाज़ उठाना और कई बार जेल जाना।
- ग्रामीण इलाकों में जनसभाएं और जागरूकता अभियान चलाकर आज़ादी का संदेश फैलाना।
महिलाओं को आंदोलन में शामिल करने की प्रेरणा
उस दौर में महिलाओं की स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी बेहद कम थी, लेकिन Bishni Devi Shah ने गांव-गांव जाकर उन्हें आंदोलन में जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यह साबित किया कि आज़ादी की लड़ाई में महिला और पुरुष का योगदान समान है।
त्याग और बलिदान
- निजी सुख-सुविधाओं और परिवारिक जीवन का त्याग कर देशसेवा को प्राथमिकता दी।
- ब्रिटिश शासन के दमन, जेल की यातनाएं और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद हिम्मत नहीं हारी।
- उनका जीवन संघर्ष और देशभक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
विरासत और सम्मान
आज Bishni Devi Shah को Uttarakhand की First Woman Freedom Fighter के रूप में सम्मानित किया जाता है। हालांकि उनका नाम मुख्यधारा के इतिहास में कम दर्ज है, लेकिन स्थानीय इतिहासकार और समाजसेवी उनके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयास कर रहे हैं।
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