मुंबई महानगरपालिका (BMC) के मेयर चुनाव ने एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति को गरमा दिया है। Mumbai Mayor Election अब सिर्फ एक पद का चुनाव नहीं रह गया, बल्कि यह भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच शक्ति संतुलन की असली परीक्षा बन चुका है। ताज़ा घटनाक्रम ने पूरे राजनीतिक माहौल में नया मोड़ ला दिया है।
शिवसेना की 1 साल की मांग ने बढ़ाया तनाव
महायुति गठबंधन में शामिल शिवसेना (शिंदे गुट) ने मेयर पद को लेकर बड़ा दावा ठोक दिया है। पार्टी ने साफ तौर पर कहा है कि मुंबई मेयर का पद कम से कम 1 साल के लिए शिवसेना को दिया जाए। इसके पीछे पार्टी का तर्क है कि सरकार में साझेदारी होने के बावजूद अगर बीएमसी जैसे अहम निकाय में प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो यह कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए निराशाजनक संदेश होगा।
सूत्रों की मानें तो शिवसेना 50-50 या ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर भी बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन फिलहाल उसकी प्राथमिक मांग 1 साल का कार्यकाल है।
BJP का सख्त रुख, पार्षदों को साफ निर्देश
दूसरी तरफ, BJP इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पूरी तरह अलर्ट मोड में है। पार्टी ने अपने सभी पार्षदों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे मुंबई में ही रहें और किसी भी तरह की अफवाह, दबाव या बाहरी संपर्क से दूर रहें। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राजनीतिक गलियारों में हॉर्स ट्रेडिंग की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
भाजपा का मानना है कि वह बीएमसी में सबसे बड़ी पार्टी है और मेयर पद पर उसका दावा स्वाभाविक है। हालांकि, संख्याबल के गणित में उसे शिवसेना (शिंदे गुट) के समर्थन की जरूरत भी है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है।
होटल पॉलिटिक्स और बढ़ती हलचल
राजनीतिक सरगर्मी के बीच खबर है कि शिवसेना (शिंदे गुट) ने अपने पार्षदों को एक होटल में ठहराया है, ताकि किसी भी तरह की टूट-फूट या क्रॉस वोटिंग को रोका जा सके। विपक्ष इस कदम को लेकर सरकार पर निशाना साध रहा है और इसे “होटल पॉलिटिक्स” बता रहा है।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भाजपा और शिवसेना के बीच कोई बीच का रास्ता निकलता है या फिर यह खींचतान किसी बड़े राजनीतिक फैसले की ओर जाती है। Mumbai Mayor Election 2026 न सिर्फ बीएमसी की दिशा तय करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि महायुति के भीतर तालमेल कितना मजबूत है।
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