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Greenland

Greenland समझौता और Trump का टैरिफ फैसला Europe Relations पर असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यूरोपीय देशों पर लगाई जाने वाली 10% टैरिफ (Tariff) की धमकी वापस ले ली है। ये टैरिफ 1 फरवरी से लागू होने वाला था और इसे भविष्य में 25% तक बढ़ाने की चेतावनी भी दी गई थी। लेकिन अब ट्रंप ने इसे रद्द कर दिया है, और इसकी वजह उन्होंने NATO और Greenland पर एक समझौते का फ्रेमवर्क (Framework) बताया। किन देशों पर था टैरिफ खतरा? टैरिफ की योजना के तहत कुल 8 यूरोपीय देश निशाने पर थे: ट्रंप के अनुसार, NATO महासचिव मार्क रुट्टे के साथ बातचीत के बाद ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र पर भविष्य का फ्रेमवर्क तय हुआ। इसी के आधार पर उन्होंने टैरिफ को वापस लेने का निर्णय लिया। Greenland और Arctic की स्ट्रैटेजिक अहमियत ग्रीनलैंड को ट्रंप रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने इसे अमेरिका के नियंत्रण में लाने की बात भी कही थी। इस प्रस्ताव ने यूरोपीय देशों में विरोध उत्पन्न किया था। टैरिफ की धमकी ने अमेरिकी-यूरोपीय संबंधों में तनाव पैदा किया और वैश्विक मार्केट में हलचल मचाई। हालांकि, फ्रेमवर्क की पूरी डिटेल अभी सार्वजनिक नहीं हुई है और कुछ यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप के दावों पर सवाल उठाए हैं। फिर भी, टैरिफ वापस लेने का कदम दोनों पक्षों के बीच संबंध सुधारने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। Human Angle: क्यों यह फैसला महत्वपूर्ण है? यह सिर्फ राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर भी असर डालता है। टैरिफ से महंगाई बढ़ सकती थी और व्यापारिक रिश्तों में तनाव भी बढ़ सकता था। इसे वापस लेने से यूरोप और अमेरिका के बीच भरोसे का माहौल बना है और आर्थिक स्थिरता के संकेत भी मिल रहे हैं। संक्षेप में, ट्रंप ने ग्रीनलैंड विवाद को सुलझाने का दावा करते हुए यूरोपीय देशों पर टैरिफ योजना वापस ली। उन्होंने कहा कि NATO और अमेरिका के बीच भविष्य के समझौते का फ्रेमवर्क तैयार है। यह कदम दोनों पक्षों के बीच संबंधों में सुधार और भरोसा बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Trump

Trump Air Force One में तकनीकी खराबी Davos जाते समय बीच उड़ान से लौटे राष्ट्रपति ट्रम्प

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Trump) जब स्विट्ज़रलैंड के दावोस में होने वाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum – WEF) में हिस्सा लेने के लिए रवाना हुए, तब उनकी यात्रा अचानक सुर्खियों में आ गई। राष्ट्रपति का विशेष विमान एयरफोर्स-वन टेकऑफ़ के कुछ ही देर बाद तकनीकी खराबी के कारण बीच उड़ान से वापस वाशिंगटन लौट आया। क्या थी तकनीकी खराबी जानकारी के मुताबिक, उड़ान के दौरान विमान में एक “मामूली इलेक्ट्रिकल समस्या” सामने आई। पायलटों और तकनीकी टीम ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए जोखिम न लेने का फैसला किया और विमान को तुरंत मैरीलैंड स्थित जॉइंट बेस एंड्रयूज़ की ओर मोड़ दिया। कुछ रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि प्रेस केबिन की लाइट्स थोड़ी देर के लिए बंद हो गई थीं, जिससे यात्रियों को अंदाजा हो गया था कि कुछ गड़बड़ है। व्हाइट हाउस का बयान व्हाइट हाउस ने साफ किया कि यह कोई गंभीर संकट नहीं था, बल्कि एक एहतियाती कदम था। राष्ट्रपति ट्रम्प और उनका दल सुरक्षित रूप से बेस पर उतर गए। इसके बाद उन्हें दूसरे सरकारी विमान में स्थानांतरित किया गया ताकि वे दावोस की यात्रा जारी रख सकें। दावोस दौरे का महत्व ट्रम्प का दावोस दौरा काफ़ी अहम माना जा रहा है। वहां वे वैश्विक नेताओं और उद्योगपतियों से मुलाकात कर आर्थिक मुद्दों, निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर चर्चा करने वाले हैं। इस तकनीकी रुकावट से उनके कार्यक्रम में थोड़ी देरी जरूर हुई, लेकिन दौरा रद्द नहीं किया गया। पुराने विमान, नए सवाल गौरतलब है कि मौजूदा एयरफोर्स-वन विमान लगभग चार दशक पुराने हैं। पहले भी इनके रखरखाव और भरोसेमंद संचालन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस ताज़ा घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि नए राष्ट्रपति विमानों की जरूरत कितनी जरूरी हो चुकी है। Trump का एयरफोर्स-वन तकनीकी खराबी के कारण बीच उड़ान से लौटना भले ही एक छोटी घटना लगे, लेकिन इससे राष्ट्रपति सुरक्षा, विमान की उम्र और आधुनिक तकनीक की जरूरत जैसे बड़े मुद्दे फिर चर्चा में आ गए हैं। राहत की बात यह रही कि सब कुछ सुरक्षित रहा और राष्ट्रपति अपनी दावोस यात्रा दूसरे विमान से जारी रखने में सफल रहे। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Asim Munir

Asim Munir Statement Islamic Countries में Pakistan को खास दर्जा मिलने का दावा

पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर (Asim Munir) का हालिया बयान इन दिनों न केवल पाकिस्तान बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान अपने गठन के “मूल मकसद” को पूरा करने के बेहद करीब पहुंच चुका है और अब उसकी पहचान इस्लामी देशों (Islamic World) के बीच पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो रही है। इस बयान के बाद कई सवाल उठ रहे हैं — क्या पाकिस्तान सच में अपनी दिशा बदल रहा है? और आखिर वह “मकसद” क्या है जिसकी बात आसिम मुनीर कर रहे हैं? पाकिस्तान का “मकसद” क्या बताया आसिम मुनीर ने? अपने संबोधन में आसिम मुनीर (Asim Munir) ने साफ तौर पर कहा किपाकिस्तान की नींव इस्लाम के नाम पर रखी गई थी, और अब देश उस सोच को वास्तविक रूप देने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। उनका मानना है कि आज पाकिस्तान को मुस्लिम देशों के बीच जो सम्मान और स्थान मिल रहा है, वह यूं ही नहीं है, बल्कि यह वर्षों की रणनीति और संघर्ष का नतीजा है। उन्होंने इसे “अल्लाह की मेहरबानी” भी बताया। Islamic World में पाकिस्तान की बढ़ती अहमियत Asim Munir के बयान के पीछे हालिया घटनाक्रम भी अहम माने जा रहे हैं, जैसे: इन सबको मिलाकर देखा जाए तो पाकिस्तान खुद को अब सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि Muslim World का एक प्रभावशाली प्रतिनिधि के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है। बयान का समय क्यों है खास? यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान: ऐसे में यह बयान केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राजनीतिक और रणनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। समर्थन और विरोध – दोनों तरफ से प्रतिक्रियाएं जहां एक ओर पाकिस्तान में कुछ लोग आसिम मुनीर के बयान को“राष्ट्रीय आत्मविश्वास बढ़ाने वाला” मान रहे हैं,वहीं आलोचकों का कहना है कि: भारत और दक्षिण एशिया पर असर? Asim Munir का यह बयान भारत और पड़ोसी देशों के लिए भी अहम माना जा रहा है।विशेषज्ञों के अनुसार: निष्कर्ष: सिर्फ बयान या आने वाले बदलाव की झलक? Asim Munir का यह बयान केवल एक भाषण नहीं, बल्कि पाकिस्तान की भविष्य की सोच और रणनीति की झलक देता है।क्या पाकिस्तान सच में अपने “मकसद” के करीब है या यह सिर्फ एक राजनीतिक-धार्मिक नैरेटिव है — इसका जवाब आने वाला समय देगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Greenland

Greenland क्यों बना Global Hotspot आर्कटिक की बर्फ पिघलने से बढ़ा खतरा

दुनिया का ध्यान अब ग्रीनलैंड (Greenland) की ओर तेजी से बढ़ रहा है। आर्कटिक (Arctic) की बर्फ पिघल रही है और इस छोटे से बर्फीले इलाके ने वैश्विक राजनीति और आर्थिक रणनीति में अपनी जगह बना ली है। कभी शांत, दूर-दराज और उपेक्षित माना जाने वाला यह क्षेत्र आज अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के लिए रणनीतिक और आर्थिक मोर्चा बन गया है। बर्फ पिघलना और नए अवसर ग्रीनलैंड की बर्फ के तेज़ी से पिघलने का असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। इससे: खनिजों का खजाना: Rare Minerals ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ एलिमेंट्स, लिथियम, कोबाल्ट, निकल और यूरेनियम जैसे खनिज पाए जाते हैं। ये आधुनिक दुनिया की तकनीक और ग्रीन एनर्जी (Green Energy) के लिए जीवनदायिनी हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल, मिसाइल सिस्टम और सेमीकंडक्टर उद्योग इन खनिजों पर निर्भर हैं। यही वजह है कि बड़ी शक्तियाँ इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती हैं। महाशक्तियों की बढ़ती दिलचस्पी अमेरिका (USA) अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड सिर्फ डेनमार्क का हिस्सा नहीं, बल्कि उत्तरी अमेरिका की सुरक्षा और आर्कटिक में रणनीतिक ताकत का आधार है। थ्यूल स्पेस बेस (Thule Space Base) जैसे सैन्य अड्डे अमेरिका की पकड़ मजबूत करते हैं। रूस (Russia) रूस ने आर्कटिक में नए सैन्य ठिकाने, परमाणु पनडुब्बियाँ और रडार सिस्टम स्थापित किए हैं। ग्रीनलैंड पर किसी अन्य देश का प्रभाव रूस के लिए चुनौतीपूर्ण है। चीन (China) चीन खुद को “Near-Arctic State” कहता है और निवेश, खनिज दोहन और इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहता है। बढ़ता सैन्य और सुरक्षा खतरा आर्कटिक अब ‘नो-मैन ज़ोन’ नहीं रहा। बर्फ पिघलने से मिसाइल और सैन्य गतिविधियों के लिए सबसे छोटा रास्ता खुल गया है। बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ किसी भी गलती या मिसअंडरस्टैंडिंग से वैश्विक संघर्ष का कारण बन सकती हैं। ग्रीनलैंड के सामने चुनौतियाँ ग्रीनलैंड की आबादी कम है, लेकिन संसाधन बहुत हैं। आर्थिक विकास और विदेशी निवेश की ज़रूरत है, लेकिन महाशक्तियों के मोहरे में बदलने का डर भी है। इसके अलावा स्थानीय आबादी और पर्यावरण पर खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फीला क्षेत्र नहीं रह गया है। यह वैश्विक राजनीति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी वर्चस्व की चाबी बन चुका है। जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघलेगी, ग्रीनलैंड की महत्वता और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा और तेज़ होगी। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Tariff

Trump Greenland Threat ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी से बढ़ा वैश्विक तनाव, कनाडा-डेनमार्क आमने-सामने

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Trump) एक बार फिर अपने बयानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। इस बार मामला दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड (Greenland) का है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर दूसरे देश अमेरिका के ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की योजना का समर्थन नहीं करते, तो उन पर भारी टैरिफ (Tariff Threat) लगाए जा सकते हैं। उनके इस बयान ने वैश्विक राजनीति में नई बहस और चिंता को जन्म दे दिया है। ट्रंप की धमकी और अमेरिका का तर्क Trump का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) के लिए बेहद अहम है। उन्होंने आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका अपने हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। ट्रंप के मुताबिक, टैरिफ लगाना उन देशों पर दबाव बनाने का एक तरीका हो सकता है जो अमेरिका की इस रणनीति के रास्ते में खड़े हैं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड का सख्त रुख Trump के बयान के बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड की प्रतिक्रिया भी उतनी ही साफ और सख्त रही। डेनमार्क ने दो टूक कहा कि ग्रीनलैंड उसकी संप्रभुता के अंतर्गत आता है और किसी भी तरह की धमकी या सौदेबाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। वहीं ग्रीनलैंड के स्थानीय नेताओं ने भावनात्मक लहजे में कहा कि यह द्वीप “बिकाऊ नहीं है” और वहां के लोग अपने भविष्य का फैसला खुद करेंगे। कनाडा और यूरोपीय देशों का समर्थन इस पूरे विवाद में कनाडा भी खुलकर सामने आया है। कनाडाई प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका देश हर हाल में ग्रीनलैंड के साथ खड़ा है और उसकी संप्रभुता का सम्मान करता है। इसके अलावा कई यूरोपीय देशों और नाटो सहयोगियों ने भी ट्रंप की टैरिफ धमकी को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि किसी भी क्षेत्र पर जबरन कब्जे की सोच आधुनिक विश्व व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। क्यों इतना अहम है ग्रीनलैंड? ग्रीनलैंड केवल बर्फ से ढका एक द्वीप नहीं है। यह इलाका के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहां नए रास्ते और संसाधन सामने आ रहे हैं, जिससे बड़ी ताकतों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। ग्रीनलैंड को लेकर Trump की टैरिफ धमकी ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति में शक्ति और हितों की टकराहट कितनी गहरी हो सकती है। जहां अमेरिका अपने सुरक्षा हितों की बात कर रहा है, वहीं ग्रीनलैंड, डेनमार्क और उनके समर्थक देश संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर जोर दे रहे हैं। आने वाले समय में यह विवाद किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Venezuela

US–Venezuela Relations मचाडो का भावनात्मक कदम, Trump को दिया Nobel Prize पदक

Venezuela Politics से जुड़ी एक बड़ी और भावनात्मक खबर सामने आई है। वेनेज़ुएला की चर्चित विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो (Maria Corina Machado) ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) को अपने Nobel Peace Prize का पदक प्रतीकात्मक रूप से सौंपा है। इस मुलाकात के बाद मचाडो ने कहा कि उन्हें अब “अमेरिकी राष्ट्रपति पर भरोसा है”। यह मुलाकात वॉशिंगटन में हुई, जिसने न सिर्फ वेनेज़ुएला की राजनीति बल्कि US–Venezuela Relations को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। Nobel Prize देना प्रतीकात्मक, नियम नहीं बदले मारिया कोरिना मचाडो को हाल ही में Venezuela में लोकतंत्र, मानवाधिकार और तानाशाही के खिलाफ संघर्ष के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। ट्रंप को दिया गया पदक केवल एक प्रतीकात्मक सम्मान है। नोबेल समिति पहले ही साफ कर चुकी है कि नोबेल पुरस्कार किसी और को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता और आधिकारिक तौर पर यह सम्मान मचाडो के नाम पर ही रहेगा। President बनने की चर्चा थी, लेकिन Trump का खुला समर्थन नहीं पिछले कुछ महीनों से यह चर्चा तेज थी कि मचाडो वेनेज़ुएला (Venezuela) की अगली राष्ट्रपति बन सकती हैं। उन्हें देश के भीतर और बाहर लोकतंत्र समर्थक चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इस मुलाकात के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने उनके राष्ट्रपति बनने का खुलकर समर्थन नहीं किया। ट्रंप ने संकेत दिए कि अमेरिका वेनेज़ुएला में मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए सभी विकल्प खुले रखना चाहता है। इससे साफ है कि अमेरिका की नीति अभी पूरी तरह किसी एक नेता पर केंद्रित नहीं है। बदला हुआ रुख, भरोसे का संदेश दिलचस्प बात यह है कि पहले मचाडो ट्रंप की नीतियों को लेकर सतर्क नजर आती थीं। लेकिन अब उनका बयान बदला हुआ दिखता है। पदक सौंपने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका और ट्रंप वेनेज़ुएला में लोकतंत्र बहाल करने में अहम भूमिका निभाएंगे। उनके इस कदम को कई लोग एक राजनीतिक अपील के तौर पर देख रहे हैं, ताकि अमेरिका का समर्थन उनके आंदोलन को और मजबूती दे सके। Expert View: इसका मतलब क्या है? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम एक कूटनीतिक संदेश है। इससे साफ है कि वेनेज़ुएला की सत्ता को लेकर तस्वीर अभी भी धुंधली बनी हुई है। Trump–Machado Meeting और Nobel Peace Prize का यह प्रतीकात्मक कदम भावनात्मक जरूर है, लेकिन इससे तुरंत कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव होना तय नहीं माना जा रहा। मचाडो को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली है, पर वेनेज़ुएला की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अब भी लंबा और मुश्किल है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Iran

US–Iran Tension Trump Says Killings Stopped, ईरान बोला अब कोई फांसी नहीं

ईरान में चल रहे लंबे और उग्र सरकार-विरोधी प्रदर्शनों (Iran Protests) के बीच अमेरिका और ईरान के बयानों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के एक बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या ईरान ने वाकई प्रदर्शनकारियों पर सख्ती कम कर दी है। दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्री ने भी साफ शब्दों में कहा है कि अब किसी तरह की फांसी (Execution / Hanging) की कोई योजना नहीं है। ट्रंप का बयान: “हत्या रुकी, अब फांसी नहीं” डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें “दूसरी तरफ से भरोसेमंद जानकारी” मिली है कि ईरान में प्रदर्शनकारियों की हत्याएं अब रुक गई हैं और सरकार ने फांसी देने की योजना भी टाल दी है। ट्रंप के अनुसार, हालात पहले जैसे नहीं हैं और तेहरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव का असर दिख रहा है।हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और आगे के कदम हालात देखकर तय किए जाएंगे। ईरान का पक्ष: “फांसी पर कोई विचार नहीं” ट्रंप के दावे के बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आराघची का बयान सामने आया। उन्होंने कहा कि “फांसी का कोई प्लान नहीं है और यह मुद्दा चर्चा के दायरे से बाहर है”। उनका कहना था कि ईरान अपने आंतरिक मामलों को कानून के दायरे में संभाल रहा है और बाहरी दबाव में फैसले नहीं लेता। प्रदर्शन की पृष्ठभूमि: क्यों भड़का गुस्सा? ईरान में पिछले कई हफ्तों से महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक असंतोष को लेकर बड़े-पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हजारों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुई हैं।कुछ मामलों में फांसी की सजा की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी थी, जिसके बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। अंतरराष्ट्रीय दबाव और बदला माहौल अमेरिका की चेतावनियों, संयुक्त राष्ट्र में उठी आवाज और वैश्विक मीडिया कवरेज के बाद ईरान पर दबाव साफ दिखाई दिया। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के बयान और ईरानी विदेश मंत्री की प्रतिक्रिया इसी दबाव का नतीजा हो सकते हैं।हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स यह भी कहती हैं कि ईरान में अब भी कई प्रदर्शनकारी हिरासत में हैं और उनके मुकदमों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। आगे क्या? फिलहाल, दोनों देशों के बयानों से यह संकेत जरूर मिलता है कि तनाव कुछ हद तक कम हुआ है, लेकिन ज़मीनी हकीकत को लेकर सवाल अब भी बने हुए हैं। क्या वास्तव में हिंसा थमी है या यह सिर्फ कूटनीतिक बयानबाजी है—इसका जवाब आने वाले दिनों में सामने आएगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Thailand

Thailand Train Accident चलती ट्रेन पर गिरा Heavy Crane

Nakhon Ratchasima, Thailand: 14 जनवरी 2026 की सुबह थाईलैंड के नाखोन राचसीमा प्रांत में एक भयानक रेल हादसा हुआ। यहां चलती ट्रेन पर हाई-स्पीड रेल निर्माण साइट की भारी क्रेन (Heavy Crane) गिर गई, जिससे 22 लोगों की मौत और 30 से अधिक यात्रियों के घायल होने की खबर है। घटना के समय ट्रेन बैंकॉक से उबोन राचथानी की ओर जा रही थी, जब निर्माण स्थल की क्रेन अचानक ट्रेन पर गिर पड़ी। इसके कारण ट्रेन के कई डिब्बे ट्रैक से उतर गए और कुछ में आग लग गई। हादसे की यह तस्वीर न सिर्फ यात्रियों के लिए डरावनी थी, बल्कि स्थानीय प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई। हादसे की वजह और शुरुआती जानकारी अधिकारियों ने बताया कि क्रेन गिरने का अभी तक स्पष्ट कारण सामने नहीं आया है, लेकिन शुरुआती अनुमान यह है कि निर्माण क्षेत्र की सुरक्षा मानकों में कोई चूक हुई हो सकती है। ट्रेन हादसे के तुरंत बाद राहत और बचाव दल (Rescue Team) मौके पर पहुंच गए और घायल यात्रियों को नज़दीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। प्रभावित लोगों की स्थिति घायलों में कई की स्थिति गंभीर बताई जा रही है। मृतकों के परिवारों को स्थानीय प्रशासन (Local Authorities) ने तत्काल सहायता देने की घोषणा की है। हादसे ने वहां के लोगों में गहरी शोक और चिंता की लहर पैदा कर दी है। सुरक्षा और भविष्य की तैयारी थाईलैंड सरकार ने हादसे के कारणों की पूरी जांच (Investigation) शुरू कर दी है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि रेलवे और निर्माण क्षेत्रों में सुरक्षा नियमों को और कड़ा किया जाएगा, ताकि भविष्य में ऐसे हादसे न हों। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Iran

Iran vs US फांसी की आशंका के बीच Trump Warning, Tehran ने किया पलटवार

ईरान (Iran) इस समय अपने सबसे गंभीर आंतरिक संकटों में से एक से गुजर रहा है। देशभर में सरकार-विरोधी प्रदर्शन तेज़ हैं, सड़कों पर लोग अपने हक़ और आज़ादी की आवाज़ उठा रहे हैं, और दूसरी ओर सरकार सख़्ती से इन्हें दबाने की कोशिश कर रही है। इसी बीच एक प्रदर्शनकारी को सरेआम फांसी दिए जाने की खबरों ने दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी है। क्या हो रहा है ईरान में? पिछले कुछ हफ्तों से ईरान के कई बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। आर्थिक परेशानियाँ, राजनीतिक असंतोष और नागरिक आज़ादियों से जुड़े मुद्दों ने लोगों को सड़कों पर ला दिया है। इन प्रदर्शनों के दौरान झड़पें हुई हैं, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियाँ हुईं और सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों लोगों की मौत की रिपोर्टें सामने आई हैं।इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर भी कई इलाकों में पाबंदियाँ लगाई गईं ताकि सूचनाओं का प्रसार रोका जा सके। फांसी की खबर और वैश्विक चिंता इन सबके बीच एक युवा प्रदर्शनकारी को मौत की सज़ा दिए जाने और उसे सार्वजनिक रूप से फांसी दिए जाने की आशंका ने माहौल को और विस्फोटक बना दिया है। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे दमन की नई और खतरनाक मिसाल बताया है। Trump Warning: “कड़ी कार्रवाई होगी” अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ कहा कि अगर ईरान सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को फांसी देती है या हिंसा बढ़ाती है, तो अमेरिका “बहुत कड़ी कार्रवाई” करेगा।ट्रम्प ने ईरान के लोगों से विरोध जारी रखने की अपील भी की और यह संदेश दिया कि दुनिया उनकी स्थिति को देख रही है। Tehran का पलटवार ट्रम्प की चेतावनी पर तेहरान ने भी कड़ा रुख अपनाया। ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों ने ट्रम्प और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर ही हिंसा भड़काने का आरोप लगाते हुए उन्हें “मुख्य हत्यारा” करार दिया।ईरान का कहना है कि बाहरी ताकतें देश के आंतरिक मामलों में दखल देकर अस्थिरता पैदा कर रही हैं। क्यों बढ़ रहा है अंतरराष्ट्रीय तनाव? Iran के भीतर जो शुरू हुआ था, वह अब वैश्विक राजनीति का मुद्दा बन गया है। अमेरिका, यूरोप और कई मानवाधिकार संगठन सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वह मौत की सज़ा और हिंसा बंद करे। दूसरी ओर ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बता रहा है। आम लोगों की कहानी इस पूरे संघर्ष के बीच सबसे ज़्यादा असर आम ईरानियों पर पड़ रहा है—वे परिवार जो अपने बच्चों को खो चुके हैं, वे युवा जो बेहतर भविष्य की उम्मीद में सड़कों पर उतरे थे, और वे लोग जो हर दिन डर के साए में जी रहे हैं।दुनिया के लिए यह सिर्फ़ एक राजनीतिक टकराव हो सकता है, लेकिन ईरान के लोगों के लिए यह ज़िंदगी और आज़ादी की लड़ाई बन चुकी है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Trump

Trump Tariff Policy ईरान से कारोबार किया तो अमेरिका में 25% टैक्स तय

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति और व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। उन्होंने ऐलान किया है कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार करेगा, उस देश पर अमेरिका के साथ होने वाले पूरे व्यापार पर 25% टैरिफ लगाया जाएगा। ट्रंप ने इसे “तुरंत लागू और अंतिम फैसला” बताया है। यह घोषणा सोशल मीडिया के ज़रिए आई, लेकिन असर पूरी दुनिया के बाज़ारों और कूटनीतिक रिश्तों पर पड़ता दिख रहा है। क्या है Trump Iran Tariff Policy? सरल शब्दों में कहें तो ट्रंप का कहना है— “अगर कोई देश ईरान से खरीद-फरोख्त करता है, तो उसे अमेरिका से होने वाले हर व्यापार पर 25% अतिरिक्त टैक्स देना होगा।” मतलब यह कि ईरान के साथ तेल, गैस, केमिकल, फूड या किसी भी तरह का कारोबार करने वाले देशों को अमेरिकी बाज़ार में अपने सामान को 25% महंगे शुल्क के साथ बेचना पड़ेगा। यह फैसला क्यों लिया गया? यह कदम ऐसे समय पर आया है जब ईरान में राजनीतिक अशांति और विरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं। अमेरिका लंबे समय से ईरान पर दबाव बनाना चाहता है ताकि उसकी नीतियों में बदलाव आए।ट्रंप की रणनीति साफ दिखती है—ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करना ताकि उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़े। कौन-कौन से देश होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित? ईरान के साथ व्यापार करने वाले कई बड़े देश अब मुश्किल में हैं, जिनमें शामिल हैं: इन देशों को अब दो रास्तों में से एक चुनना होगा—या तो ईरान के साथ व्यापार घटाएँ, या अमेरिका के साथ अपने निर्यात को महंगा होने दें। भारत पर क्या असर पड़ेगा? भारत का ईरान के साथ सीधा तेल आयात पहले से कम है, लेकिन खाद्य सामग्री, रसायन, फार्मा और मशीनरी जैसे कई सेक्टरों में व्यापार अब भी चलता है।अगर भारत ईरान के साथ यह कारोबार जारी रखता है, तो अमेरिका को होने वाला भारतीय निर्यात 25% टैरिफ के कारण महंगा हो सकता है, जिससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा घटेगी। दूसरी ओर, ईरान भारत के लिए रणनीतिक साझेदार भी रहा है—चाहे वह चाबहार पोर्ट हो या मध्य एशिया तक पहुंच का रास्ता। ऐसे में भारत के सामने आर्थिक और कूटनीतिक संतुलन साधने की चुनौती होगी। वैश्विक बाजारों में क्यों मची हलचल? ट्रंप का यह टैरिफ सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है।विशेषज्ञों का मानना है कि इससे: कई देशों के लिए यह स्थिति “या तो अमेरिका, या ईरान” जैसा कठिन चुनाव बन सकती है। कानूनी और व्यावहारिक सवाल हालांकि ट्रंप ने टैरिफ की घोषणा कर दी है, लेकिन इसके कानूनी ढांचे और लागू करने के तरीके अभी पूरी तरह साफ नहीं हैं।क्या यह सभी उत्पादों पर लगेगा?क्या कुछ सेक्टरों को छूट मिलेगी?इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में तय करेंगे कि यह नीति कितनी सख्ती से लागू होती है। Trump Iran Tariff News केवल ईरान की कहानी नहीं है—यह पूरी दुनिया के व्यापारिक रिश्तों को प्रभावित करने वाला फैसला है।अगर यह नीति पूरी ताकत से लागू होती है, तो कई देशों को अपनी विदेश नीति और व्यापार रणनीति दोबारा सोचनी पड़ेगी। दुनिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ आर्थिक फैसले सीधे राजनीति को और राजनीति सीधे आम लोगों की जेब को प्रभावित करती है। अब देखना यह है कि देश इस चुनौती से कैसे निपटते हैं। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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ग्वालियर: साइबर ठगी के पैसों से खरीदा 50 ग्राम का सोने का सिक्का, ज्वेलर्स का बैंक खाता हुआ फ्रीज

ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में साइबर अपराधियों द्वारा ठगी की रकम को वैध बनाने का एक नया तरीका सामने आया है। पुलिस के अनुसार, एक युवक ने सराफा बाजार स्थित ‘गहना जेम्स एंड ज्वेलर्स प्राइवेट लिमिटेड’ से 50 ग्राम का सोने का सिक्का खरीदा और उसका भुगतान कथित तौर पर साइबर ठगी से प्राप्त रकम के जरिए ऑनलाइन किया। बाद में इस लेनदेन के चलते ज्वेलर्स का बैंक खाता भी फ्रीज कर दिया गया। ऑनलाइन ट्रांसफर से किया लाखों रुपये का भुगतान पुलिस के मुताबिक, झांसी रोड स्थित माधव नगर निवासी सराफा कारोबारी अजय मंगल का लश्कर सराफा बाजार में ज्वेलरी शोरूम है। बताया गया कि 4 अप्रैल 2026 को अभिषेक परिहार नाम का युवक शोरूम पहुंचा और 50 ग्राम का सोने का सिक्का खरीदने का सौदा किया। उसने अग्रिम भुगतान के रूप में 1 लाख रुपये NEFT और 10 हजार रुपये IMPS के माध्यम से जमा कराए। अगले दिन, 5 अप्रैल, वह दोबारा शोरूम पहुंचा और 5 लाख रुपये, 1.41 लाख रुपये ऑनलाइन बैंक ट्रांसफर तथा 52,900 रुपये नकद देकर पूरा भुगतान किया। इसके बाद कारोबारी ने जीएसटी का बिल जारी कर सोने का सिक्का उसे सौंप दिया। 20 दिन बाद बैंक खाता हुआ फ्रीज करीब 20 दिन बाद, 24 अप्रैल को ज्वेलर्स का बैंक खाता अचानक होल्ड कर दिया गया। बैंक ने ई-मेल के माध्यम से बताया कि खाते में आई 5.10 लाख रुपये की राशि को नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के निर्देश पर फ्रीज किया गया है। इसके बाद 4 जून को बेंगलुरु साइबर क्राइम पुलिस का नोटिस मिला। नोटिस में बताया गया कि सोने के सिक्के के भुगतान में इस्तेमाल किए गए 5.10 लाख रुपये, बेंगलुरु के एक कारोबारी से हुई 14 करोड़ रुपये की साइबर ठगी का हिस्सा थे। पुलिस के अनुसार, ठगों ने कथित रूप से ठगी की रकम सीधे ज्वेलर्स के खाते में ट्रांसफर कर सोने का सिक्का खरीद लिया। पुलिस ने दर्ज किया मामला मामले की जानकारी मिलने के बाद अजय मंगल ने कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच के दौरान खरीदारी के समय जमा कराए गए आधार कार्ड से पता चला कि आरोपी अभिषेक परिहार बहोड़ापुर थाना क्षेत्र के घोसीपुरा का निवासी है। पुलिस उसकी तलाश में संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है। सीसीटीवी फुटेज नहीं मिले सीएसपी लश्कर किरण अहिरवार ने बताया कि शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर लिया गया है और आरोपी की तलाश जारी है। उन्होंने कहा कि शोरूम का सीसीटीवी बैकअप केवल 15 से 20 दिन तक सुरक्षित रहता है, इसलिए घटना के फुटेज उपलब्ध नहीं हो सके। हालांकि आधार कार्ड के विवरण और साइबर ट्रेल के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

भरतपुर: REET में पास कराने के नाम पर लिए 5 लाख, पैसे वापस मांगने पर ठेकेदार की हत्या; 14 महीने बाद हुआ खुलासा

भरतपुर। राजस्थान के भरतपुर जिले में करीब 14 महीने पहले लापता हुए ठेकेदार प्रहलाद बैरवा हत्याकांड में पुलिस ने बड़ा खुलासा किया है। पुलिस के अनुसार, REET-2021 परीक्षा में प्रहलाद की पत्नी को पास कराने का झांसा देकर 5 लाख रुपये लेने के बाद जब आरोपी रकम लौटाने के दबाव में आए तो उन्होंने प्रहलाद की हत्या कर दी। पुलिस ने बताया कि पॉलीग्राफ टेस्ट के बाद दोनों आरोपियों ने अपराध स्वीकार कर लिया। उनकी निशानदेही पर धौलपुर के जंगल से शव के अवशेष भी बरामद किए गए हैं। कोर्ट जाते समय हुए थे लापता भरतपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) राजेश मीणा ने बताया कि वैर निवासी ठेकेदार प्रहलाद बैरवा 26 मार्च 2025 को कोर्ट जाने के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गए थे। अगले दिन उनकी पत्नी पूनम बैरवा ने वैर थाने में अपहरण का मामला दर्ज कराया था। मामले की जांच के लिए कई पुलिस टीमें गठित की गईं, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस सुराग नहीं मिला। इस दौरान परिजनों ने कई बार प्रदर्शन कर मामले के खुलासे की मांग भी की थी। REET में पास कराने का झांसा बना हत्या की वजह पुलिस जांच में सामने आया कि वर्ष 2021 में पूनम बैरवा REET परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। इसी दौरान आरोपी धर्मेंद्र जाखड़ ने परीक्षा में पास कराने का दावा करते हुए प्रहलाद से 5 लाख रुपये ले लिए। जब परीक्षा का परिणाम आया और पूनम सफल नहीं हुईं तो प्रहलाद ने अपनी रकम वापस मांगनी शुरू कर दी। पुलिस के अनुसार, लगातार पैसों की मांग से परेशान होकर धर्मेंद्र ने अपने साथी विनोद मीणा के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची। अपहरण के बाद जंगल में की हत्या पुलिस के अनुसार, 26 मार्च 2025 को आरोपियों ने प्रहलाद का कथित रूप से अपहरण कर उन्हें धौलपुर के जंगल में ले गए, जहां गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी। इसके बाद पहचान छिपाने के उद्देश्य से शव को जंगल में दफना दिया गया। आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने जंगल से शव के अवशेष बरामद किए हैं, जिन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। पॉलीग्राफ टेस्ट के बाद खुला राज जांच के दौरान पुलिस ने दोनों आरोपियों से पूछताछ की, लेकिन वे लगातार गुमराह करते रहे। इसके बाद पॉलीग्राफ टेस्ट कराया गया। पुलिस का कहना है कि टेस्ट के बाद आरोपियों ने हत्या की बात स्वीकार की, जिसके आधार पर उन्हें गिरफ्तार कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। अन्य लेन-देन की भी जांच जारी पुलिस ने बताया कि मामले में अन्य आर्थिक लेन-देन के पहलुओं की भी जांच की जा रही है। वहीं, करीब 25 दिन पहले एसपी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान प्रहलाद की पत्नी पूनम बैरवा ने आरोप लगाया था कि उनके पति ने धर्मेंद्र जाखड़ को 4.50 लाख रुपये और राजेश कुमार गर्ग को 15 लाख रुपये उधार दिए थे। उन्होंने दावा किया कि रकम वापस मांगने को लेकर पहले से विवाद चल रहा था और इस संबंध में धोखाधड़ी का मामला भी अदालत में विचाराधीन है। पुलिस का कहना है कि मामले के सभी पहलुओं की जांच जारी है और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। राजस्थान, अपराध और देश की ताज़ा एवं विश्वसनीय खबरों के लिए विजिट करें:deshharpal.com

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स: पैरा पावरलिफ्टिंग में भारत पदक से चूका, स्विमिंग और बॉक्सिंग में बढ़ीं उम्मीदें

ग्लासगो। कॉमनवेल्थ गेम्स के दूसरे दिन भारत को पैरा पावरलिफ्टिंग के पहले मेडल इवेंट में निराशा हाथ लगी। पुरुष लाइटवेट वर्ग में अशोक कुमार मलिक पदक से मामूली अंतर से चूकते हुए चौथे स्थान पर रहे, जबकि परमजीत कुमार छठे स्थान पर रहे। हालांकि स्विमिंग, जिम्नास्टिक्स और बॉक्सिंग में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने पदकों की उम्मीदें बरकरार रखी हैं। पैरा पावरलिफ्टिंग में अशोक चौथे स्थान पर पुरुष लाइटवेट फाइनल में नौ बार के राष्ट्रीय चैंपियन अशोक कुमार मलिक ने पहली कोशिश में 195 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। दूसरी कोशिश में उन्होंने 200 किलोग्राम की अपनी व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ (Personal Best) लिफ्ट पूरी कर 143.8 अंक हासिल किए। तीसरे प्रयास में 205 किलोग्राम वजन उठाने में असफल रहने के कारण वह चौथे स्थान पर रहे और पदक से चूक गए। वहीं परमजीत कुमार ने पहले प्रयास में 176 किलोग्राम वजन उठाकर 135.6 अंक अर्जित किए। इसके बाद 179 किलोग्राम वजन उठाने के दोनों प्रयास असफल रहे और वह छठे स्थान पर रहे। अब महिला लाइटवेट वर्ग में जसप्रीत कौर और सुमन देवी, जबकि महिला हेवीवेट में कस्तूरी राजामणि तथा पुरुष हेवीवेट में झंडू कुमार और सुधीर भारत की ओर से पदक की चुनौती पेश करेंगे। स्विमिंग में भारतीय खिलाड़ियों ने बनाई फाइनल और सेमीफाइनल में जगह भारत के लिए अच्छी खबर स्विमिंग से आई। इस स्पर्धा में कुल आठ प्रतिभागी होने के कारण दोनों भारतीय तैराक फाइनल में पहुंच गए हैं। वहीं स्टार तैराक श्रीहरि नटराज ने पुरुष 50 मीटर बैकस्ट्रोक हीट में 25.52 सेकेंड का समय निकालते हुए अपनी हीट में पांचवां और कुल मिलाकर 14वां स्थान हासिल किया। इसके साथ उन्होंने सेमीफाइनल के लिए क्वालिफाई कर लिया। जिम्नास्टिक्स में भारत मजबूत स्थिति में आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स की पुरुष टीम ऑलराउंड स्पर्धा में दो उपकरणों के बाद भारत सब-डिवीजन-2 में सिंगापुर के बाद दूसरे स्थान पर चल रहा है। भारतीय टीम में तपन मोहंती, स्वाथिश केपी, तपेश्वरनाथ दास और योगेश्वर सिंह शामिल हैं। बॉक्सिंग में आज से भारत का अभियान बॉक्सिंग में भारत की ओर से जदुमणि सिंह पुरुष 55 किलोग्राम वर्ग के राउंड ऑफ-32 मुकाबले में स्कॉटलैंड के आरोन कुलेन का सामना करेंगे। वहीं ओलंपिक कांस्य पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन को महिला 75 किलोग्राम वर्ग में बाय मिला है, जिससे वह सीधे सेमीफाइनल में पहुंच गई हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स के नियमों के अनुसार दोनों सेमीफाइनल में हारने वाले खिलाड़ियों को भी कांस्य पदक दिया जाता है। ऐसे में लवलीना का कम से कम ब्रॉन्ज मेडल सुनिश्चित हो गया है। जूडो में भारत को झटका भारत की जूडो खिलाड़ी तूलिका मान को पिछले 12 महीनों में तीन बार वेयरअबाउट्स नियम के उल्लंघन के कारण NADA ने अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है। इसके चलते उन्हें भारतीय टीम से बाहर कर दिया गया है। इससे पहले पुरुष 73 किलोग्राम वर्ग के अरुण कुमार भी प्रतियोगिता से बाहर हो चुके हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स, भारतीय खिलाड़ियों और खेल जगत की हर बड़ी खबर के लिए विजिट करें:deshharpal.com

Gold Price Today: सोना ₹824 सस्ता, चांदी में मामूली तेजी; जानें आज के ताजा भाव

नई दिल्ली। घरेलू सर्राफा बाजार में 24 जुलाई को सोने की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि चांदी के दाम में हल्की बढ़त देखने को मिली। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत 824 रुपये घटकर 1,43,781 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गई। वहीं, एक किलोग्राम चांदी की कीमत 241 रुपये बढ़कर 2,22,721 रुपये हो गई। इससे पहले सोना 1,44,605 रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी 2,22,480 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी। इस साल कीमतों में रहा बड़ा उतार-चढ़ाव वर्ष 2026 में सोना और चांदी दोनों की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। चांदी की बात करें तो— आगे क्या रह सकता है रुख? कमोडिटी विशेषज्ञ अजय केडिया के अनुसार, सोना और चांदी अपने रिकॉर्ड उच्च स्तर से काफी नीचे कारोबार कर रहे हैं। ऐसे में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह अवसर हो सकता है। हालांकि उन्होंने सलाह दी कि निवेशकों को एकमुश्त निवेश करने के बजाय चरणबद्ध (SIP या किस्तों में) निवेश की रणनीति अपनानी चाहिए, ताकि बाजार में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम किया जा सके। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो साल के अंत तक सोना 1.60 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी 2.80 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकती है। सोना-चांदी, शेयर बाजार, निवेश और बिजनेस से जुड़ी हर बड़ी खबर के लिए विजिट करें:deshharpal.com

NEET पेपर लीक मामला: शिक्षा मंत्रालय का बड़ा एक्शन, NTA के 47 अधिकारी बर्खास्त, दर्ज होंगे आपराधिक केस

नई दिल्ली। देशभर में NEET पेपर लीक मामले को लेकर जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच शिक्षा मंत्रालय ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। समाचार एजेंसी ANI के सूत्रों के अनुसार, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के 47 अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया है। साथ ही इन अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है। यह कार्रवाई परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार का अब तक का सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है। एक दिन पहले हुए थे बड़े प्रशासनिक फेरबदल इससे पहले गुरुवार को केंद्र सरकार ने 17 वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले और पदोन्नति के आदेश जारी किए थे। सबसे बड़ा बदलाव शिक्षा मंत्रालय में हुआ, जहां 1994 बैच के राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी नरेश पाल गंगवार को उच्च शिक्षा विभाग का नया सचिव नियुक्त किया गया। उन्होंने विनीत जोशी का स्थान लिया है, जिन्हें पंचायती राज मंत्रालय का सचिव बनाया गया है। इसके अलावा 1995 बैच के IAS अधिकारी टी.के. अनिल कुमार को पदोन्नत कर स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग का सचिव नियुक्त किया गया है। पेपर लीक पर सरकार लगातार दे रही सख्त संदेश पिछले कुछ दिनों में केंद्र सरकार ने पेपर लीक मामलों पर लगातार कड़े रुख के संकेत दिए हैं। 24 जुलाई: सख्त कानून लाने का ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात जारी वीडियो संदेश में कहा कि पेपर लीक जैसे अपराधों को रोकने के लिए कड़े दंड का प्रावधान करने वाला विधेयक संसद में लाया जाएगा। 23 जुलाई: फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि पेपर लीक मामलों में दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने संबंधित विभागों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश भी दिए। 21 जुलाई: “पेपर लीक घोर पाप है” एनडीए संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा था कि पेपर लीक युवाओं के भविष्य के साथ बड़ा अन्याय है। उन्होंने बताया कि मामले में अब तक 13 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी। साथ ही राज्यों से भी इस तरह की घटनाओं को रोकने में सहयोग की अपील की गई। युवाओं के भविष्य पर सरकार का फोकस सरकार का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी उद्देश्य से प्रशासनिक कार्रवाई, कानूनी सुधार और जांच प्रक्रिया को तेज किया जा रहा है ताकि भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। देश, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी हर बड़ी और विश्वसनीय खबर के लिए विजिट करें:deshharpal.com

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