संपादकीय निखिल सिद्धभट्टी (प्रधान संपादक ) 17 अप्रैल की दोपहर, जब Narendra Modi ने सोशल मीडिया पर अपील की—“महिलाओं को उनका हक दीजिए”—तो यह सिर्फ एक भावनात्मक संदेश नहीं था, बल्कि एक बड़े राजनीतिक मूव का संकेत भी था। कुछ ही घंटों बाद लोकसभा में जो हुआ, उसने साफ कर दिया कि यह सिर्फ विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सियासी रणनीति का हाई-वोल्टेज खेल था। सरकार का बिल पास नहीं हुआ—लेकिन क्या वाकई यह हार थी? या फिर यह एक ऐसी चाल थी जिसमें दोनों रास्तों पर फायदा ही फायदा था? सरकार की चाल: हार में भी जीत का रास्ता Bharatiya Janata Party और NDA के पास जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं था—यह बात किसी से छुपी नहीं थी। फिर भी बिल लाया गया, जोर-शोर से अपीलें हुईं, और अंततः वोटिंग में यह गिर गया। यहीं से “Win-Win Strategy” की शुरुआत होती है: यानी परिणाम चाहे जो भी हो, नैरेटिव सरकार के पक्ष में सेट था। विपक्ष की स्थिति: मुद्दा सही, मैसेज कमजोर Indian National Congress समेत विपक्ष ने बिल का विरोध पूरी रणनीति के साथ किया—परिसीमन, जनगणना और OBC प्रतिनिधित्व जैसे गंभीर मुद्दे उठाए।Mallikarjun Kharge और Rahul Gandhi ने साफ कहा कि यह “महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक पुनर्संरचना” है। लेकिन समस्या यहां थी: राजनीति में अक्सर भावनाएं, लॉजिक पर भारी पड़ती हैं। यही वह जगह है जहां विपक्ष, खासकर कांग्रेस, नैरेटिव की लड़ाई में पीछे दिखी। क्या विपक्ष ‘जाल’ में फंस गया? सरकार की रणनीति को देखें तो यह साफ लगता है कि: अगर विपक्ष समर्थन करता → सरकार को सीधा क्रेडिटअगर विरोध करता → “महिला विरोधी” टैग यानी यह एक क्लासिक राजनीतिक ट्रैप था—और विपक्ष इसमें उलझता नजर आया। अब सवाल उठता हैं कि इसका राजनीतिक असरआगे क्या होगा ? तो इस पूरे घटनाक्रम के तीन बड़े असर हो सकते हैं: यह पूरा मामला सिर्फ एक विधेयक के पास या फेल होने का नहीं था। यह उस धारणा (Perception) की लड़ाई थी, जिसमें Narendra Modi की सरकार एक कदम आगे नजर आई। राजनीति में कई बार असली जीत संसद के भीतर नहीं, बल्कि जनता के दिमाग में होती है।और इस बार—बिल गिरने के बावजूद—सरकार ने वही हासिल करने की कोशिश की है।
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