भिलाई। जिस बेटे को देश के लिए मेडल जीतने के काबिल बनाने के लिए मां ने अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख दिया और पिता ने मजदूरी कर उसकी पढ़ाई, डाइट और जिम का खर्च उठाया, आज वही बेटा सरकारी मदद के इंतजार में आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
छत्तीसगढ़ के पैरा आर्म रेसलर श्रीमंत झा ने कहा है कि अगर इस बार भी उन्हें शहीद राजीव पांडे पुरस्कार और सरकारी नौकरी नहीं मिली, तो वह अपने 67 इंटरनेशनल मेडल नीलाम कर देंगे। उनका कहना है कि नीलामी से मिलने वाली रकम से माता-पिता का कर्ज चुकाएंगे और छोटा कारोबार शुरू करेंगे।
श्रीमंत ने यह बात 15 अगस्त को दुर्ग बटालियन में आयोजित मुख्य समारोह में सम्मानित किए जाने के बाद कही। कार्यक्रम में डिप्टी सीएम अरुण साव ने उनका सम्मान किया।
मेडल नीलाम कर कर्ज चुकाने की बात
श्रीमंत ने कहा कि उन्होंने करीब 15 साल के खेल करियर में भारत के लिए 67 इंटरनेशनल मेडल जीते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अब तक शहीद राजीव पांडे पुरस्कार और सरकारी नौकरी नहीं मिली।
उन्होंने कहा कि अगर इस बार भी सरकार की ओर से मदद नहीं मिली तो वह अपने 67 इंटरनेशनल मेडल सरकार को सौंपकर उनकी नीलामी करने का कदम उठाएंगे। इससे मिलने वाली राशि से माता-पिता का कर्ज चुकाने और छोटा कारोबार शुरू करने की योजना है।
श्रीमंत ने खेल छोड़ने की बात भी कही है।
मां ने मंगलसूत्र गिरवी रखा, पिता ने मजदूरी कर उठाया खर्च
श्रीमंत ने बताया कि उनके खेल करियर को आगे बढ़ाने में उनके माता-पिता ने काफी संघर्ष किया। उनकी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए मां ने अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख दिया था।
वहीं, पिता ने मजदूरी करके बेटे की पढ़ाई, डाइट और जिम का खर्च उठाया। परिवार को उम्मीद थी कि श्रीमंत देश के लिए मेडल जीतेंगे और आगे उन्हें सरकारी नौकरी मिलेगी, जिससे घर की आर्थिक स्थिति सुधर सकेगी।
इसी उम्मीद में परिवार पर कर्ज बढ़ता चला गया।
कई साल से पुरस्कार के लिए कर रहे आवेदन
श्रीमंत के मुताबिक, वह कई वर्षों से शहीद राजीव पांडे पुरस्कार के लिए आवेदन कर रहे हैं। हर बार अपनी खेल उपलब्धियों से संबंधित दस्तावेजों के साथ आवेदन जमा किया, लेकिन अब तक उन्हें यह सम्मान नहीं मिला।
उनका कहना है कि 67 अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने के बावजूद उन्हें राज्य का यह खेल सम्मान और सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी।

2032 पैरालंपिक में गोल्ड जीतना है सपना
श्रीमंत का सपना 2032 पैरालंपिक में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना है। पैरा आर्म रेसलिंग को पैरालंपिक में शामिल किए जाने की उम्मीद के बीच वह इसकी तैयारी कर रहे थे।
हालांकि, परिवार की आर्थिक स्थिति और बढ़ते कर्ज ने उनके सामने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। उनका कहना है कि सरकारी नौकरी मिलने से उनके 15 साल के संघर्ष और माता-पिता के त्याग को सम्मान मिलेगा।
विश्व नंबर-3 और एशिया नंबर-1 होने का दावा
भिलाई निवासी श्रीमंत झा जन्म से दिव्यांग हैं। करीब 15 साल के खेल करियर में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
श्रीमंत के अनुसार, उन्होंने अब तक 67 इंटरनेशनल मेडल जीते हैं और वह पैरा आर्म रेसलिंग में विश्व में नंबर-3 तथा एशिया में नंबर-1 रह चुके हैं।
उन्होंने सरकार से अपील की है कि उनकी खेल उपलब्धियों और मेरिट को देखते हुए उन्हें शहीद राजीव पांडे पुरस्कार के साथ सरकारी नौकरी दी जाए।


