गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के एक छात्र को CJP प्रदर्शन से जोड़कर नोटिस जारी किए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई। CJI ने सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई नहीं करने को कहा था, तो फिर मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी कैसे कर दिया?
सुनवाई के दौरान CJI का रुख काफी सख्त नजर आया। उन्होंने पूछा कि “मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई?” अदालत ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद छात्रों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
Student को क्यों भेजा गया था Notice?
पूरा मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के लॉ स्टूडेंट अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने 4 सितंबर को छात्र को BNSS की संबंधित धाराओं के तहत नोटिस जारी किया था।
नोटिस में छात्र से शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानती मुचलके देने को कहा गया था।
प्रशासन की ओर से इसे एहतियाती कार्रवाई बताया गया। पुलिस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि छात्र विश्वविद्यालय के अन्य विद्यार्थियों के बीच कथित तौर पर सरकार विरोधी बातें फैला रहा था और उन्हें CJP के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहा था।
छात्र ने Police के आरोपों को नकारा
दूसरी तरफ, छात्र अक्षत त्रिपाठी ने पुलिस के इन आरोपों को गलत बताया। उनका कहना है कि वह काफी समय से विश्वविद्यालय नहीं गए थे और उनकी पढ़ाई ऑनलाइन चल रही थी।
छात्र के मुताबिक, जिस समय प्रदर्शन हुआ, उस दौरान वह प्रयागराज में इलाहाबाद हाईकोर्ट में काम कर रहे थे। ऐसे में उन पर विश्वविद्यालय के छात्रों को प्रदर्शन के लिए उकसाने का आरोप लगाना सही नहीं है।
Notice वापस लेने के बाद भी Supreme Court नाराज
मामला सामने आने के बाद पुलिस ने नोटिस वापस ले लिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि अगर अदालत ने छात्रों के खिलाफ coercive action से बचने का निर्देश दिया था, तो फिर ऐसा नोटिस जारी ही क्यों किया गया।
यही बात सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के तेवरों की बड़ी वजह बनी। अदालत ने मामले से जुड़े दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखने को कहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि नोटिस किस आधार पर जारी किया गया था।
Supreme Court के पुराने Order का भी जिक्र
इस मामले की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का पहले दिया गया आदेश भी अहम है। रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने 1 सितंबर 2026 को CJP प्रदर्शन से जुड़े लोगों के खिलाफ दर्ज FIRs को रद्द कर दिया था। हालांकि, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के संबंध में अलग स्थिति रखी गई थी।
इसके बाद छात्रों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया गया। अदालत ने इसी संदर्भ में नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर सवाल उठाए।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट पूरे मामले के तथ्यों को देख रहा है। अदालत ने नोटिस और उससे जुड़े दस्तावेज पेश करने को कहा है। आगे की सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद किस आधार पर छात्र को नोटिस भेजा था।
यह मामला सिर्फ एक छात्र को नोटिस देने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए students के protest rights, प्रशासनिक powers और Supreme Court के orders के पालन को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
फिलहाल सबकी नजर अगली सुनवाई पर है, जहां यह साफ हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट इस कार्रवाई को लेकर आगे क्या रुख अपनाता है।
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