देश की संसद में सोमवार का दिन इतिहास की यादों से भरा रहा। वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर लोकसभा में स्पेशल डिस्कशन (Special Discussion) रखा गया, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। हर वक्ता के लिए यह सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि आजादी की भावना और भारतीय पहचान का प्रतीक था। 150 Years of Vande Mataram: भावनाएँ, इतिहास और बहस जब पीएम मोदी ने बोलना शुरू किया, सदन शांत था। उन्होंने कहा कि इस गीत ने आज़ादी की लड़ाई में नवीन ऊर्जा दी और भारतीयों के दिलों में स्वाभिमान जगाया।बहस के दौरान कई बार इस बात का जिक्र आया कि वंदे मातरम् के नारे से अंग्रेजों की कफन कस जाती थी, और इसके सुर स्वतंत्रता सेनानियों को हिम्मत देते थे। विपक्ष की तरफ से राहुल गांधी और अन्य सांसदों ने भी विचार रखे।उनका कहना था कि गीत की महत्ता पर कोई सवाल नहीं, लेकिन किसी भी नागरिक को इसे गाने के लिए मजबूर करना, संविधान की भावना से मेल नहीं खाता। विवाद क्यों? इसे लेकर देश में हमेशा दो दृष्टिकोण रहे हैं: समर्थन में चिंता में कई नेताओं ने कहा कि प्यार और सम्मान मजबूरी से नहीं आते।यह ऐसा गीत है जिसे दिल से गाया जाए तो ही उसकी सुंदरता सामने आती है। 10 घंटे की चर्चा, पर सवाल वही पूरे दिन चली चर्चा के बाद भी सवाल वही रहा —क्या वंदे मातरम् को Compulsory बनाना चाहिए? अधिकांश वक्ताओं ने स्वीकार किया कि: संसद में यह बार-बार कहा गया कि भारत की ताकत उसकी विविधता (Diversity) है।यही वह देश है जहां कई धर्म, भाषाएँ और विचार एक साथ चलते हैं। Human Touch: भावनाओं में भी नीति छुपी है बहुत से सांसदों के चेहरे पर भावनाएँ साफ थीं।जब उन्होंने अपने बचपन की स्मृतियाँ, स्कूल की परेड या स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम याद किए, तो लगा कि यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जुड़ाव भी है। एक वरिष्ठ सांसद ने कहा: “जब पहली बार मैंने इसे स्कूल में गाया, मुझे लगा कि मैं सच में भारत मां के लिए कुछ कर रहा हूँ। आज भी वही अहसास जीवित है।” इस तरह की छोटी बातें बहस को मानवीय स्पर्श देती हैं। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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