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Ajit Doval की बैकडोर बातचीत के बाद बनी अमेरिकी ट्रेड डील

Ajit Doval की बैकडोर बातचीत के बाद बनी अमेरिकी ट्रेड डील

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) Ajit Doval की बैकडोर कूटनीति के बाद ही अमेरिका के साथ यह समझौता संभव हो पाया। सूत्रों के मुताबिक, डोभाल ने साफ शब्दों में विदेश मंत्री से कहा था कि भारत किसी दबाव में नहीं झुकेगा और जरूरत पड़ी तो डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति पद से हटने तक इंतजार करेगा। बताया जा रहा है कि उस समय अमेरिका की ओर से भारत पर ट्रेड डील को जल्द मंजूरी देने का दबाव बनाया जा रहा था। लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी और मजबूती से अपनी शर्तों पर बातचीत जारी रखी। सूत्रों का कहना है कि डोभाल की रणनीति यही थी कि बिना जल्दबाजी किए संतुलित और सम्मानजनक समझौता किया जाए, ताकि भारत के किसानों, उद्योगों और छोटे व्यापारियों के हित सुरक्षित रह सकें। इस बैकडोर बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत की दिशा बदली और आखिरकार एक ऐसी ट्रेड डील पर सहमति बनी, जिसमें भारत की शर्तों को भी महत्व दिया गया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर किसी भी दबाव के आगे झुकने के बजाय अपने हितों के साथ मजबूती से खड़ा है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Iran

Iran ने अमेरिका को चेतावनी दी US Warship और Fighter Jet के खौफनाक दृश्य

ईरान (Iran) और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इस बीच तेहरान के Enghelab चौक में ईरान ने एक विशाल पोस्टर जारी कर अमेरिका को सैन्य कार्रवाई से बचने की कड़ी चेतावनी दी है। पोस्टर में US युद्धपोत (Aircraft Carrier) और Fighter Jet को ध्वस्त और समुद्र में खून बहते हुए दिखाया गया है। पोस्टर पर अंग्रेज़ी में लिखा है:“If you sow the wind, you will reap the whirlwind”(जो बुवाई करेगा, तूफान काटेगा) — यह स्पष्ट संदेश है कि किसी भी आक्रामक कदम का जवाब ईरान द्वारा दिया जाएगा। क्यों बढ़ रहा है तनाव? पोस्टर का संदेश विशेषज्ञों के अनुसार यह पोस्टर सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है। इसमें दिखाए गए ध्वस्त युद्धपोत और नष्ट विमान, समुद्र में खून के दृश्य के साथ, यह संदेश देते हैं कि यदि वास्तविक टकराव हुआ तो परिणाम भयंकर होंगे। यह ईरान द्वारा अमेरिका और उसके सहयोगियों को भेजी गई सख्त चेतावनी है। अंतरराष्ट्रीय नजर अंतरराष्ट्रीय समुदाय फिलहाल सैन्य टकराव रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। अमेरिका और Iran दोनों ही अपनी तैयारियों में लगे हैं, लेकिन किसी भी अप्रत्याशित कदम से मध्य पूर्व में सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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अमेरिका

अमेरिका में 5 साल के बच्चे की हिरासत US Immigration Action ने इंसानियत पर सवाल खड़े किए

अमेरिका से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने इंसानियत, कानून और बच्चों के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मिनेसोटा राज्य में एक पाँच साल के बच्चे को उसके पिता के साथ इमिग्रेशन अधिकारियों ने हिरासत में ले लिया। यह सब उस वक्त हुआ, जब बच्चा रोज़ की तरह स्कूल से घर लौट रहा था। घटना क्या थी? कोलंबिया हाइट्स इलाके में पाँच साल का लियाम कोनेजो रामोस अपने पिता एड्रियन अलेक्जेंडर कोनेजो एरियस के साथ प्री-स्कूल से लौट रहा था। तभी अमेरिकी इमिग्रेशन और कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) के एजेंटों ने उनकी गाड़ी रुकवाई और दोनों को हिरासत में ले लिया। इसके बाद पिता और बेटे को टेक्सास के एक डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया। बच्चे को “चारा” बनाने का आरोप स्थानीय स्कूल अधिकारियों और समुदाय के लोगों का कहना है कि एजेंटों ने बच्चे को जानबूझकर अपने साथ रखा ताकि घर के अन्य लोगों को बाहर बुलाया जा सके। इस दावे ने लोगों को झकझोर कर रख दिया। कई लोगों का कहना है कि एक छोटे बच्चे को इस तरह की कार्रवाई में घसीटना अमानवीय है और उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकता है। सरकार का जवाब होमलैंड सिक्योरिटी विभाग और ICE ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि बच्चा किसी तरह से निशाना नहीं था और कार्रवाई का उद्देश्य केवल पिता को हिरासत में लेना था। एजेंसी के मुताबिक, बच्चे की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक अधिकारी को उसके साथ रखा गया। कानूनी स्थिति पर सवाल परिवार के समर्थकों और वकीलों का कहना है कि इस परिवार का अमेरिका में शरण (asylum) का मामला पहले से चल रहा था और उन्हें देश से निकालने का कोई अंतिम आदेश नहीं मिला था। ऐसे में अचानक हिरासत में लेना कानूनी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है। लोगों की प्रतिक्रिया और विरोध घटना सामने आते ही स्थानीय स्कूल प्रशासन, सामाजिक संगठनों और कई नेताओं ने ICE की कार्रवाई की आलोचना की। उनका कहना है कि इससे प्रवासी परिवारों में डर का माहौल बनता है और बच्चों की पढ़ाई व भावनात्मक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है। कई माता-पिता ने चिंता जताई कि अगर स्कूल से लौटते बच्चों के साथ ऐसा हो सकता है, तो कोई भी सुरक्षित नहीं है। इंसानियत बनाम कानून यह मामला सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियों और उनके लागू होने के तरीकों पर बड़ा सवाल है। आलोचकों का कहना है कि कानून लागू करना ज़रूरी है, लेकिन बच्चों को ऐसी सख्त कार्रवाई में शामिल करना न तो नैतिक है और न ही मानवीय। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Greenland

Greenland समझौता और Trump का टैरिफ फैसला Europe Relations पर असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यूरोपीय देशों पर लगाई जाने वाली 10% टैरिफ (Tariff) की धमकी वापस ले ली है। ये टैरिफ 1 फरवरी से लागू होने वाला था और इसे भविष्य में 25% तक बढ़ाने की चेतावनी भी दी गई थी। लेकिन अब ट्रंप ने इसे रद्द कर दिया है, और इसकी वजह उन्होंने NATO और Greenland पर एक समझौते का फ्रेमवर्क (Framework) बताया। किन देशों पर था टैरिफ खतरा? टैरिफ की योजना के तहत कुल 8 यूरोपीय देश निशाने पर थे: ट्रंप के अनुसार, NATO महासचिव मार्क रुट्टे के साथ बातचीत के बाद ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र पर भविष्य का फ्रेमवर्क तय हुआ। इसी के आधार पर उन्होंने टैरिफ को वापस लेने का निर्णय लिया। Greenland और Arctic की स्ट्रैटेजिक अहमियत ग्रीनलैंड को ट्रंप रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने इसे अमेरिका के नियंत्रण में लाने की बात भी कही थी। इस प्रस्ताव ने यूरोपीय देशों में विरोध उत्पन्न किया था। टैरिफ की धमकी ने अमेरिकी-यूरोपीय संबंधों में तनाव पैदा किया और वैश्विक मार्केट में हलचल मचाई। हालांकि, फ्रेमवर्क की पूरी डिटेल अभी सार्वजनिक नहीं हुई है और कुछ यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप के दावों पर सवाल उठाए हैं। फिर भी, टैरिफ वापस लेने का कदम दोनों पक्षों के बीच संबंध सुधारने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। Human Angle: क्यों यह फैसला महत्वपूर्ण है? यह सिर्फ राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर भी असर डालता है। टैरिफ से महंगाई बढ़ सकती थी और व्यापारिक रिश्तों में तनाव भी बढ़ सकता था। इसे वापस लेने से यूरोप और अमेरिका के बीच भरोसे का माहौल बना है और आर्थिक स्थिरता के संकेत भी मिल रहे हैं। संक्षेप में, ट्रंप ने ग्रीनलैंड विवाद को सुलझाने का दावा करते हुए यूरोपीय देशों पर टैरिफ योजना वापस ली। उन्होंने कहा कि NATO और अमेरिका के बीच भविष्य के समझौते का फ्रेमवर्क तैयार है। यह कदम दोनों पक्षों के बीच संबंधों में सुधार और भरोसा बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Trump

Trump Air Force One में तकनीकी खराबी Davos जाते समय बीच उड़ान से लौटे राष्ट्रपति ट्रम्प

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Trump) जब स्विट्ज़रलैंड के दावोस में होने वाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum – WEF) में हिस्सा लेने के लिए रवाना हुए, तब उनकी यात्रा अचानक सुर्खियों में आ गई। राष्ट्रपति का विशेष विमान एयरफोर्स-वन टेकऑफ़ के कुछ ही देर बाद तकनीकी खराबी के कारण बीच उड़ान से वापस वाशिंगटन लौट आया। क्या थी तकनीकी खराबी जानकारी के मुताबिक, उड़ान के दौरान विमान में एक “मामूली इलेक्ट्रिकल समस्या” सामने आई। पायलटों और तकनीकी टीम ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए जोखिम न लेने का फैसला किया और विमान को तुरंत मैरीलैंड स्थित जॉइंट बेस एंड्रयूज़ की ओर मोड़ दिया। कुछ रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि प्रेस केबिन की लाइट्स थोड़ी देर के लिए बंद हो गई थीं, जिससे यात्रियों को अंदाजा हो गया था कि कुछ गड़बड़ है। व्हाइट हाउस का बयान व्हाइट हाउस ने साफ किया कि यह कोई गंभीर संकट नहीं था, बल्कि एक एहतियाती कदम था। राष्ट्रपति ट्रम्प और उनका दल सुरक्षित रूप से बेस पर उतर गए। इसके बाद उन्हें दूसरे सरकारी विमान में स्थानांतरित किया गया ताकि वे दावोस की यात्रा जारी रख सकें। दावोस दौरे का महत्व ट्रम्प का दावोस दौरा काफ़ी अहम माना जा रहा है। वहां वे वैश्विक नेताओं और उद्योगपतियों से मुलाकात कर आर्थिक मुद्दों, निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर चर्चा करने वाले हैं। इस तकनीकी रुकावट से उनके कार्यक्रम में थोड़ी देरी जरूर हुई, लेकिन दौरा रद्द नहीं किया गया। पुराने विमान, नए सवाल गौरतलब है कि मौजूदा एयरफोर्स-वन विमान लगभग चार दशक पुराने हैं। पहले भी इनके रखरखाव और भरोसेमंद संचालन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस ताज़ा घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि नए राष्ट्रपति विमानों की जरूरत कितनी जरूरी हो चुकी है। Trump का एयरफोर्स-वन तकनीकी खराबी के कारण बीच उड़ान से लौटना भले ही एक छोटी घटना लगे, लेकिन इससे राष्ट्रपति सुरक्षा, विमान की उम्र और आधुनिक तकनीक की जरूरत जैसे बड़े मुद्दे फिर चर्चा में आ गए हैं। राहत की बात यह रही कि सब कुछ सुरक्षित रहा और राष्ट्रपति अपनी दावोस यात्रा दूसरे विमान से जारी रखने में सफल रहे। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Asim Munir

Asim Munir Statement Islamic Countries में Pakistan को खास दर्जा मिलने का दावा

पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर (Asim Munir) का हालिया बयान इन दिनों न केवल पाकिस्तान बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान अपने गठन के “मूल मकसद” को पूरा करने के बेहद करीब पहुंच चुका है और अब उसकी पहचान इस्लामी देशों (Islamic World) के बीच पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो रही है। इस बयान के बाद कई सवाल उठ रहे हैं — क्या पाकिस्तान सच में अपनी दिशा बदल रहा है? और आखिर वह “मकसद” क्या है जिसकी बात आसिम मुनीर कर रहे हैं? पाकिस्तान का “मकसद” क्या बताया आसिम मुनीर ने? अपने संबोधन में आसिम मुनीर (Asim Munir) ने साफ तौर पर कहा किपाकिस्तान की नींव इस्लाम के नाम पर रखी गई थी, और अब देश उस सोच को वास्तविक रूप देने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। उनका मानना है कि आज पाकिस्तान को मुस्लिम देशों के बीच जो सम्मान और स्थान मिल रहा है, वह यूं ही नहीं है, बल्कि यह वर्षों की रणनीति और संघर्ष का नतीजा है। उन्होंने इसे “अल्लाह की मेहरबानी” भी बताया। Islamic World में पाकिस्तान की बढ़ती अहमियत Asim Munir के बयान के पीछे हालिया घटनाक्रम भी अहम माने जा रहे हैं, जैसे: इन सबको मिलाकर देखा जाए तो पाकिस्तान खुद को अब सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि Muslim World का एक प्रभावशाली प्रतिनिधि के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है। बयान का समय क्यों है खास? यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान: ऐसे में यह बयान केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राजनीतिक और रणनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। समर्थन और विरोध – दोनों तरफ से प्रतिक्रियाएं जहां एक ओर पाकिस्तान में कुछ लोग आसिम मुनीर के बयान को“राष्ट्रीय आत्मविश्वास बढ़ाने वाला” मान रहे हैं,वहीं आलोचकों का कहना है कि: भारत और दक्षिण एशिया पर असर? Asim Munir का यह बयान भारत और पड़ोसी देशों के लिए भी अहम माना जा रहा है।विशेषज्ञों के अनुसार: निष्कर्ष: सिर्फ बयान या आने वाले बदलाव की झलक? Asim Munir का यह बयान केवल एक भाषण नहीं, बल्कि पाकिस्तान की भविष्य की सोच और रणनीति की झलक देता है।क्या पाकिस्तान सच में अपने “मकसद” के करीब है या यह सिर्फ एक राजनीतिक-धार्मिक नैरेटिव है — इसका जवाब आने वाला समय देगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Greenland

Greenland क्यों बना Global Hotspot आर्कटिक की बर्फ पिघलने से बढ़ा खतरा

दुनिया का ध्यान अब ग्रीनलैंड (Greenland) की ओर तेजी से बढ़ रहा है। आर्कटिक (Arctic) की बर्फ पिघल रही है और इस छोटे से बर्फीले इलाके ने वैश्विक राजनीति और आर्थिक रणनीति में अपनी जगह बना ली है। कभी शांत, दूर-दराज और उपेक्षित माना जाने वाला यह क्षेत्र आज अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के लिए रणनीतिक और आर्थिक मोर्चा बन गया है। बर्फ पिघलना और नए अवसर ग्रीनलैंड की बर्फ के तेज़ी से पिघलने का असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। इससे: खनिजों का खजाना: Rare Minerals ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ एलिमेंट्स, लिथियम, कोबाल्ट, निकल और यूरेनियम जैसे खनिज पाए जाते हैं। ये आधुनिक दुनिया की तकनीक और ग्रीन एनर्जी (Green Energy) के लिए जीवनदायिनी हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल, मिसाइल सिस्टम और सेमीकंडक्टर उद्योग इन खनिजों पर निर्भर हैं। यही वजह है कि बड़ी शक्तियाँ इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती हैं। महाशक्तियों की बढ़ती दिलचस्पी अमेरिका (USA) अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड सिर्फ डेनमार्क का हिस्सा नहीं, बल्कि उत्तरी अमेरिका की सुरक्षा और आर्कटिक में रणनीतिक ताकत का आधार है। थ्यूल स्पेस बेस (Thule Space Base) जैसे सैन्य अड्डे अमेरिका की पकड़ मजबूत करते हैं। रूस (Russia) रूस ने आर्कटिक में नए सैन्य ठिकाने, परमाणु पनडुब्बियाँ और रडार सिस्टम स्थापित किए हैं। ग्रीनलैंड पर किसी अन्य देश का प्रभाव रूस के लिए चुनौतीपूर्ण है। चीन (China) चीन खुद को “Near-Arctic State” कहता है और निवेश, खनिज दोहन और इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहता है। बढ़ता सैन्य और सुरक्षा खतरा आर्कटिक अब ‘नो-मैन ज़ोन’ नहीं रहा। बर्फ पिघलने से मिसाइल और सैन्य गतिविधियों के लिए सबसे छोटा रास्ता खुल गया है। बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ किसी भी गलती या मिसअंडरस्टैंडिंग से वैश्विक संघर्ष का कारण बन सकती हैं। ग्रीनलैंड के सामने चुनौतियाँ ग्रीनलैंड की आबादी कम है, लेकिन संसाधन बहुत हैं। आर्थिक विकास और विदेशी निवेश की ज़रूरत है, लेकिन महाशक्तियों के मोहरे में बदलने का डर भी है। इसके अलावा स्थानीय आबादी और पर्यावरण पर खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फीला क्षेत्र नहीं रह गया है। यह वैश्विक राजनीति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी वर्चस्व की चाबी बन चुका है। जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघलेगी, ग्रीनलैंड की महत्वता और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा और तेज़ होगी। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Tariff

Trump Greenland Threat ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी से बढ़ा वैश्विक तनाव, कनाडा-डेनमार्क आमने-सामने

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Trump) एक बार फिर अपने बयानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। इस बार मामला दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड (Greenland) का है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर दूसरे देश अमेरिका के ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की योजना का समर्थन नहीं करते, तो उन पर भारी टैरिफ (Tariff Threat) लगाए जा सकते हैं। उनके इस बयान ने वैश्विक राजनीति में नई बहस और चिंता को जन्म दे दिया है। ट्रंप की धमकी और अमेरिका का तर्क Trump का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) के लिए बेहद अहम है। उन्होंने आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका अपने हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। ट्रंप के मुताबिक, टैरिफ लगाना उन देशों पर दबाव बनाने का एक तरीका हो सकता है जो अमेरिका की इस रणनीति के रास्ते में खड़े हैं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड का सख्त रुख Trump के बयान के बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड की प्रतिक्रिया भी उतनी ही साफ और सख्त रही। डेनमार्क ने दो टूक कहा कि ग्रीनलैंड उसकी संप्रभुता के अंतर्गत आता है और किसी भी तरह की धमकी या सौदेबाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। वहीं ग्रीनलैंड के स्थानीय नेताओं ने भावनात्मक लहजे में कहा कि यह द्वीप “बिकाऊ नहीं है” और वहां के लोग अपने भविष्य का फैसला खुद करेंगे। कनाडा और यूरोपीय देशों का समर्थन इस पूरे विवाद में कनाडा भी खुलकर सामने आया है। कनाडाई प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका देश हर हाल में ग्रीनलैंड के साथ खड़ा है और उसकी संप्रभुता का सम्मान करता है। इसके अलावा कई यूरोपीय देशों और नाटो सहयोगियों ने भी ट्रंप की टैरिफ धमकी को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि किसी भी क्षेत्र पर जबरन कब्जे की सोच आधुनिक विश्व व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। क्यों इतना अहम है ग्रीनलैंड? ग्रीनलैंड केवल बर्फ से ढका एक द्वीप नहीं है। यह इलाका के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहां नए रास्ते और संसाधन सामने आ रहे हैं, जिससे बड़ी ताकतों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। ग्रीनलैंड को लेकर Trump की टैरिफ धमकी ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति में शक्ति और हितों की टकराहट कितनी गहरी हो सकती है। जहां अमेरिका अपने सुरक्षा हितों की बात कर रहा है, वहीं ग्रीनलैंड, डेनमार्क और उनके समर्थक देश संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर जोर दे रहे हैं। आने वाले समय में यह विवाद किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Venezuela

US–Venezuela Relations मचाडो का भावनात्मक कदम, Trump को दिया Nobel Prize पदक

Venezuela Politics से जुड़ी एक बड़ी और भावनात्मक खबर सामने आई है। वेनेज़ुएला की चर्चित विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो (Maria Corina Machado) ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) को अपने Nobel Peace Prize का पदक प्रतीकात्मक रूप से सौंपा है। इस मुलाकात के बाद मचाडो ने कहा कि उन्हें अब “अमेरिकी राष्ट्रपति पर भरोसा है”। यह मुलाकात वॉशिंगटन में हुई, जिसने न सिर्फ वेनेज़ुएला की राजनीति बल्कि US–Venezuela Relations को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। Nobel Prize देना प्रतीकात्मक, नियम नहीं बदले मारिया कोरिना मचाडो को हाल ही में Venezuela में लोकतंत्र, मानवाधिकार और तानाशाही के खिलाफ संघर्ष के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। ट्रंप को दिया गया पदक केवल एक प्रतीकात्मक सम्मान है। नोबेल समिति पहले ही साफ कर चुकी है कि नोबेल पुरस्कार किसी और को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता और आधिकारिक तौर पर यह सम्मान मचाडो के नाम पर ही रहेगा। President बनने की चर्चा थी, लेकिन Trump का खुला समर्थन नहीं पिछले कुछ महीनों से यह चर्चा तेज थी कि मचाडो वेनेज़ुएला (Venezuela) की अगली राष्ट्रपति बन सकती हैं। उन्हें देश के भीतर और बाहर लोकतंत्र समर्थक चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इस मुलाकात के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने उनके राष्ट्रपति बनने का खुलकर समर्थन नहीं किया। ट्रंप ने संकेत दिए कि अमेरिका वेनेज़ुएला में मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए सभी विकल्प खुले रखना चाहता है। इससे साफ है कि अमेरिका की नीति अभी पूरी तरह किसी एक नेता पर केंद्रित नहीं है। बदला हुआ रुख, भरोसे का संदेश दिलचस्प बात यह है कि पहले मचाडो ट्रंप की नीतियों को लेकर सतर्क नजर आती थीं। लेकिन अब उनका बयान बदला हुआ दिखता है। पदक सौंपने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका और ट्रंप वेनेज़ुएला में लोकतंत्र बहाल करने में अहम भूमिका निभाएंगे। उनके इस कदम को कई लोग एक राजनीतिक अपील के तौर पर देख रहे हैं, ताकि अमेरिका का समर्थन उनके आंदोलन को और मजबूती दे सके। Expert View: इसका मतलब क्या है? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम एक कूटनीतिक संदेश है। इससे साफ है कि वेनेज़ुएला की सत्ता को लेकर तस्वीर अभी भी धुंधली बनी हुई है। Trump–Machado Meeting और Nobel Peace Prize का यह प्रतीकात्मक कदम भावनात्मक जरूर है, लेकिन इससे तुरंत कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव होना तय नहीं माना जा रहा। मचाडो को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली है, पर वेनेज़ुएला की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अब भी लंबा और मुश्किल है। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Iran

US–Iran Tension Trump Says Killings Stopped, ईरान बोला अब कोई फांसी नहीं

ईरान में चल रहे लंबे और उग्र सरकार-विरोधी प्रदर्शनों (Iran Protests) के बीच अमेरिका और ईरान के बयानों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के एक बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या ईरान ने वाकई प्रदर्शनकारियों पर सख्ती कम कर दी है। दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्री ने भी साफ शब्दों में कहा है कि अब किसी तरह की फांसी (Execution / Hanging) की कोई योजना नहीं है। ट्रंप का बयान: “हत्या रुकी, अब फांसी नहीं” डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें “दूसरी तरफ से भरोसेमंद जानकारी” मिली है कि ईरान में प्रदर्शनकारियों की हत्याएं अब रुक गई हैं और सरकार ने फांसी देने की योजना भी टाल दी है। ट्रंप के अनुसार, हालात पहले जैसे नहीं हैं और तेहरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव का असर दिख रहा है।हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और आगे के कदम हालात देखकर तय किए जाएंगे। ईरान का पक्ष: “फांसी पर कोई विचार नहीं” ट्रंप के दावे के बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आराघची का बयान सामने आया। उन्होंने कहा कि “फांसी का कोई प्लान नहीं है और यह मुद्दा चर्चा के दायरे से बाहर है”। उनका कहना था कि ईरान अपने आंतरिक मामलों को कानून के दायरे में संभाल रहा है और बाहरी दबाव में फैसले नहीं लेता। प्रदर्शन की पृष्ठभूमि: क्यों भड़का गुस्सा? ईरान में पिछले कई हफ्तों से महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक असंतोष को लेकर बड़े-पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हजारों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुई हैं।कुछ मामलों में फांसी की सजा की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी थी, जिसके बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। अंतरराष्ट्रीय दबाव और बदला माहौल अमेरिका की चेतावनियों, संयुक्त राष्ट्र में उठी आवाज और वैश्विक मीडिया कवरेज के बाद ईरान पर दबाव साफ दिखाई दिया। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के बयान और ईरानी विदेश मंत्री की प्रतिक्रिया इसी दबाव का नतीजा हो सकते हैं।हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स यह भी कहती हैं कि ईरान में अब भी कई प्रदर्शनकारी हिरासत में हैं और उनके मुकदमों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। आगे क्या? फिलहाल, दोनों देशों के बयानों से यह संकेत जरूर मिलता है कि तनाव कुछ हद तक कम हुआ है, लेकिन ज़मीनी हकीकत को लेकर सवाल अब भी बने हुए हैं। क्या वास्तव में हिंसा थमी है या यह सिर्फ कूटनीतिक बयानबाजी है—इसका जवाब आने वाले दिनों में सामने आएगा। हर ख़बर, हर पल — सिर्फ़ देशहरपल पर!
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Amir Khan की तीसरी शादी की चर्चाओं पर राखी गुलजार का बयान, बोलीं- खुशी का उम्र से कोई संबंध नहीं

Amir Khan की तीसरी शादी की चर्चाओं पर राखी गुलजार का बयान, बोलीं- खुशी का उम्र से कोई संबंध नहीं

बॉलीवुड अभिनेता Amir khan की तीसरी शादी को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं के बीच दिग्गज अभिनेत्री Rakhi Gulzar ने उनका खुलकर समर्थन किया है। जहां कुछ लोग आमिर के फैसले की आलोचना कर रहे हैं, वहीं राखी का मानना है कि शादी और खुशहाल जीवन का उम्र से कोई लेना-देना नहीं होता। एक इंटरव्यू में राखी गुलजार ने कहा कि 60 साल की उम्र में शादी करने में कोई बुराई नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि Robert De Niro भी दो बार शादी कर चुके हैं और 80 साल की उम्र के बाद पिता बने हैं। उनके अनुसार, खुशी और रिश्ते उम्र नहीं देखते, बल्कि व्यक्ति की भावनाओं और जीवन की परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। राखी ने अपनी निजी जिंदगी का जिक्र करते हुए कहा कि जब उन्होंने Gulzar से शादी की थी, तब उनकी उम्र 40 वर्ष थी। उन्होंने कहा कि किसी भी रिश्ते की सफलता का आधार आपसी समझ, सम्मान और खुशी होती है, न कि उम्र। सोशल Media पर आमिर खान की कथित तीसरी शादी को लेकर बहस जारी है, लेकिन राखी गुलजार के बयान ने इस चर्चा को नया मोड़ दे दिया है। उनका कहना है कि हर व्यक्ति को अपनी खुशी और जीवन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार है।
Sanjay Jha का बड़ा बयान, बोले- ममता बनर्जी और केजरीवाल ने कमजोर किया इंडिया गठबंधन

Sanjay Jha का बड़ा बयान, बोले- ममता बनर्जी और केजरीवाल ने कमजोर किया इंडिया गठबंधन

जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के कार्यकारी अध्यक्ष Sanjay Jha ने इंडिया गठबंधन को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को एकजुट कर एक मजबूत मंच बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सहयोगी दलों के बीच एकजुटता और साझा सोच की कमी के कारण गठबंधन कमजोर पड़ गया। एक इंटरव्यू के दौरान संजय झा से पूछा गया कि वर्ष 2023 में इंडिया गठबंधन की पहली बैठक पटना में नीतीश कुमार के आवास पर हुई थी, फिर जेडीयू उससे अलग क्यों हो गई। इस पर उन्होंने कहा कि गठबंधन को मजबूत बनाए रखने के लिए सभी दलों का एक दिशा में काम करना जरूरी था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। संजय झा ने आरोप लगाते हुए कहा कि “दो लोगों ने इंडिया अलायंस को खत्म कर दिया। उनका नाम ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल है।” उनके अनुसार चुनाव के दौरान गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच बेहतर तालमेल और स्पष्ट रणनीति का अभाव दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि जब किसी गठबंधन में शामिल दलों के बीच साझा लक्ष्य और समन्वय नहीं होता, तो उसका असर चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ता है। यही वजह रही कि विपक्षी एकता की कोशिशें अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं। संजय झा के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू हो गई है। अब देखना होगा कि उनके इस आरोप पर इंडिया गठबंधन के अन्य दलों की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।
CBI Raid in 661 Crore Fund Scam: हरियाणा-चंडीगढ़ में 6 ठिकानों पर छापेमारी

CBI Raid in 661 Crore Fund Scam: हरियाणा-चंडीगढ़ में 6 ठिकानों पर छापेमारी

हरियाणा और चंडीगढ़ में सामने आए 661 करोड़ रुपये के कथित सरकारी फंड घोटाले की जांच तेज हो गई है। मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 6 जून को चंडीगढ़, पंचकूला और दिल्ली-एनसीआर के 6 अलग-अलग ठिकानों पर छापेमारी की। जांच एजेंसी के अनुसार यह मामला सरकारी फंड की कथित हेराफेरी से जुड़ा है, जिसमें IDFC First Bank और AU Finance Bank के माध्यम से वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। जांच के दौरान हरियाणा सरकार के 8 विभागों और चंडीगढ़ प्रशासन के 2 विभागों के फंड में गड़बड़ी के संकेत मिले हैं। सीबीआई की जांच में चंडीगढ़ नगर निगम और CREST (चंडीगढ़ रिन्यूएबल एनर्जी एंड साइंस एंड टेक्नोलॉजी प्रमोशन सोसायटी) के खातों में भी कथित अनियमितताएं सामने आई हैं। इसके बाद एजेंसी ने कई महत्वपूर्ण स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया। सूत्रों के अनुसार, हरियाणा कैडर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के आवासों पर भी तलाशी ली गई। इसके अलावा मामले से जुड़े अधिकारियों और निजी कंपनियों के परिसरों की भी जांच की गई। जांच के दायरे में आई Vipam Consultancy Pvt. Ltd. और उसके निदेशक के ठिकानों पर भी सीबीआई की टीम ने दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड की जांच की। एजेंसी अब जुटाए गए सबूतों के आधार पर मामले की आगे की पड़ताल कर रही है। इस कार्रवाई के बाद सरकारी फंड के इस्तेमाल और निगरा
Jaipur में 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद, लोगों को हो सकती है परेशानी

Jaipur में 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद, लोगों को हो सकती है परेशानी

Jaipur। राजस्थान की राजधानी जयपुर में प्रशासन ने एहतियात के तौर पर शहर के कई इलाकों में 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद करने का आदेश जारी किया है। यह फैसला कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी तरह की अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए लिया गया है। इंटरनेट बंद होने का असर सबसे ज्यादा उन लोगों पर पड़ सकता है जो अपने रोजमर्रा के कामों के लिए ऑनलाइन सेवाओं पर निर्भर हैं। छात्रों की पढ़ाई, ऑनलाइन भुगतान, व्यापारिक गतिविधियां और डिजिटल सेवाएं कुछ समय के लिए प्रभावित हो सकती हैं। प्रशासन का कहना है कि यह कदम लोगों की सुरक्षा और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है। अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अपुष्ट जानकारी पर भरोसा न करें और केवल आधिकारिक स्रोतों से मिली जानकारी को ही सही मानें। स्थानीय लोगों का मानना है कि इंटरनेट बंद होने से असुविधा जरूर होगी, लेकिन यदि इससे शहर में शांति और सुरक्षा बनी रहती है तो सभी को प्रशासन का सहयोग करना चाहिए। प्रशासन लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है और आवश्यकता के अनुसार आगे के निर्णय लिए जाएंगे।
तमीम इकबाल बने Bangladesh क्रिकेट बोर्ड के नए अध्यक्ष, 37 साल की उम्र में रचा इतिहास

तमीम इकबाल बने Bangladesh क्रिकेट बोर्ड के नए अध्यक्ष, 37 साल की उम्र में रचा इतिहास

Bangladesh क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान तमीम इकबाल को बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) का नया अध्यक्ष चुना गया है। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उनकी स्थिति और मजबूत हो गई है। इससे पहले वह बोर्ड के अंतरिम अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। जानकारी के मुताबिक, बांग्लादेश सरकार ने अप्रैल में BCB के निदेशक मंडल को भंग कर दिया था। इसके बाद तमीम इकबाल को अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। बाद में जांच समिति की सिफारिशों और प्रशासनिक बदलावों के आधार पर बोर्ड में नई व्यवस्था लागू की गई। यह फैसला पिछले वर्ष अक्टूबर में हुए चुनावों को लेकर लगे आरोपों की जांच के बाद गठित पांच सदस्यीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया। समिति ने क्रिकेट प्रशासन में पारदर्शिता और सुधार के लिए कई सुझाव दिए थे। 37 वर्षीय तमीम इकबाल अब बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के इतिहास के सबसे युवा अध्यक्ष बन गए हैं। क्रिकेट के मैदान पर अपनी शानदार बल्लेबाजी और नेतृत्व क्षमता के लिए पहचान बनाने वाले तमीम से अब क्रिकेट प्रशंसकों को बोर्ड प्रशासन में भी सकारात्मक बदलावों की उम्मीद है। बांग्लादेश क्रिकेट के लिए यह एक नए दौर की शुरुआत मानी जा रही है। क्रिकेट प्रेमियों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि तमीम इकबाल अपने अनुभव का उपयोग कर देश के क्रिकेट को किस नई दिशा में ले जाते हैं।

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