🗓️ 28 जून 2025 | देश हरपल डेस्क | युवा संवाद कभी चाय, कभी चैट… और अब पॉडकास्ट!Gen Z अब न तो टीवी का इंतज़ार करती है और न ही अखबार का। इनकी दुनिया बस एक “प्ले बटन” में सिमट गई है। जहाँ पहले “कुल्फी-चाट” सुकून देती थी, अब वही राहत स्पॉटिफाई की आवाज़ों में मिलती है। हाँ जनाब, बात हो रही है पॉडकास्ट की!पॉडकास्ट — जो पहले रेडियो का कूल वर्जन था, अब Gen Z की पहचान बन गया है। “पॉडकास्ट सुनते हैं, क्योंकि यही आजकल पर्सनैलिटी का पासपोर्ट है!”— दर्शन एस., 24 वर्षीय वकील, चेन्नई पॉडकास्ट: बस सुनो और अपनाओ इन आवाज़ों में वो ‘फॉर्मल इंटरव्यू’ वाली बोरियत नहीं, बल्कि कॉलेज कैंटीन की सी खुलापन है। पॉडकास्ट अब Gen Z के लिए म्यूजिक से ज़्यादा, वीडियो से बेहतर और स्क्रॉलिंग से शांत है। पॉडकास्टर्स: अब सिर्फ़ क्रिएटर नहीं, क्रांतिकारी हैं चेन्नई की Safa Salsabeel Z., 22 वर्षीय साहित्य छात्रा हैं, लेकिन 7 पॉडकास्ट शो की ‘रचयिता’ भी।विषय? “ये कोई टाइम पास नहीं… ये तो सबसे तेज़ रचनात्मक विद्रोह है!”— सफा ज़ेड. Gen Z सुनता क्या है? “Perfect एडिटिंग नहीं चाहिए, दिल से निकली बातें चाहिए।”— कहती हैं आज की युवा पीढ़ी। उनके पसंदीदा टॉपिक्स: मतलब ये कि जब Gen Z ‘शावर’ में होती है, दिमाग पॉडकास्ट बना रहा होता है! प्लेटफॉर्म वही, लेकिन इस्तेमाल नया Spotify, YouTube — सब इनके पसंदीदा अड्डे हैं, लेकिन वीडियो नहीं, बोलने वाला कंटेंट ज़्यादा मायने रखता है। “पॉडकास्ट में हमारे फेवरेट क्रिकेटर भी उतने रियल लगते हैं, जितने गली के चायवाले अंकल!”— दर्शन एस. पॉडकास्ट का असली जादू क्या है? देश हरपल की राय:Gen Z को समझना हो तो उनके पॉडकास्ट सुनिए। ये युवा अब आवाज़ों के सहारे अपना आइडेंटीटी गढ़ रहा है। और शायद यही आने वाले भारत की सबसे सटीक गूंज है। “The Hindu” के लेख “Here’s why Gen Z finds comfort in podcasts” पर आधारित
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